Tuesday, December 25, 2018

पुप्फ पूजा

पुप्फ पूजा 
वण्ण-गन्ध-गुणोपेतं,  एतं कुसुम-सन्ततिं।
वण्ण(वर्ण)-गधं और गुण-उपेतं(गुणों से युक्त) एतं(ऐसे) कुसुम-गुन्थित सन्तति(माला) से
पूजयामि   मुनिन्दस्स,  बुध्दपाद1 -सरोरूहे।।
पूजयामि(मेरे द्वारा पूजा की जाती है) मुनिन्दस्स(महामुनि), बुद्ध के पाद सरोरुहे(कमलों) की।

पूजेमि  बुध्दं  कुसुमेन-नेन, पुञ्ञेन  मेत्तेन लभामि मोक्खं।
मैं पूजा करता हूँ, बुध्दं(बुध्द की) कुसुमेन-अनेन(इन पुष्पों के द्वारा) पुञ्ञेन(पुण्य से), मेत्तेन(मैत्राी से) लभामि(लाभ प्राप्त होता है, मुझे) मोक्खं(निब्बान) का।

पुप्फं मिलायति यथा इदं मे, कायो तथा याति विनासभावं।।
पुप्फं(पुष्प) मिलायति(कुम्हलाता है) जैसे(यथा), इदं मे(यह मेरी) काया वैसे ही(तथा) विनाश-भाव को याति(जाती है)।  प्रस्तुति- अ ला ऊके   @amritlalukey.blogspot.com
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1. मूलपाठ- सिरिपाद। संस्कृत शब्द ‘श्री’ को पालि में ‘सिरि’ कहा गया है। ‘श्री’ का अर्थ ‘लक्ष्मी’ से अभिप्रेरित है। बौद्ध ग्रंथों का भाषानुवाद जब संस्कृत में हुआ, उस काल में इस तरह के कई शब्दों का प्रयोग, चाहे-अनचाहे संस्कृत विद्वानों द्वारा किया गया। किन्तु अब ऐसे अ-बौद्ध शब्दावली का स्थानापन्न चरणबध्द रूप से करने की आवश्यकता है। 


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