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Sunday, February 2, 2014

मेरी कुछ कविताएँ (2)

(1)
जनता, 
भैंसों का झुण्ड
और
पीछे चरवाहा,
जिधर हांकता है
चल पड़ती है
                           

(2)
राष्ट्र के नाम पर
इतना जहर है 
कि हर चीज
'सांप्रदायिक'
लगती हैं।
                  -अ ला उके
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