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Wednesday, April 18, 2018

बुद्ध

बुद्ध
तुझे मैं ऐसा कभी भी नहीं देखता
जेतवन में
आंखें लगाए बैठा, ध्यानस्थ पद्मासन में
अथवा अजंता वेरूल  के अवशेषों में
पत्थर के ओंठ चिपके, अंतिम निद्रा लेते हुए

मैं तुझे देखता हूँ, चलता फिरता
दिन-दुखितों के दुखों पर मरहम लगाने वाला
जानलेवा अँधेरे में, हाथों में मशाल लिए हुए
झोपड़ी झोपड़ी में जाने वाला
संसर्ग-जन्य रोग के समान
नरडी का प्याला पीने वाला
दुःख के नए अर्थ बताने वाला
-दया पवार (स्रोत: धम्मचक्र प्रवर्तन के बाद के परिवर्तन )।

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