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Wednesday, May 1, 2019

पियत्तर सुत्त

पियत्तर सुत्त
(अपने से बढ़ कर कोई प्रिय नहीं)
"अत्थि नु खो ते मल्लिके,  कोचि अञ्ञो अत्तना पियत्तरो ?"
है तुम्हे सचमुच मल्लिके, कोई अन्य अपने से बढ़ कर प्रिय ?
"नत्थि खो मे महाराज, कोचि अञ्ञो अत्तना पियत्तरो।"
नहीं है महाराज मुझे,  कोई अन्य अपने से बढ़ कर प्रिय ?

अथ खो राजा पसेनदि, कोसलो पासादा ओरोहित्वा
तब राजा पसेनदि कोसलो पासाद से उतर कर
येन भगवा तेनुपसंकमि।
जहाँ भगवान थे, गए।
उपसंकमित्वा भगवन्तं अभिवादेत्वा एकमंतं निसीदि।
जा कर भगवान को अभिवादन कर एक ओर बैठ गए।
एकमंतं निसिन्नो खो राजा पसेनदि भगवन्तं एतद वोच-
एक ओर बैठ कर राजा पसेनदि ने भगवान से यह कहा-

भंते, मल्लिकाय संद्धि सल्लापितं अहं पुच्छि-
भंते, मल्लिका के साथ बातचीत करते हुए मैंने पूछा -
"अत्थि नु खो ते मल्लिके, कोचि अञ्ञो अत्तना पियत्तरो ?"
है तुम्हें सचमुच मल्लिके, कोई अन्य अपने से बढ़ कर प्रिय ?
एवं वुत्ते मल्लिका देवी मं एतद वोच-
यह कहने पर मल्लिका देवी ने मुझे यह कहा -
"नत्थि खो मे महाराज, कोचि अञ्ञो अत्तना पियत्तरो।"
नहीं है मुझे महाराज, कोई अपने से बढ़ कर दूसरा प्रिय)
किंं नु भगवा, नत्थि खो मे, कोचि अञ्ञो अत्तना पियत्तरो ?
क्या सचमुच  भगवान, नहीं है मुझे,  कोई अन्य अपने से बढ़ कर प्रिय ?

अत्थ भगवा एतं अत्थ विदित्वा
तब भगवान ने इसका अर्थ जान कर
तायं वेलायं इमं गाथंं उदानेसि-
उस समय इस गाथा को कहा -
"सब्बा दिसा अनुपरिगम्म चेतसा।
सब दिशा में चारो ओर दौड़ा कर चित्त से
नेवज्झगा(न-एव-अज्झग्गा) पियत्तर अत्तना क्वचि।"
नहीं पाया बढ़ कर प्रिय अपने से कोई(उदान: सोणवग्गो)
अ ला ऊके  @ amritlalukey.blogspot.com

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