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Thursday, August 15, 2019

बौद्धों के पृथक शिक्षा-संस्थान हो-

बौद्धों के पृथक शिक्षा-संस्थान हो-
प्रत्येक समाज की अपनी संस्कृति और संस्कार होते हैं। उनके आदर्श महापुरुष होते हैं,  जिनसे वे प्रेरणा लेते हैं। यह नितांत आवश्यक है कि उनकी संस्कृति की रक्षा की जाए। और इसलिए संविधान निर्माताओं ने इस देश की बहु-सांस्कृतिक भिन्नता के मद्दे-नजर यह संवैधानिक उपबंध किया है कि भिन्न सामाजिक ईकाईयां सदियों पुरानी अपनी सांस्कृतिक पहचान को सुनिश्चित कर सकें।
संस्कृति और संस्कारों को शिक्षा के माध्यम से ही संरक्षित किया जा सकता है। 

  ईकाईयां  बौद्धों के पृथक शिक्षा-संस्थान हो, ठीक उसी तरह जैसे मुस्लिमों के मदरसे, सिक्खों के खालसा स्कूल और क्रिश्चियनों के मिशनरी स्कूल होते हैं. यह बेहद अफ़सोस की बात है कि इस तरफ आम्बेडकराईट आन्दोलनकारियों का ध्यान नहीं जाता है. हम अकल नहीं लगा सकते तो दूसरों की नक़ल तो मार सकते हैं ? 
सारी सत्ता और संसाधनों पर काबिज होने के बावजूद क्या कारण है कि RSS सरस्वती शिशु स्कूल संचालित करता है ? जबकि सरकारी हो या प्राईवेट, पब्लिक स्कूलों में हिन्दू संस्कृति को स्थापित करने की ही शिक्षा दी जाती है ? बहुसंख्यकों के देश में अल्पसंख्यक अपनी संस्कृति और इतिहास को उनके अपने शिक्षा-संस्थानों के मार्फ़त ही जीवित रख सकते हैं. और इसलिए संविधान में अल्पसंख्यकों को अनुच्छेद 29  और 30 के तहत अपनी रूचि के शिक्षा-संस्थानों की स्थापना और प्रशासन चलाने की अनुमति प्रदान की गई है. 
मुस्लिम, क्रिश्चियन, सिक्खों के अपने-अपने शिक्षा-संस्थान है, यहाँ तक कि बहुसंख्यक हिन्दुओं ने भी 'विद्या भारती' नामक एक शीर्षस्थ संस्था के अंतर्गत देश के अधिकांश राज्यों में सरस्वती शिशु स्कूलों की एक बड़ी श्रंखला संचालित कर रखी है, जहाँ वे अकादमिक शिक्षा के अलावा 'नैतिक शिक्षा' के नाम पर अपनी संस्कृति और संस्कारों से बच्चों को अवगत कराते हैं। 

बौद्धों के भी पृथक शिक्षा-संस्थान हों, इस तरफ अम्बेडकराईट चितकों को ध्यान देना चाहिए.

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