Saturday, February 5, 2011

नक्श्लाईट आन्दोलन के साथ खड़ा देश का बुद्धिजीवी वर्ग क्यों ?


           नक्श्लाईट आन्दोलन क्या है और यह कैसे खड़ा हुआ, इसके पीछे जाने की आवश्यकता नहीं है. प्राय लोग जानते हैं. इसमें वे लोग भी शामिल  है, जिन्हें जानने की जरूरत है.यह अलग बात है की लट्ठ वे कहीं और घुमाते हैं. सबकी अपनी-अपनी वजह हो सकती हैं.मगर यह तो साफ है  की हल आपको खोजना पड़ेगा,आज नहीं तो कल. क्योंकि, सरकार द्वारा किये जा रहे उपाय नाकाफी लग रहे हैं.
           आज से १५-१६ साल पहले 'आदिवासी और नक्श्लाईट मूवमेंट' शीर्षक से  मेरा एक लेख प्रकाशित हुआ था. लेख क्या था,ततसम्बद्ध में पत्र-पत्रिकाओं में लिखे गये समाचारों पर मेरी प्रतिक्रिया थी. तब से लेकर आज तक तत्सम्बंध में मेरे विचारों में कोई फर्क नहीं आया है.इसी बीच कई सरकारें बदल गई, मगर त्ताज्जुब की बात है  कि उनकी  'वे आफ डीलिंग' में कोई फर्क नहीं आया है.वे तब भी इसे कानून और व्यवस्था की बात मानते थे और आज भी कमो-बेश वही है.
           इधर कुछ दिनों से देश के एक बुद्धिजीवि वर्ग के दबाव से यद्यपि  देश का  गृह मंत्रालय कानून-व्यवस्था से हट कर भी देखने की बात करता है मगर, सम्बन्धित राज्य खास कर बीजेपी शासित राज्य, केंद्र को कितना सपोर्ट कर पाएंगे,कहना मुश्किल है. बीजेपी शासित राज्य इसलिए कि इसे  पटेल-साहूकारों की पार्टी माना जाता है. और ये पटेल-साहूकार ही है जो आदिवासी बेल्ट में घुसकर पुलिस और प्रशासन से मिलकर निरीह और अनपढ़ आदिवासियों का शोषण करते हैं.यह बात नहीं है की कांग्रेसी दूध के धुले हैं. मगर, चूँकि केंद्र में कांग्रेस की सरकार है, अत वहां 'रजिस्टेंस' कम आँका जा सकता है.
            वास्तव में, नक्श्लाईट आन्दोलन, कानून और व्यवस्था का प्रश्न तो है मगर, सिर्फ ऐसा कहना सतही बात होगी.असल में यह कानून-व्यवस्था फेल होने की बात है. दूर जंगली बीहड़ों में सीधे-साधे आदिवासियों का ये पटेल और साहूकार बुरी तरह शोषण करते हैं.ये तो साफ है कि पैसे वाले पुलिस और प्रशासनिक कर्मियों को जेब में लेकर चलते हैं.और तिस पर आदिवासी बेल्ट, जहाँ 'शहरी धूर्तता और चालाकीपन' घुस भी नहीं पाया है. इतिहास गवाह है की जब कानून का राज फेल हो जाता है तो  लोग हथियार उठाते हैं. असल में, इन भोले-भाले आदिवासियों के शोषण के विरुद्ध सशस्त्र संघर्ष का नाम है- नक्श्लाईट आन्दोलन.और ये कोई रातों-रात उठ खड़ा नहीं हुआ. चारू मजुमदार कोई विदेशी नहीं था ? अगर एक चारू मजुमदार शोषण के विरुद्ध आवाज उठाने की भेट चढ़ जाता है तो दस चारू मजुमदार खड़े होंगे. और यही हो रहा है.
             पूंजी का वितरण समान नहीं हो सकता, ठीक बात है. परन्तु, गरीब को भर-पेट भोजन तो मिलना चाहिए. इसके क्या मायने हुए कि गरीब दिन भर हाड़-तोड़  मेहनत करे किन्तु बदले में मिली मजूरी में उसे शाम का खाना भी  नशीब न हो.वही दूसरी तरफ, देश के नेता और नौकरशाह पैसे से पैसा कमा कर घर के फ्रिज और वाशिंग मशीन में नोटों के बंडल ठूंसते रहें.यह विडम्बना ही है की सरकार की गोदामों में सैकड़ों टन अनाज सड़ते रहता है. मगर, वह उन लोगों तक नहीं पहुंच पाता जिनको बाँटने के लिए गोदामों में भरा जाता है ! स्पष्ट है, जब तक ऐसी व्यवस्था रहेगी,चारू मजुमदार पैदा होते रहेंगे.
               

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