Wednesday, April 14, 2021

धर्म की आवश्यकता

1. यदि नए जगत को किसी धर्म को अपनाना ही हो, ध्यान रहे कि नया जगत पुराने जगत से सर्वथा भिन्न है और नए जगत को पुराने जगत की अपेक्षा धर्म की अत्यधिक जरुरत है, तो वह बुद्ध का धम्म ही हो सकता है. - डॉ अम्बेडकर : बुद्ध और उनके धर्म का भविष्य.

2. समाज को अपनी एकता को बनाये रखने के लिए या तो कानून का बंधन स्वीकारना होगा या फिर नैतिकता का. दोनों के अभाव में समाज निश्चय ही टुकडे-टुकड़े हो जायेगा.

3. हर व्यक्ति का अपना दर्शन होना चाहिए. एक ऐसा मापदंड होना चाहिए जिससे वह अपने जीवन का आचरण परख सकें. क्योंकि जीवन में ज्ञान, विनय, शील, सदाचार का बड़ा महत्व है.

4. मनुष्य सिर्फ पेट भरने के लिए जिंदा नहीं रहता है. उसके पास मन है. मन के विचार को भी खुराक की जरूरत होती है. और धम्म मानव मन में आशा का निर्माण करता है, उसे सदाचार का सुखी जीवन जीने के लिए प्रेरित करता है.

5. कुछ लोग धर्म को व्यक्तिगत समझते हैं. जबकि, बाबासाहब अम्बेडकर के अनुसार बुद्ध का धर्म सामाजिक है. उसका केंद्र बिंदु समाज है. एक आदमी का दूसरे आदमी के बीच व्यवहार का नाम धर्म है. आदमी अगर अकेला है तो उसे धर्म की आवश्यकता नहीं होगी. किन्तु आदमी अकेला नहीं है, वह समाज का अंग है. जहाँ दो आदमी होंगे, वहां धर्म की आवश्यकता होगी.


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