Sunday, November 20, 2011

इन्दोरा (नागपुर) का बुद्ध विहार(Indora Budhd Vihar)

         पिछले अप्रेल 11 में हम लोगों का विजिट नागपुर हुआ था.नागपुर को डा. आम्बेडकर ने नाग लोगों की राजधानी कहा है.लेख है कि एक समय इसे नागों ने बसाया था.डा.आम्बेडकर जैसी अथारिटी के लिखे शब्द मायने रखते हैं.महाराष्ट्र शाशन ने उनकी समस्त लेखनी को जस के तस कई खण्डों में प्रकाशित किया है.आज विश्व-विद्यालयों में उनकी लेखनी पर रिसर्च हो रही है.इतिहास और पुरातत्व खनन से उनके द्वारा लिखे गए शोध-प्रबंधों की पुष्टि की जा रही है.
            डा. आम्बेडकर ने कहा है कि नाग, बौद्ध-धर्मी थे.अर्थात नागपुर बौद्ध धर्म का केंद्र था.यह एक लम्बा पीरियड था.किन्तु कालांतर में यहाँ हिन्दू राज्य स्थापित हुआ.हिन्दू राज्य क्यों और कैसे हुआ, यह इतिहास के विद्यार्थियों के लिए अब अनजान विषय नहीं हैं.आगे डा. आम्बेडकर ने यह भी कहा की आज की महार कम्युनिटी वे ही नाग लोग है.
     महारों के बारे में आम्बेडकर लिखते हैं की यह कौम बड़ी बहादूर कौम है.मूलत: यह लड़ाका कौम है.अपनी इसी विशेषता के कारण इस कौम ने नागपुर को अपनी राजधानी बनाया था.आज अगर आप नागपुर जायेंगे तो यह कौम आप को बड़ी संख्या में मिल जाएगी.कालांतर में ये लोग हिन्दू वर्ण-व्यवस्था के तहत शुद्र से अति-शूद्रों में गिने जाने लगे  थे.हिन्दुओं की छुआ-छूत,गैर-बराबरी और जाति-गत घृणा ने इस कौम को पशुओं से बदतर जीवन जीने के लिए बाध्य किया. मगर,इसी कौम में ही पैदा हुए डा.बाबा साहेब आम्बेडकर के सन 1956  के धर्मान्तरण आन्दोलन के बाद ये लोग बड़ी संख्या में अपने मूल धर्म (बौद्ध धर्म) में लौट आये.अब नागपुर फिर से बौद्ध धर्म की सांकृतिक- राजधानी बन गया है.यहाँ बड़ी संख्या में बौद्ध विहारों का निर्माण हुआ हैं.नागपुर के लगभग प्रत्येक मोहल्ले में आपको बौद्ध विहार मिल जायेंगे.नागपुर ही नहीं,कामठी से लेकर रामटेक और तुमसर तक आप को बड़े-बड़े बौद्ध विहार देखने मिल जायेंगे.पूरे महाराष्ट्र में जितनी बड़ी संख्या में बौद्ध विहार मिलेंगे, देश के अन्य प्रान्तों में  आप को नहीं देखेंगे.
            मगर, इन सब में इन्दोरा का बौद्ध विहार एक अपनी अलग ही पहचान रखता है.बाबा साहेब डा. आम्बेडकर के बौद्ध धर्म की दीक्षा के बाद निर्मित यह सबसे पुराना और भव्य बौद्ध विहार है. यह बात नहीं की इस विहार में हम पहली बार गए हो. दरअसल, हम लोग जिस किसी कारण से नागपुर आते हैं, यहाँ के बौद्ध विहार में जरुर जाते हैं. यह उसी तरह है जिस तरह पंजाब विजिट के दौरान सिख अमृतसर के स्वर्ण मन्दिर में माथा टेकने जाते हैं. बेशक, मामला आस्था का है.मगर,आम्बेडकर के अनुयायियों की आस्था कुछ हट कर है. बौद्ध विहारों में जाने वाले आम्बेडकर के अनुयायियों की धार्मिक भावना का प्रगटीकरण वैसा नहीं होता जैसे की हिन्दू करते हैं. आम्बेडकर के फालोवर बुद्ध विहार तो जाते हैं मगर, वे भगवान् बुद्ध की मूर्ति से कुछ मांगते नहीं, कि उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हो या उन के बच्चे को नौकरी मिले. वे बुद्ध की विशाल मूर्ति के सामने बैठ कर भंते जी की साक्षी में इस बात की  पुन: प्रतिज्ञा लेते हैं कि अपने व्यक्तिगत चारित्रिक-गुणों का विकास वे ठीक उसी तरह करने का प्रयास करेंगे, जैसे की भगवान् बुद्ध ने देशना की है. 

कहानी के मायने धुंध नहीं है

20.11.2011
        कहानी के मायने धुंध नहीं है, जो आपके सामने छाई रहे.कहानी के मायने कथा भी नहीं है कि लोग भाव-विभोर हो सुनते रहे.निश्चित रूप से कहानी के कथानक में ये स्पष्टता होनी चाहिए कि पाठक को साफ-साफ दिखाई दे कि कहानीकार क्या कहना चाहता है.दरअसल, हमारे हिंदी के कहानीकारों में अभी इतना दम-ख़म ही नहीं आया है कि सामाजिक-धार्मिक मसलों पर वे अपनी बात खुल कर रख सके.शायद, वे धर्म के ठेकेदारों से डर कर अपनी बात गोल-मोल तरीके से कहना ज्यादा पसंद करते हैं. साहित्यिक पत्रिका 'अन्यथा' में प्रकाशित जया जादवानी की कहानी 'तिश्नगी' मुझे टाईम-पास लगी.बेशक कथानक मनोरंजक है.

Wednesday, November 16, 2011

धर्म के नाम पर लोग इतने अंधे क्यों ?

       दैनिक भाष्कर जबलपुर 15 नव. 11 में प्रकाशित खबर के अनुसार, हरिद्वार के गायत्री महाकुम्भ के दौरान मची भगदड़ में 20 लोग मारे गए और 50 से अधिक घायल हुए हैं. शांति कुञ्ज के गायत्री यज्ञ में शामिल होने आये कई लोग अभी भी लापता बतलाये जाते हैं. ज्ञात हो  कि 1551 यज्ञ शालाओं में हवन के दौरान मची भगदड़ में ये हादशा हुआ.शांति कुञ्ज के प्रमुख डा. प्रणव पंडया ने दावा किया है कि अधिकतर लोगों की मृत्यु दम घुटने से हुई  हैं. लेकिन पोस्ट मार्टम रिपोर्ट के अनुसार डा. पंडया के दावे झूटे शाबित हुए हैं.
      अमूमन इस तरह के हादशों के बाद हो-हल्ला मचता है.जाँच की जाती है और चूँकि, मामला धार्मिक आस्था से जुड़ा होता है, अत: धर्म-मठाधीशों के दबाव के चलते कु-व्यवस्था सबंधी तथ्य दबा दिए जाते है.क्योंकि, अफसर और नेता दोनों माथा टेकने तो वहीँ जाते हैं.कुछ समय के बाद धर्म-भीरु जनता भी सोचती है- छोडो यार, पोल तो अपनी ही खुल रही है.जहाँ तक मिडिया की बात है, वह युधिष्टिर के 'नरो वा कुंजरों' की स्थिति  अख्तियार कर लेता है, मामलों में.
       आपको याद होगा, अभी इसी साल शबरीमाला में मकर्ज्योती का दर्शन करने पहुचे 102 लोग मौत के मुंह में समा गए थे.पिछले वर्ष मार्च में उ.प्र. के प्रतापगढ़ के कृपालु महाराज के आश्रम में प्रसाद वितरण के दौरान मची भगदड़ में 63  लोगों की जान गई थी. इसी प्रकार हिमाचल प्रदेश के नैनी देवी के मंदिर में  162 लोग मृत्यु के मुंह में समा गए थे.जोधपुर के चामुंडा मंदिर में मची भगदड़ में 249 लोगों की मौत, लोग अभी भूले नहीं होंगे. जन. 2005 में महा.के सतारा जिले के मांधर देवी के मंदिर में मची भगदड़ में 300 लोगों की जान गई थी. इसी तरह सन 2003 में नाशिक के कुम्भ मेले में 40 लोग मौत के मुंह में समा गए थे. उधर, मुसलमानों का हाल भी कम बुरा नहीं है. दर साल जो काबा और मक्का-मदीना जाते हैं,सैकड़ों की संख्या में कीड़े-मकोड़ों की तरह मारे जाते हैं.
        सवाल व्यवस्था का नहीं है.लोग अंधे हो जाते हैं,इस तरह के मौकों पर.लोग पिल पड़ते हैं, ऐसे मौकों पर जाने के लिए.जगह नहीं तो ट्रेन की छत पर चढ़ जाते हैं.माथे पर चमकीले गहरे लाल कपड़े की पट्टी बांध लेतें हैं.अधिकांश अफीम या गांजे की पिनक में होते हैं. इसीलिए तो मार्क्स ने धर्म को अफीम कहा है.
        धार्मिक आयोजनों में लोग अक्ल को साथ लेकर नहीं चलते.असल में धर्म और अक्ल का आपस में कोई रिश्ता ही नहीं है.जहाँ धर्म है, वहां अक्ल नहीं होती और जहाँ अक्ल होती है, वहां धर्म नहीं होता.धर्म के ठेकेदार भी यही चाहते हैं. ये मठाधीश अच्छी तरह जानते हैं कि जहाँ लोगों को  अक्ल आई, धर्म को उन्होंने छोड़ा.अत: वे भरसक कोशिश करते हैं कि अक्ल और धर्म का घाल-मेल न हो.
       मगर बीइंग ए ह्यूमन, लोगों के पास अक्ल तो होती ही है.अब होता यह है कि लोग टाइम बीइंग के लिए अंधे बन जाते हैं, इस तरह के धार्मिक हवन और यज्ञों में जाने के लिए.आप ही बतलाइए,सत्यनारायण की कथा में एक डाक्टर और इंजिनियर जा सकता है क्या ?  मगर सत्य यही है कि ये डाक्टर और इंजिनियर न केवल जाते हैं बल्कि, अपने यहाँ चौथी-पांचवी पढ़े पंडित को बुला कर कथा करवाते हैं ! आप जहाँ पले-बढे, उस घर और परिवार के संस्कार आप कैसे भूल सकते हैं ? आपकी दादी, नानी, काका घर के वरिष्ठ क्या आपको छोड़ देंगे ? नहीं जनाब, यह इतना आसान नहीं है. कालेज के विज्ञानं की क्लास में आर्कमिडीज और न्यूटन की थ्योरी पढाना अलग बात है. किन्तु ,घर में सत्यनारायण की कथा करने पर सवाल उठाना बिलकुल जुदा बात है.

Monday, November 14, 2011

बाग़बाहरा का संजय कानन पार्क(Sanjay Kanan Park)

       पिछले सित. 11 को हमारा विजिट बागबाहरा हुआ था.जैसे कि मैं पूर्व  में बतला चुका हूँ,बागबाहरा महासमुंद में है.यह स्थान राईस मिलों के लिए फेमस है.धान की फसल यहाँ खूब होती है.सितम्बर महीने में न तो खूब गर्मी होती है और न ही ठंड.मुझे लगता है, घूमने के हिसाब से काफी माकूल समय है.
     यहाँ मेरे ब्रदर-इन-ला प्रदीप जी रहते हैं.वे रेशम विभाग में हैं.हम लोग 30-35 साल बाद  पहली बार उनके यहाँ गए थे.मेरा बीते दिस. 10 में अपनी सर्विस से रिटायरमेंट हो चुका था. जाहिर है, मैं काफी हल्का और फ्री महसूस कर रहा था.बागबाहरा में करीब एक सप्ताह के प्रवास में एक दिन प्रदीप जी हमें पास के ही पार्क-नूमा जंगल में ले गए.इसे संजय कानन पार्क के नाम से जाना जाता है.पार्क, शहर के जस्ट बाहर बिलकुल लगा हुआ ही है. मुख्य सडक से लगी बड़ी सी गेट में प्रवेश करते ही आप किसी घने जंगल में प्रवेश करते हैं.बांस के बड़े-बड़े झुंडों से आप घिर जाते हैं.सूर्य की किरणे भी बड़ी मुश्किल से पहुंचे,ऐसे जंगल-नूमा पार्क में आप खुद को पाते हैं.
     बेशक यह जंगल-नूमा पार्क, बनाया गया है. वर्ना शहर से जुड़ा इतना घना जंगल हो ही नहीं सकता. पार्क के अन्दर जगह-जगह वे सब चीजें बनायीं गई हैं, जिनकी आप एक खुशनुमा पार्क में अपेक्षा करते है.निश्चित रूप से यह विजिट करने लायक है.आप पार्क की सुख-सुविधा और इंटरटेनमेंट के साधन देख कर निश्चित रूप से पार्क की मेनेजमेंट कमेटी को सेलूट करेंगे.
       पार्क काफी विस्तृत क्षेत्र में है और पुरे एरिया को बड़े सलीके से कवर किया गया है.पार्क को मेंटेन करने वाला स्टाफ भी हमें काफी चुस्त-दुरुस्त लगा.सब अपने-अपने कामों में व्यस्त लगे.करीब दो घंटे हम ने वहां बिताया.खूब मजा आया.जब आप दिन-भर की भाग-दौड़ के बाद ऐसे पार्क में जाते हैं तो दिल तर हो जाता है.कई जगह मैंने देखा है कि पार्क तो बने है किन्तु शहर से काफी दूर बनाये गए हैं. अब आपको वहां जाने के लिए अलग से प्लानिंग करनी होती है. मुझे लगता है, इन कार्यों से सम्बन्धित अथारिटियों को इस बागबाहरा के संजय कानन पार्क से सिख लेनी चाहिए.

अनागारिक धम्मपाल (Anagarik Dharmapal)

अनागारिक धम्मपाल(1864 -1933)
अनागारिक धम्मपाल बुद्धिष्ट जगत के लिए एक प्रकाश-स्तम्भ हैं। भारत में बौद्ध धर्म के पतन के हजारों वर्षों बाद अनागारिक धम्मपाल ही थे जिन्होंने न सिर्फ इस देश में बौद्ध धर्म का पुन: झंडा फहराया वरन एसिया,यूरोप और उत्तरी अमेरिका में इसके प्रचार-प्रसार के लिए व्यापक पैमाने पर काम किया।

अनागारिक धम्मपाल का जन्म कोलम्बो (श्रीलंका) के पोटान जिले के हेवाविताराना में 17 दिस. 1864 को हुआ था। इनके बचपन का नाम डेविड था। डेविड का जन्म एक धनी व्यापारी के घर हुआ था। उनके पिता का नाम डॉन केरोलिस और माता का नाम मल्लिका धर्मागुनवर्धने था।

 बालक डेविड के शुरूआती जीवन में मेडम ब्लावास्त्सकी और कर्नल ओलकोट्टहाद का बहुत बड़ा योगदान है।  सन 1875 के दौरान मेडम ब्लावास्त्सकी (Blavatsky) और कर्नल ओलकोट्टहाद (Olcotthad) ने अमेरिका के न्यूयार्क शहर में थियोसोफिकल सोसायटी( Theosophical society) की स्थापना की थी। इन दोनों ने  बौद्ध धर्म का गहन अध्ययन किया था। सन 1880  में जब ये सिंहल द्वीप आएं तो इन दोनों ने न सिर्फ स्वयं को बुद्धिस्ट घोषित कर दिया वरन बौद्ध भिक्षु का चीवर धारण कर लिया।

मेडम ब्लावास्त्सकी और कर्नल ओलकोट्टहादबाद ने सिंहलद्वीप में रहते हुए 300 के ऊपर स्कूल खोलें और बौद्ध धर्म की शिक्षा पर व्यापक काम किया।  डेविड इनसे काफी प्रभावित थे। डेविड को पालि सिखने की प्रेरणा इन्हीं से मिली थी। यह वह समय है जब, डेविड ने अपना नाम बदल कर 'अनागारिक धम्मपाल' कर दिया था।

 सन 1891 में अनागारिक धम्मपाल ने भारत स्थित बुद्धगया के महाबोधि महाविहार की यात्रा की। यह वही पवित्र स्थान है जहाँ, सिद्धार्थ गौतम को बुद्धत्व की प्राप्ति हुई थी। अनागारिक धम्मपाल यह देख कर अचंभित रह गए कि किस तरह हिन्दू पंडा-पुजारियों ने बुद्ध के मूर्तियों को हिन्दू देवी-देवताओं की मूर्तियों में तब्दील कर दिया है। हिन्दू पंडा-पुजारियों ने तब, महाबोधि महाविहार में बौद्धों को प्रवेश करने से निषेध कर रखा था।

भारत में बौद्ध धर्म ओर बौद्ध तीर्थ-स्थलों की बेदशा देख कर अनागारिक धम्मपाल को बेहद दुक्ख हुआ। बौद्ध धर्म-स्थलों की बेहतरी के लिए आपने विश्व के कई बौद्ध देशो को पत्र लिखा। आपने इसी कि निमित्त सन 1891 में महाबोधि सोसायटी की स्थापना की।  तब, इसका हेड-आफिस कोलम्बो था। किन्तु शीघ्र ही इसे कलकत्ता स्थान्तरित किया गया।

महाबोधि सोसायटी की ओर से अनागरिक धम्मपाल ने एक सिविल सुट दायर किया जिसमे मांग की गई थी कि महाबोधि महाविहार और दूसरे अन्य तीन प्रसिध्द बौद्ध-स्थलों को बौद्धों को हस्तांतरित किये जाएं। इसी रिट का ही परिणाम था कि आज महाबोधि महाविहार में बौद्ध जा सकते हैं। परन्तु तब भी यहाँ आज भी हिन्दुओं का कब्ज़ा है।

यह अनागारिक धम्मपाल का ही प्रयास था कि कुशीनगर, जहाँ भगवान् बुद्ध का परिनिर्वाण हुआ था, फिर से बौद्ध जगत में दर्शनीय-स्थल बन गया।

शिकागो में संपन्न विश्व धर्म-संसद, जो 18 सित. सन 1893 में हुई थी; अनागारिक धम्मपाल के द्वारा बौद्ध-दर्शन पर दिए भाषण से वहां पर उपस्थित दुनिया के विभिन्न धर्मों के विद्वान् भौचक्क रह गए थे।  इसी धर्म-संसद में हिन्दू दर्शन पर स्वामी विवेकानंद का भाषण हुआ था।

अपने जीवन के 40 वर्षों में, अनागारिक धम्मपाल ने  भारत, सिंहलद्वीप और विश्व के कई देशों में बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार के अनन्य उपाय किए. आपने कई स्कूल और अस्पतालों का निर्माण किया।  कई स्थानों पर  आपने बुद्ध विहारों का निर्माण किया।  सारनाथ का प्रसिध्द बुद्ध महाविहार आपने ही बनाया था।

13 जुला.1931 को अनागारिक धम्मपाल विधिवत बौद्ध भिक्षु हो गए थे। बौद्ध भिक्खु बनने के बाद आपका  नाम  'देवमिता धम्मपाल' हो गया था ।  धम्म के इतने बड़े पुरोधा 29 अप्रैल सन 1933 को इस दुनिया से अलविदा हो गए।