Saturday, June 16, 2018

गिलान सुत्त(सु. नि.)

अत्त दीपा विहरथ अत्तसरणा
एवं में सुत्तं,  एकं  समयं भगवा वेसालियं विहरति वेळुवगामे।
ऐसा मैंने सुना, एक समय भगवान वैशाली के वेलुवगाम में विहार करते थे।

अथ खो भगवतो वस्स-उपगतस्स खरो आबाधो उप्पज्जि, बाळ्हा वेदना वत्तन्ति मारणन्तिका।
तब उस वर्षा-वास में भगवान् को बड़ी गंभीर बीमारी हुई, बहुत अधिक(बाळ्हा) मरणान्तक पीड़ा होने लगी ।

अथ खो भगवतो सो आबाधो पटिप्पस्सम्भि ।
तब भगवान की यह बीमारी शांत हुई ।

अथ खो भगवा गिलाना वुट्ठितो आबाधाय निक्खमित्वा विहार पच्छायायं पञ्ञते आसने  निसीदि।
तब भगवान बीमारी से उठ, ब्याधि से निकल, विहार के पीछे, छाया में बिछे आसान पर बैठे ।

अथ खो आयस्मा आनन्दो येन भगवा तेनुपसंकमि; उपसंकमित्वा भगवन्तं अभिवादेत्वा एकमन्तंं निसीदि।तब, आयु. आनंद जहाँ भगवान थे, वहां गए और भगवान को अभिवादन कर एक ओर बैठे ।

 एकमन्तंं निसिन्नो खो आयस्मा आनन्दो भगवन्तं एतदवोच-
एक और बैठे आयु, आनंद ने भगवान को कहा-

दिट्ठो  मे, भंते ! भगवतो फासु। दिट्ठं, मे भंते! भगवतो खमनीयं ।
देखा मैंने, भंते! भगवान को सुखी । देखा, मैंने भगवान अच्छा हुए ।

अपि च भंते ! दिसापि मे न पक्खायन्ति।  धम्मा पि मं न पटिभन्ति भगवतो गेलञ्ञेन।
किन्तु भंते ! दिशाएं मुझे सूझ नहीं रही थी। चीजें  (धम्मा ) भी  नहीं समझ रही थी भगवान् की बीमारी से  ।

अपि च मे भंते ! अहोसि काचिदेव(कुछ) अस्सासमता-
फिर भी भंते !, कुछ आश्वासन इस बात का था कि

न ताव भगवा परि निब्बायिस्सति, न याव भगवा भिक्खु-संघं आरब्भ किंचिदेव उदाहरति।
भगवान तब तक महापरिनिब्बान को प्राप्त नहीं करेंगे, जब तक भिक्खु-संघ से कुछ कह-सुन न लें।

किंं पन इदानि आनंद ! भिक्खुसंघो मयि पच्चासिंंसति ?
किन्तु आनंद ! इस समय(इदानि) भिक्खु-संघ मुझसे क्या चाहता है ?

देसितो, आनंद ! मया धम्मो अनन्तरं अबाहिरं करित्वा।
उपदेश कर दिए है आनंद मैंने,  न-अन्दर, न-बाहर करके।  

नत्थि आनंद ! तथागतस्स धम्मेसु आचरिय मुट्ठि।
नहीं है, आनंद ! धर्मों में तथागत को (कोई ) आचार्य-मुट्ठि ।

यस्स नून, आनंद ! एवमस्स- अहं भिक्खु संघं परिहरिस्सामि वा, मम उद्देसिको भिक्खु संघो वा,
जिसको आनंद! ऐसा हो(एवमस्स)- मैं भिक्खु-संघ को धारण करता हूँ, अथवा भिक्खु-संघ मेरे उद्देश्य से है,

सो नून आनंद ! भिक्खु संघं आरब्भ किंचिदेव(कुछ) उदाहरेय्य।
वह जरूर(नून) आनंद ! भिक्खु-संघ के लिए कुछ कहें ।

तथागतस्स खो आनंद ! न एवं होति।
तथागत को आनंद,  ऐसा नहीं होता है।

सो किंं आनंद ! तथागतो भिक्खु संघं आरब्भ किंचि देव उदाहरिस्सति।
आनंद ! तथागत भिक्खु-संघ के लिए क्या कहेंगे !

एतरहि खो पन आनंद ! जिन्नो, वुद्धो महल्लको वयो अनुप्पत्तो। आसीतिको मे वयो वत्तति।
अब तो किन्तु आनंद!  मैं जीर्ण, वृद्ध, वय प्राप्त हूँ। अस्सी वर्ष मेरी आयु है।

सेय्यथापि, आनंद ! जज्जर  सकटं वेठमिस्सकेन यापेति,
जैसे, आनंद! जैसे जर्जर(जज्जर) बैलगाड़ी(सकट ) बांध-बूंध कर चलती है,

एव मेव, खो, आनंद ! वेठमिस्सकेन तथागतस्स कायो यापेति।
वैसे ही आनंद ! तथागत की काया बांध-बूंध  का चल रही है।

तस्मातिह  आनंद ! अत्त दीपा विहरथ, अत्तसरणा, अनञ्ञसरणा,
इसलिए आनंद,  अपने आप निर्भर होओ , अपनी शरण आप बनो,  किसी दूसरे के भरोसे मत रहो।

धम्मदीपा, धम्मसरणा  अनञ्ञसारणा।
धम्म पर ही निर्भर होओ।  अपनी शरण धम्म को बनाओ।  किसी दूसरे के भरोसे मत रहे।

Therefore,  Anand, Be island unto yourselves
  स्रोत- गिलान सुत्त ; मगवग्ग: सुत्त निपात
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पटिप्पस्सम्भति - शांत होना।  पसम्भति(प- सम्भति)-  शांत होना  to calm down, to be quiet.
खर- कठोर, दुक्खद।
फासु- सुख/आराम दायक।
पच्चासिंंसति- आशा करना, इच्छा करना
परिहरति - संभालना, रक्षा करना।
वेध मिस्सकेन- बांध-बूंध के
उदाहरति - कथन कहना। to utter, to recite, to speak.
एतरहि- अब    

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