Saturday, June 2, 2018

पुण्ण सुत्त(सं. नि.)

बुद्ध ने अपने धम्म में कोई जाति, वर्ण अथवा देस-प्रदेस की सीमा का बंधन नहीं रखा था। और यही कारण है कि उनका धम्म उनके रहते ही उनकी अपनी विचरण भूमि की सीमा लाँघ गया। उनके चार प्रधान संघ नायकों में महाकात्यायन पहले, उज्जेनी के राज पुरोहित रह चुके थे। यहाँ तक कि  पतिट्ठान (पैठन/ हैदराबाद ), तक्खसिला और सूनापरांत (दक्षिण गुजरात ) के लोग बुद्ध के पास आकर भिक्खु बने थे(राहुल सांकृत्यायन: बौद्ध संस्कृति पृ. 57 )।
लोग दूर-दूर से आते, धम्म में पारंगत होते और प्रचार के लिए निकल पड़ते। बुद्ध भी जांच-परख कर ही उन भिक्खुओं को विदा करते थे। सूनापरांत के निवासी भिक्खु पूर्ण ने बुद्ध से उपदेस ले विदा मांगी- "पुण्ण ! क़तरस्मिंं जनपदे विहरिस्ससि(पूर्ण! तुम किस जनपद में विचरण करोगे ?)"
"भंते! सुनापरंतो नाम जनपदो, तत्थ अहं विहरिस्सामि(भंते! सूनापरांत नामक एक जनपद है, मैं वहां विचरण करूँगा)।"
"चंण्डा च फरुसा, पुण्ण! सुनापरान्तका मनुस्सा । सचे ते, तं अक्कोसिस्सन्ति, परिभासिस्सन्ति , तत्थ किं भविस्सति(पूर्ण! सुनापरांत के लोग चंड और कठोर होते हैं। यदि वे तुम पर आक्रोशित होंगे,  गाली देंगे, तो क्या होगा) ?'
"तत्थ भंते, एवं भविस्सति-  भद्दका सुनापरन्तका मनुस्सा, सुभद्दका सुनापरन्तका मनुस्सा, यं मे नयिमे(न-इमे) पाणिना पहारंं देन्ति(भंते ! मुझे यह होगा कि सुनापरांत के लोग भले हैं, बहुत भले हैं जो वे मुझे हाथ से नहीं मारते) ।"

"सचे  पन  ते, पुण्ण,  सुनापरन्तका  मनुस्सा पाणिना पहारंं दस्सन्ति, तत्थ किं भविस्सति(यदि पूर्ण! सुनापरांत के लोग तुझे हाथ से मार-पीट करें तो क्या होगा) ?"
"तत्थ मे भंते, एवं भविस्सति-  भद्दका सुनापरन्तका  मनुस्सा, सुभद्दका सुनापरन्तका मनुस्सा, यं मे नयिमे लेड्डुना  पहारंं देन्ति(भंते ! मुझे यह होगा कि सुनापरांत के लोग भले हैं, बहुत भले हैं जो वे मुझे लाठी से नहीं मारते)।"

"सचे  पन  ते, पुण्ण, लेड्डुना पहारंं दस्सन्ति, तत्थ किं भविस्सति(पूर्ण ! यदि वे लाठी से मारें तो क्या होगा) ?"
"तत्थ मे भंते, एवं भविस्सति-  भद्दका सुनापरन्तका  मनुस्सा, सुभद्दका सुनापरन्तका मनुस्सा, यं मे नायिमे सत्थेन पहारंं देन्ति(भंते ! मुझे यह होगा कि सुनापरांत के मनुष्य भले हैं, बहुत भले हैं जो वे मुझे किसी शस्त्र से नहीं मारते।"

"सचे  पन  ते, पुण्ण, सत्थेन पहारंं देन्ति, तत्थ किं भविस्सति(पूर्ण ! यदि शस्त्र से मारे तो क्या होगा) ?"
"तत्थ मे भंते, एवं भविस्सति-  भद्दका सुनापरन्तका  मनुस्सा, सुभद्दका सुनापरन्तका मनुस्सा, यं मे नायिमे जीविता वोरोपेन्ति(भंते ! यह होगा कि सुनापरंत  के मनुष्य भले हैं, बहुत भले हैं जो मुझे जान से नहीं मार डालते) ।"

"साधु ! साधु ! साधु ! पुण्ण,  इमिना दमूपसमेन(दम-उपसमेन) समन्नागतो सुनापरंतस्मिं जनपदे त्वं वत्थुं सक्खिस्ससि (साधु! साधु ! साधु ! पूर्ण ! इस धम्म-संयम से युक्त सुनापरंत जनपद में तुम निवास कर सकते हो)।"
(स्रोत-पुण्ण सुत्त: संयुक्त निकाय 34/4/6; पृ. 477 )।"
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टिप-  1. ति-पिटक के इन उपदेसों/कथानकों को पालि में देने का उद्देश्य धम्म के साथ  पालि भासा का प्रचार भी है।
         2. अबौद्ध वर्ण/सब्दावली  यथा श्र, ऋ, श , क्ष त्र और देव/देवता, ब्रम्ह, ॐ आदि से यथा संभव बचा जाता है ।      

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