Tuesday, June 5, 2018

रतनसुत्त (Ratana Sutta)

अबौद्ध शब्दों का स्थानापन्न-
वर्तमान में, बुद्ध वंदना अथवा परित्राण-पाठ के समय संगायन किए जाने वाले सुत्त और गाथाओं में अबौद्ध शब्दों का स्थानापन्न किया गया है। सनद रहे, बाबासाहब डॉ अम्बेडकर ने 'बुद्धा एंड धम्मा' में धम्म-ग्रंथों में प्रयुक्त कई शब्दों का ब्राह्मणवादी रूढ़ अर्थ न कर बुद्ध के चिन्तन और शैली से मेल खाते हुए वैज्ञानिक और बुद्धिगम्य भावार्थ किया है(बुद्ध, अम्बेडकर और धम्मपद: डॉ सुरेन्द्र अज्ञात)। बाबासाहब के इन्हीं पद-चिन्हों पर चलते हुए 'रतन सुत्त' में आवश्यक संशोधन किया है। 'बुद्धा एंड धम्मा' में हम सम्बंधित पद/गाथा न पढ़ उसका अर्थ और भावार्थ पढ़ते हैं, जबकि बुद्ध वंदना और परित्राण-पाठ के समय संगायन किए जा रहे सुत्त और गाथाओं में हम पद/गाथा पढ़ते हैं। इसलिए शब्दों का स्थापन्न आवश्यक हैं। 

रतनसुत्त
Ratana Sutta

कोटी सत सहेस्ससु , चक्कवालेसु  अरहता* ।
Kotî sata sahessasu, cakkavâlesu  Arahatâ
शत-सहस्र-कोटि(कोटि-सत सहेस्ससु), चक्रवालों के निवासी(चक्कवालेसु) अर्हत
Hundred and thousand crores residential Arhatas

येसानं  पटिग्गण्हन्ति, यं च वेसालिया पुरे
Yesâñañ patiggañhanti, yañ ca Vesâliyâ pure
जिनको(येसानं ) स्वीकार करते(पटि-गण्हन्ति) हैं, तथा जिससे(यं) वेसाली नगर(वेसालिया पुरे) में
Who is recognised with his immense power and from which, in Vaishali town

रोगा-अमनुस्स-दुब्भिक्खं, सम्भूतं ति-विधं भयं
Rogâ-amanussa-dubbhikkhañ, sambhûtañ ti-vidhañ bhayañ,
रोग, अमनुष्य(रोग-अमनुस्स), दुर्भिक्ष(दुब्भिक्खं); से उत्पन्न(सम्भूतं) ति-विध भय
With three kinds of danger caused by pestilence, calamity, famine

खिप्पं अन्तरधापेसि, परित्तं तं भणामहे।
Khippañ antaradhâpesi, parittañ tañ bhaòâmahe.
तत्काल(खिप्पं) अन्तर्धान(अन्तरधापेसि) हो गए; उस परित्तं को कहते(भणामहे) हैं ।
Was libertated instantly, that Parittam(Protective discourses) chants here.


यानीध भूतानि समागतानि, भुम्मानि वा यानि व अन्तलिक्खे।
Yânîdha bhûtâni samâgatâni, bhummâni vâ yâni va antalikkhe
जो भी यहां(यानि-इध) भूतादि(प्राणी) एकत्रित हैं, भूमि अथवा(वा) यहां अन्तरिक्ष के(अन्तलिक्खे)
Whatever beings are assembled here, whether terrestrial or celestial

सब्बे’व भूता सुमना भवन्तु , अथो’पि सक्कच्च सुणन्तु भासितं ।।1।।
Sabbe'va bhûtâ sumanâ bhavantu, atho'pi sakkacca sunantu bhâsitañ
वे सभी(सब्बे-इव) प्राणी सुमना होे और हमारे इस कथन(भासितं) को सावधानी से(सक्कच्च) सुनें।
May  you all be pleasant and listen closely to what is said.

तस्माहि भूता निसामेथ सब्बे, मेत्तं करोथ मानुसिया पजाय।
Tasmâhi Bhûtâ nisâmetha sabbe, mettañ karoth mânusiyâ pajâya
इसलिए प्राणी ध्यान से सुनें(निसामेथ), मनुष्य-मात्र(मानुसिया-पजाय) से मैत्री (मेत्त) करें(करोथ)
Therefore,  please give good heed; all  living beings and pay love-kindness to human beings

दिवा च रत्तो च हरन्ति ये बलिं, तस्माहि ने रक्खथ अप्पमत्ता।।2।।
Divâ ca ratto ca haranti ye baliñ, tasmâhi ne rakkhatha appamattâ
जो(ये) दिन-रात भोजनादि(बलिं) लाते(हरन्ति) लाते हैं/की व्यवस्था करते हैं, इसलिए(तस्माहि) अप्रमत्त(अप्पमत्ता) हो उनकी(ने/नं) रक्षा करो(रक्खथ)।
Who day and night,  bring food to you; guard them therefore, vigilantly.

यं किञ्चि वित्तं इध वा हुरं वा, सग्गेसु वा यं रतनं पणीतं,
Yañ kiñci vittañ idha vâ hurañ vâ, saggesu vâ yañ ratanañ paòîtañ
इस लोक(इध) अथवा अन्य लोक(हुरं) में जो कुछ(यं किञ्चि) वित्त(धन) है अथवा सग्गेसु(कल्पित स्वर्ग) में अमूल्य(पणीतं) रत्न हैं;
Whatever treasure is in this world or other or the precious jewels in the  pleasant imaginary world

न नो समं अत्थि, तथागतेन,
Na no samañ atthi, Tathâgatena
नहीं, नहीं है(नो) सदृश्य(समं), तथागत(बुद्ध) से

इदं’पि बुद्धे रतनं पणीतं, एतेन सच्चेन सुवत्थि होतु।।3।।
Idañ’pi Buddhe ratanañ pañîtañ, etena saccena suvatthi hotu
यह भी(इदं-अपि) बुद्ध में अमूल्य(पणीतं) रत्न है, इस सत्य से(एतेन सच्चेन) कल्याण(सु-अत्थि) हो
No, None is comparable to the Perfect One

खयं विरागं अमतं पणीतं, यदज्झगा साक्यमुनी समाहितो,
Khayañ virâgañ amatañ pañîtañ, yadajjhagâ sâkyamunî samâhito
राग-क्षय(खयं), विरागी, अमृत को जब प्राप्त किया(यद-अज्झगा); एकाग्र-चित्त(समाहितो) शाक्य मुनि(बुद्ध) ने
That Cessation, Passion-free, Immortality Supreme; through concentration that the tranquil sage of the Sakyas reailzed

न तेन धम्मेन, सम‘त्थि किञ्चि,
Na tena Dhammena, sam'atthi kiñci,
नहीं(न), उस(तेन) धम्म से(धम्मेन) समान है(समं-अत्थि) अन्य कुछ(किञ्चि)
There is nothing comparable to the Dhamma

इदं’पि धम्मे रतनं पणीतं, एतेन सच्चेन सुवत्थि होतु।।4।।
Idañ'pi Dhamme ratanañ pañîtañ, etena saccena suvatthi hotu.
यह भी(इदं अपि) धम्म में(धम्मे); अमूल्य(पणीतं) रत्न है, इस सत्य से कल्याण(सुवत्थि) हो।
In the Dhamma, is this precious jewel found; by this truth may there be happiness. 

यं बुद्धसेट्ठो परिवण्णयी सुचिं, समाधिं आनन्तरिकं नं आहु
Yañ Buddhasettho parivaññayî suciñ, Samâdhiñ-ânantarikañ nañ âhu
बुद्ध-श्रेष्ठ(बुद्धसेट्ठो) ने जिसे(यं) सूचिता(सुचिं) कहकर प्रशंसा(परि-वण्णयी) कीे है, उसकोे(नं) तत्काल फलदायी(आनन्तरिकं) समाधी; आहु(कहा) है।
The sanctity praised by the Buddha supreme is described as; Concentration with immediate effect.

समाधिना तेन, समो न विज्जति,
Samâdhinâ tena, samo na vijjati
उस(तेन) समाधि के(समाधिना) समान नहीं है(समो न) विद्यमान(विज्जति)।
In them, nothing is comparable to that 'Samadhi' 

इदं’पि धम्मे रतनं पणीतं, एतेन सच्चेन सुवत्थि होतु।।5।।
Idañ'pi Dhamme ratanañ pañîtañ, etena saccena suvatthi hotu
यह भी(इदं-अपि) धम्म में अमूल्य(पणीतं) रत्न है, इस सत्य से कल्याण(सुवत्थि) हो
In the Dhamma, is this precious jewel found; by this truth may there be happiness.

ये पुग्गला अट्ठ सतं पसत्था, चत्तारि एतानि युगानि होन्ति,
Ye Puggalâ attha satañ pasatthâ, cattâri  etâni yugâni honti
जिन(ये) पुग्गला अट्ठ(निर्वाण की ओर अग्रसर आठ प्रकार के साधक) की सतं(बुद्ध ने) प्रशंसा(पसत्था) की है, जिनके(एतानि) चार युग्म(युगानि) होते(होन्ति) हैं
Those eight Individuals, praised by the virtuous, constitute four pairs

ते दक्खिणेय्या सुगतस्स सावका, एतेसु दिन्नानि महाफ्फलानि,
Te dakkhiñeyyâ Sugatassa sâvakâ, etesu dinnâni mahâphphalâni
वे दक्षिणा देने योग्य(दक्खिणेय्या), सुगत के(बुद्ध) सावक हैं, उनको(एतेसु) दिया हुआ दान(दिन्नानि ) महाफलदायी(महाफलानि )होता है।
They , the worthy of offering, the disciple of the Sugat (Buddha),  gifts given to them yield abundant fruits

इदं’पि सङघे रतनं पणीतं, एतेन सच्चेन सुवत्थि होतु।।6।।
Idañ'pi Sanghe ratanañ pañîtañ, etena saccena suvatthi hotu
यह भी(इदं-अपि) संघ में अमूल्य(पणीतं) रत्न है, इस सत्य से(एतेन सच्चेन) कल्याण(सुवत्थि) हो
In the Sangha, is this precious jewel found; by this truth may there be happiness.

ये सुप्पयुत्ता मनसा दल्हेन, निक्कामिनो गोतम-सासनम्हि,
Ye suppayuttâ manasâ dalhena, nikkâmino Gotama-sâsanamhi
जो सु-पयुत्ता(सोतापन्नादि साधक) पुरुष दृढ़तापूर्वक(दल्हेन) मन से(मनसा), निष्काम होकर(निक्कामिनो) गौतम(बुद्ध) के सासन में(सासनम्हि) संलग्न हैं;
With firm minds, exempt from passion, applying themselves persevering in Gotama’s Sasana

ते पत्तिपत्ता अमतं विगय्ह, लद्धा मुधा निब्बुतिं भुञ्जमाना।
Te pattipattâ amatañ vigayha, laddhâ mudhâ nibbutiñ bhuñjamânâ
प्राप्तव्य को प्राप्तकर(पत्तिं-पत्ता) वे(ते) अमृत में(अमतं) गोता लगाकर(विगय्ह) मुधा(बिना मूल्य) निर्वाण-सुख (निब्बुतिं) का आस्वादन(भुञ्जमाना) प्राप्त(लद्धा ) करते हैं। 
They have attainded what should be attained, and, plunging into greatest pleasure, enjoy the 'Nibbana' obtained without price

इदं’पि सङघे रतनं पणीतं, एतेन सच्चेन सुवत्थि होतु।।7।।
Idañ'pi Sañghe ratanañ pañîtam, etena saccena suvatthi hotu
यह भी(इदं-अपि) संघ में अमूल्य(पणीतं) रत्न है, इस सत्य से कल्याण(सुवत्थि) हो
In the Sangha, is this precious jewels found, by this truth may there be happiness

यथिन्दखीलो पठविं सितो सिया, चतुब्भि वातेहि असम्पकम्पियो।
Yatha-inda-khîlo pathaviñ sito siyâ, catubbhi vâtehi asampakampiyo
जिस प्रकार(यथा) पठविं(पृथ्वी) में सितो(दृढ़ता से गड़ा हुआ) स्तम्भ(इंद-खीलो), चारों दिशा से आती हुई (चतुब्भि) पवन-वेग से(वातेहि) प्रकम्पित नहीं(अ-सम्पकम्पियो) होता है। 
Just as a post firm grounded in the earth, can not be shaken by the four winds

तथूपमं सप्पुरिसं वदामि, यो अरियसच्चानि अवेच्च पस्सति।
Tathûpamañ sappurisañ vadâmi, yo ariya saccâni avecca passati
वैसे ही(तथा-उपमं) सत्पुरूष को(स-पुरिसं), मैं कहता हूँ(वदामि); जो(यो) चार आर्य-सत्य(अरिय सच्चानि) विचार-पूर्वक(अवेच्च) देखता है(पस्सति) 
So is the righteous person, I say; who thoroughly perceives the Noble truths, is similar to that

इदं’पि सङघे रतनं पणीतं, एतेन सच्चेन सुवत्थि होतु।।8।।
Idañ’pi Sañghe ratanañ pañîtañ, etena saccena suvatthi hotu
यह भी(इदं-अपि) संघ में अमूल्य(पणीतं) रत्न है, इस सत्य से कल्याण(सुवत्थि) हो।
In the Sangha, is this precious jewel found, by this truth may there be happiness

ये अरिय-सच्चानि विभावयन्ति, गम्भीर-पञ्ञेन सुदेसितानि।
Ye Ariya-saccâni vibhâvayanti, gambhîra-paòòena sudesitâni
जिन्होंने(ये) चार महान सत्यों का मनन कर लिया(विभावयन्ति) है, जो गम्भीर-प्रज्ञा से(गम्भिर-पञ्ञेन), (बुद्ध द्वारा) सु-उपदेशित(सुदेसितानि) हैं।
Those who clearly understand the Noble Truths; well taught by him of deep wisdom,

किञ्चापि ते होन्ति भुसप्पमत्ता, न ते भवं अट्ठमं आदियन्ति।
Kiñcâpi te honti bhusappamattâ, na te bhavañ atthamañ âdiyanti
अगर वे किंचित भी अधिक(भुस) प्रमादी(पमत्ता) हो जाए, (तो भी) वे(ते) आठवीं बार(अट्ठमं) (से अधिक) संसारिक-दुक्ख में(भवं) नहीं(न) पड़ते(आदियन्ति)।
If they are slightly negligent, would not undergo more than  8th times,  to de-associate  with worldly suffering

इदं’पि सङघे रतनं पणीतं, एतेन सच्चेन सुवत्थि होतु।।9।।
Idañ’pi Sañghe ratanañ pañîtañ, etena saccena suvatthi hotu
यह भी(इदं-अपि) संघ में अमूल्य(पणीतं) रत्न है, इस सत्य से कल्याण(सुवत्थि) हो।
In the Sangha is this precious jewel found;  by this truth may there be happiness.

सहावस्स दस्सन-सम्पदाय, तयस्सु धम्मा जहिता भवन्ति।
Saha-iva-assa dassana-sampadâya, tayassu dhammâ jahitâ bhavanti
साथ ही उसके (सह-इव-अस्स) दर्शन(दस्सन) प्राप्त होकर(सम्पदाय) उसके तीनों(तयो-अस्स) धम्मा( दुर्गुण) दूर हो जाते हैं(जहिता भवन्ति);
Together with his attainment of insight, three states are at once comes to nought, namely;

सक्काय-दिट्ठि विचिकिच्छितं च, सीलब्बतं वा’पि यदत्थि किञ्चि ।
Sakkâya-ditthi vicikicchitañ ca, sîlabbatañ vâ'pi yadatthi kiñci
सक्काय-दिट्ठि(आत्म-सम्मोहन), विचिकिच्छा(संशय) और शील-व्रत(सीलब्बतं) अथवा(वा) जो है(यं-अत्थि) कुछ(किञ्चि) भी(अपि) 
Self illusion, doubt, and indulgence in (wrongful) rites and rituals, if there be any.

चतुहि अपायेहि च विप्पमुत्तो, छ च-अभिठानानि अभब्बो कातुं
Cathûhi-apâyehi ca vippamutto, cha ca-abhithânâni abhabbo kâtuñ
चार प्रकार के अपाय(दुर्गतियों) से विमुक्त(विप्पमुत्तो) हो, उसके लिए छह घोर पाप-कर्म (छ-अभिठानानि) असम्भव(अब्बभो) हो जाते हैं, करने के लिए(कातुं)।
He is absolutly freed from four states of misery and is incapable of commiting the six major wrong doings

इदं’पि सङघे रतनं पणीतं, एतेन सच्चेन सुवत्थि होतु।।10।।
Idañ'pi Sañghe ratanañ pañîtañ, etena saccena suvatthi hotu
यह भी(इदं-अपि) संघ में अमूल्य(पणीतं) रत्न है, इस सत्य से कल्याण(सुवत्थि) हो
In the Sangha is this precious jewel found;  by this truth may there be happiness.

किञ्चापि सो कम्मं करोति पापकं, कायेन वाचा उद चेतसा वा।
Kiñcâpi so kammañ karoti pâpakañ, kâyena vâcâ uda cetasâ vâ
कुछ भी(किञ्चापि ) वह(सो) अनैतिक-कर्म(पापकं) करता है, काया, वाचा अथवा(उद) मन से
Whatever  un-moral  he does, whether by deed, word or thought

अभब्बो सो तस्स पटिच्छादाय, अभब्बता दिट्ठपदस्स वुत्ता।
Abhabbo so tassa paticchâdâya, abhabbatâ dittha-padassa vuttâ
उसके लिए उसको(तस्स) ढंककर रखना(पटिच्छादाय) असम्भव(अभब्बो) है, दृष्टि-सम्पन्न को(दिट्ठ पदस्स), यह कहा गया(वुता) है।
It is impossible to hide for one ,who has seen the path; as said

इदं’पि सङघे रतनं पणीतं, एतेन सच्चेन सुवत्थि होतु।।11।।
Idañ’pi Sanghe ratanañ pañîtañ, etena saccena suvatthi hotu
यह भी(इदं-अपि) संघ में अमूल्य(पणीतं) रत्न है, इस सत्य से कल्याण(सुवत्थि) हो
In the Sangha is this precious jewel found; by this truth may there be happiness.

वनप्पगुम्बे यथा फुस्सितग्गे, गिम्हान-मासे पठमस्मिं गिम्हे।
Vanappagumbe yathâ phussitagge, gimhâna-mâse pathamasmiñ gimhe
जंगल-झाड़ियां(वनप्प-गुम्बे) जैसे(यथा) पुष्पित हो उठती(फुस्सितग्गे) हैं ग्रीष्म-ऋतु(गिम्हान-मासे) के प्रथम मास में(पठमस्मिं-गिम्हे) 
Like woodlands groves with blossomed tree top in the first month of the summer season,

तथूपमं  धम्मवरं अदेसयि, निब्बान गामिं परमं हिताय।
Tathûpamañ Dhammavarañ adesayi, nibbâna gâmiñ paramañ hitâya
वैसे ही(तथा-उपमं) उत्तम(वरं) धम्म का उपदेश दिया(अदेसयि) है, जो निब्बान-गामी परम हिताय है
So has, the sublime Doctrine that leads to Nibbana; been taught for the highest good

इदं’पि बुद्धे रतनं पणीतं, एतेन सच्चेन सुवत्थि होतु।।12।।
Idañ’pi Buddhe ratanañ pañîtañ, etena saccena suvatthi hotu
यह भी(इदं-अपि) बुद्ध में अमूल्य(पणीतं) रत्न है, इस सत्य से कल्याण(सुवत्थि) हो
In the Buddha is this precious jewel found; by this truth may there be happiness.

वरो वरञ्ञू वरदो वराहरो, अनुत्तरो धम्मवरं अदेसयि।
Varo varaññû vara-do varâ-âharo, anuttaro Dhammavarañ adesayi
वरो(उत्तम) वरञ्ञू(उत्तम धम्म के ज्ञाता), वर-दो(उत्तम मार्ग-दाता) वर-आहरो(उत्तम मार्ग को लाने वाले) ने जिस अनुत्तर(अतुलनीय) उत्तम धम्म का(धम्मवरं) उपदेश दिया है 
The unrivalled Excellent One, the Knower; the Giver and the Bringer of the Excellent has expounded the excellent Doctrine

इदं’पि बुद्धे रतनं पणीतं, एतेन सच्चेन सुवत्थि होतु।।13।।
Idañ’pi Buddhe ratanañ paòîtañ, etena saccena suvatthi hotu
यह भी(इदं-अपि) बुद्ध में अमूल्य(पणीतं) रत्न है, इस सत्य से कल्याण(सुवत्थि) हो
In the Buddha is this precious jewel found; by this truth may there be happiness.


खीणं पुराणं नवं नत्थि सम्भवं, विरत्त-चित्ता आयतिके भवस्मिं।
Khîñañ purâñañ navañ natthi sambhavañ, viratta-cittâ  âyatike bhavasmiñ
पुराने कर्म(पुरानं) क्षीण(खीण) हो गए हैं और नए की उत्पत्ति(नवं) संभव नहीं(नत्थि सम्भवं); वे विरक्त-चित्त(विरत्त-चित्ता) हैं; भवसागर में(भवस्मिं) आने(आयतिके) से
Whose past is extint with no new arising; are minds-detached from coming in worldly  pleasure

ते खीणबीजा अविरूल्हिछन्दा, निब्बन्ति धीरा यथा‘यं-पदीपो।
Te khîñabîjâ avirûlhicchandâ, nibbanti dhîrâ yathâ'yañ padîpo
वे(ते) क्षीण-बीज(खींण-बीज) जिनकी तृष्णा(छन्दा) अवरुद्ध(अविरूळिह) हो चुकी है; धीर(धीरा) निब्बान को प्राप्त होते(निब्बन्ति) हैं, जिस प्रकार यह(यथा-अयं) प्रदीप  
Whose old seeds are destroyed, craving uprooted; those wise ones are extinguished like a lamp

इदं’पि सङघे रतनं पणीतं, एतेन सच्चेन सुवत्थि होतु।।14।।
Idañ’pi Sañghe ratanañ pañîtañ, etena saccena suvatthi hotu
यह भी(इदं-अपि) संघ में अमूल्य(पणीतं) रत्न है, इस सत्य से कल्याण(सुवत्थि) हो।
In the Sangha is this precious jewel found; by this truth may there be happiness.

यानीध भूतानि समागतानि, भुम्मानि वा यानि व अन्तलिक्खे।
Yânîdha bhûtâni samâgatâni, bhummâni vâ yâni  va antalikkhe
जो यहां(यानि-इध) भूतादि(प्राणी) समागतानि(एकत्रित) हैं, भूमि या जो अन्तलिक्खे(अन्तरिक्ष) के  
Whatever beings are here assembled, whether terrestrial or celestial

तथागतं इत्थी-पुरिस्सेहि** पूजितं, बुद्धं नमस्साम सुवत्थि होतु।।15।।
Tathâgatañ itthî-purissehi pûjitañ, Buddhañ namassâma suvatthi hotu
तथागत जो स्त्री और पुरुषों के द्वारा पूजित हैं, हम बुद्ध को नमन करते हैं; कल्याण हो।
We salute the Buddha; honoured by men and women, may there be happiness


यानीध भूतानि समागतानि, भुम्मानि वा यानि वा अन्तलिक्खे।
Yânîdha bhûtâni samâgatâni, bhummâni vâ yâni vâ antalikkhe
जो यहां(यानि-इध) भूतादि(प्राणी) एकत्रित हैं, भुम्मानि(भूमि) वा(अथवा) अन्तरिक्ष के। 
Whatever beings are here assembled, whether terrestrial or celestial

तथागतं  इत्थी-पुरिस्सेहि**  पूजितं, धम्मं  नमस्साम सुवत्थि होतु।।15।।
Tathâgatam itthî-pirissehi pûjitañ, Dhammañ namassâma suvatthi hotu
तथागत जो स्त्री और पुरुषों के द्वारा पूजित हैं, हम बुद्ध को नमन करते हैं; कल्याण हो।
We salute the  Sangha; honoured by  men and women, may there be happiness

यानीध भूतानि समागतानि, भुम्मानि वा यानि वा अन्तलिक्खे।
Yânîdha Bhûtâni samâgatâni, bhummâni vâ yâni vâ antalikhe
जो भी भूतादि यहां एकत्रित हैं, भूमि अथवा अन्तरिक्ष के 
Whatever beings are here assembled, whether terrestrial or celestial

तथागतं  इत्थी-पुरिस्सेहि**  पूजितं, सङघं नमस्साम सुवत्थि होतु।।15।।
Tathâgatañ itthî-purissehi pûjitañ, Sañghañ namassâma suvatthi hotu
तथागत जो स्त्री और पुरुषों के द्वारा पूजित हैं, हम संघ को नमन करते हैं; कल्याण हो।
We salute the  Sangha; honoured by  men and women, may there be happiness
             - -रतनसुत्तं निट्ठितं - -
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1. मूल पाठ -  *  देवता    **  देव मनुस्स
2. Ref.  KN-Khp/ Sn(Chulavagga)
3. This discourse was delivered by the Bhante Aanada, one of the principle disciples of Lord Buddha in the city of Vaishali whose citizens appealed to him for help, being afflicted by famine, pestilenee and nature disturbance. It is said, after delivering his discourse people became happy and the pestilence subsided.

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