Saturday, July 6, 2019

निर्वाण

निर्वाण
बुद्ध के निर्वाण के स्वरूप के मूल में तीन बातें हैं। इन में से एक तो यह है कि किसी ‘आत्मा’ का सुख नहीं, बल्कि प्राणी का सुख है। 
दूसरी बात यह है कि संसार में रहते समय प्राणी का सुख। ‘आत्मा’ की ‘मुक्ति’ और मरणान्तर ‘आत्मा की मुक्ति’ बुद्ध के विचारों से सर्वथा विरुद्ध है। 
तीसरा विचार जो बुद्ध के निर्वाण के स्वरूप का मूलाधार है, वह है- राग-द्वेषाग्नि को शांत करना। 
निर्वाण इसी जीवन में प्राप्य है। 
निर्वाण का मतलब है, अपनी प्रवृतियों पर इतना काबू रखना कि आदमी धर्म के मार्ग पर चल सके।
इस राग और द्वेषाग्नि से मुक्ति पाने का साधन मध्यम मार्ग है, जो निर्वाण की ओर ले जाता है।
यह मध्यम मार्ग है- सम्यक दृष्टि, सम्यक संकल्प आदि अष्टागिक मार्ग।
बुद्ध 'आत्मा' को सर्वथा नकारते हैं।
वे पुनर्जन्म संबंधी परम्परागत धारणा को नकारते हैं।
वे उस ‘कर्म’ को भी नकारते हैं जिससे पुनर्जन्म होता है।
बुद्ध के कर्म के सिद्धान्त का संबंध मात्र कर्म से था और वह भी वर्तमान जन्म के ‘कर्म’ से(बी आर अम्बेडकर: बुद्धा एंड हिज धम्मा)।
बुद्ध देशित कर्म के इस सैद्धांतिकी की चर्चा करते हुए बाबासाहब अम्बेडकर ति-पिटक के अंतर्गत 'मज्झिम निकाय' (यथा 'चुळदुक्खखंध सुत्त',  'देवदह सुत्त' आदि ) के कथानकों को उद्धरित करते हैं.

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