पटिच्च सम्मुप्पाद(ईश्वरवाद का खंडन) - 1. दीघनिकाय(महानिदान सुत्त)- 2.2
2.मज्झिम निकाय 1.3.8
आत्मवाद का खंडन- 1. मज्झिम निकाय(महातन्हासंखय सुत्तन्त) - 1.4.8 -भिक्खु साति केवट्ठ पुत्त के विञ्ञान(जीव) के आवागमन की बात करने पर बुद्ध की फटकार।
2. मज्झिम निकाय 1.1.2
3. मज्झिम निकाय(चुलसच्चक सुत्त) 1.4.5
4. दीघनिकाय(पथिक सुत्त) - 3.1 -सृष्टिकर्ता ब्रह्मा, आत्मा, ईश्वर का खंडन।
4. दीघ निकाय (केवट्ठसुत्त) - ईश्वर, ब्रह्मा का परिहास।
दीघ निकाय(तेविज्ज सुत्त)- 1. 13 ब्रह्मा का परिहास ; ब्राह्मण अंधे के पीछे चलने वाले अंधों की भांति बिना जाने देखे ईश्वर(ब्रह्मा) और उसके लोक पर विश्वास रखते हैं।
5. मज्झिम निकाय(ब्रह्मा निमन्तिक सुत्त) 1.5.9 -ईश्वर, ब्रह्मा का परिहास।
सन्दक सुत्त- निगंठनाथ पुत्त की 'सर्वज्ञता' का मजाक।
तेविज्ज वच्छगोत्त सुत्त (म. नि.- 71)- बुद्ध ने अपनी 'सर्वज्ञता' से इंकार किया।
मिलिंद पन्ह- मिलिंद के प्रश्न (129 ) के ऊतर में नागसेन ने बुद्ध को सर्वज्ञ
बताया था(भूमिका:बोधिचर्यावतार)।
जन्म से नहीं, कर्म से ब्राह्मण-
1. संयुक्त निकाय भाग-2: पृ 499 : मथुरा के राजा अवंतिपुत्र और आयु. महाकात्यायन के मध्य संपन्न संलाप।
अवंतिपुत्र - भो कात्यायन! ब्राह्मण कहते हैं कि ब्राह्मण ही सर्व श्रेष्ठ हैं। अन्य वर्ण हीन हैं। ब्राह्मण ब्रह्मा के दायाद (उत्तराधिकारी) हैं ?
महाकात्यायन- तुम्हें समझना चाहिए कि लोक में यह कोलाहल मात्र है(बौद्ध साहित्य में भारतीय समाज पृ 87)।
संयुक्त निकाय (लोहिच्च सुत्त )- ब्राह्मणों द्वारा जातीय-उच्चता का दंभ (लोहिच्च ब्राह्मण और बुद्ध सावक महाकात्यायन संवाद)।
2. मज्झिम निकाय (माधुरी सुत्त पृ 343)- जन्म से कोई ब्राह्मण नहीं होता।
वशिष्ठ माणव- जन्म से ब्राह्मण होता है या कर्म से ?
बुद्ध- वशिष्ठ! माता की योनि से उत्पन्न होने के कारण मैं किसी को ब्राह्मण नहीं कहता। कर्म से ही कोई ब्राह्मण होता है और कर्म से ही अब्राह्मण।
3. मज्झिम निकाय - 2/5 -8 :पृ 413-15
4. संयुक्त निकाय(सुंदरिक सुत्त: 7/1-9) -
1. जाति मत पूछो, कर्म पूछो।
2. कर्मकांड का विरोध- बुद्ध - हे ब्राह्मण(सुंदरिक भारद्वाज) ! लकड़ियाँ जलाकर अपनी शुद्धि होना न समझो। यह बाहरी आडम्बर(ढोंग) है।
मज्झिम निकाय पृ 405: छुआछूत के विरोधी। स्वच्छता केवल ब्राह्मणों के लिए ही नहीं, सभी के लिए आवश्यक है।
सुत्तनिपात(पराभव सुत्त)- जो नर जाति, धन और गोत्र पर अभिमान करता है और जो अपने बंधुओं का अपमान करता है, वह उसकी अवनति का कारण बनता है।
सुत्तनिपात(वसल सुत्त- 7 )- न कोई जाति से वसल होता है, न कोई जाति से ब्राह्मण। मनुष्य कर्म से वसल होता है और कर्म से ही ब्राह्मण। बुद्ध ने इस सम्बन्ध में चाण्डाल पुत्त मातंग का उल्लेख कर उसका यशोगान किया .
सुत्त निपात;
" वासेट्ठ सुत्त (35) "
" ब्राह्मण धम्मिक सुत्त (19) ब्राह्मण अधोगति
" कसि भारद्वाज सुत्त (4)
1. दीघ निकाय(लोहित सुत्त)- 1. 12 लोहित को ऐसा भ्रम हुआ था कि संसार में ऐसा कोई समण या ब्राह्मण नहीं है, जो अच्छे धर्म को जान कर दूसरे को समझा सकें। भला, दूसरा, दूसरे के लिए क्या करेगा ? नए धर्म की बात करना ऐसे ही है जैसे पुराने बंधन को काट कर एक दूसरा नया बंधन डालना ? लोहित इसे पाप(बुराई) और लोभ की बात समझता था।
-बुद्ध ने उसकी शंका का समाधान कर उपदेश दिया।
मज्झिम निकाय(वासेट्ठ सुत्त, पृ 413)- बुद्ध-वासेट्ठ संवाद ;
बुद्ध- वशिष्ठ, प्राणि, तृण, वृक्ष, कीट-पतंग, चींटी और जानवरों में प्राकृतिक भेद है किन्तु मनुष्यों में कोई प्राकृतिक भेद नहीं है। मनुष्यों में कर्म मुख्य है। कर्म से लोग जाने जाते हैं।
दिव्यादान (323: 14)- बुद्ध जाति-भेद मिटाना चाहते थे। वे एक मानव जाति की कल्पना करते थे। मानवों में उनको परस्पर कोई अंतर दिखाई देता था। उनके अनुसार सभी वर्णों के लोगों के शरीर के अंग एक सामान हैं।
मज्झिम निकाय (एसुकारिक सुत्त)-
बुद्ध- ब्राह्मण ! न मैं सबको परिचरणीय(सेवनीय) कहता हूँ और न मैं सबको अपरिचरणीय(सेवनीय) कहता हूँ। ब्राह्मण ! जिसका परिचरण करने से श्रद्धा बढ़ती है, शील बढ़ता है, श्रुत बढ़ता है, ज्ञान बढ़ता है, उसे मैं परिचरणीय कहता हूँ।
सुत्तनिपात (मेत्त सुत्त): प्राणी-मात्र की रक्षा।
माता यथा नियं पुत्तं, आयुसा एक पुत्तं अनुरक्खे।
एवं पि सब्ब भुतेसु, मानसं भावये अपरिमाणं।।
सुत्त निपात(माघ सुत्त)- दान की महिमा।
अंगुत्तर निकाय 3. भौतिकवाद का खंडन
दस अव्याकृत बातें - मज्झिम निकाय - 2.2.3
उपनिषदों और ब्राह्मण के तत्व ज्ञान 'सत-चित-आनंद' के उलट बुद्ध द्वारा 'असत-अनित्य-दुक्ख' का उपदेश।
2.मज्झिम निकाय 1.3.8
आत्मवाद का खंडन- 1. मज्झिम निकाय(महातन्हासंखय सुत्तन्त) - 1.4.8 -भिक्खु साति केवट्ठ पुत्त के विञ्ञान(जीव) के आवागमन की बात करने पर बुद्ध की फटकार।
2. मज्झिम निकाय 1.1.2
3. मज्झिम निकाय(चुलसच्चक सुत्त) 1.4.5
4. दीघनिकाय(पथिक सुत्त) - 3.1 -सृष्टिकर्ता ब्रह्मा, आत्मा, ईश्वर का खंडन।
4. दीघ निकाय (केवट्ठसुत्त) - ईश्वर, ब्रह्मा का परिहास।
दीघ निकाय(तेविज्ज सुत्त)- 1. 13 ब्रह्मा का परिहास ; ब्राह्मण अंधे के पीछे चलने वाले अंधों की भांति बिना जाने देखे ईश्वर(ब्रह्मा) और उसके लोक पर विश्वास रखते हैं।
5. मज्झिम निकाय(ब्रह्मा निमन्तिक सुत्त) 1.5.9 -ईश्वर, ब्रह्मा का परिहास।
सन्दक सुत्त- निगंठनाथ पुत्त की 'सर्वज्ञता' का मजाक।
तेविज्ज वच्छगोत्त सुत्त (म. नि.- 71)- बुद्ध ने अपनी 'सर्वज्ञता' से इंकार किया।
मिलिंद पन्ह- मिलिंद के प्रश्न (129 ) के ऊतर में नागसेन ने बुद्ध को सर्वज्ञ
बताया था(भूमिका:बोधिचर्यावतार)।
जन्म से नहीं, कर्म से ब्राह्मण-
1. संयुक्त निकाय भाग-2: पृ 499 : मथुरा के राजा अवंतिपुत्र और आयु. महाकात्यायन के मध्य संपन्न संलाप।
अवंतिपुत्र - भो कात्यायन! ब्राह्मण कहते हैं कि ब्राह्मण ही सर्व श्रेष्ठ हैं। अन्य वर्ण हीन हैं। ब्राह्मण ब्रह्मा के दायाद (उत्तराधिकारी) हैं ?
महाकात्यायन- तुम्हें समझना चाहिए कि लोक में यह कोलाहल मात्र है(बौद्ध साहित्य में भारतीय समाज पृ 87)।
संयुक्त निकाय (लोहिच्च सुत्त )- ब्राह्मणों द्वारा जातीय-उच्चता का दंभ (लोहिच्च ब्राह्मण और बुद्ध सावक महाकात्यायन संवाद)।
2. मज्झिम निकाय (माधुरी सुत्त पृ 343)- जन्म से कोई ब्राह्मण नहीं होता।
वशिष्ठ माणव- जन्म से ब्राह्मण होता है या कर्म से ?
बुद्ध- वशिष्ठ! माता की योनि से उत्पन्न होने के कारण मैं किसी को ब्राह्मण नहीं कहता। कर्म से ही कोई ब्राह्मण होता है और कर्म से ही अब्राह्मण।
3. मज्झिम निकाय - 2/5 -8 :पृ 413-15
4. संयुक्त निकाय(सुंदरिक सुत्त: 7/1-9) -
1. जाति मत पूछो, कर्म पूछो।
2. कर्मकांड का विरोध- बुद्ध - हे ब्राह्मण(सुंदरिक भारद्वाज) ! लकड़ियाँ जलाकर अपनी शुद्धि होना न समझो। यह बाहरी आडम्बर(ढोंग) है।
मज्झिम निकाय पृ 405: छुआछूत के विरोधी। स्वच्छता केवल ब्राह्मणों के लिए ही नहीं, सभी के लिए आवश्यक है।
सुत्तनिपात(पराभव सुत्त)- जो नर जाति, धन और गोत्र पर अभिमान करता है और जो अपने बंधुओं का अपमान करता है, वह उसकी अवनति का कारण बनता है।
सुत्तनिपात(वसल सुत्त- 7 )- न कोई जाति से वसल होता है, न कोई जाति से ब्राह्मण। मनुष्य कर्म से वसल होता है और कर्म से ही ब्राह्मण। बुद्ध ने इस सम्बन्ध में चाण्डाल पुत्त मातंग का उल्लेख कर उसका यशोगान किया .
सुत्त निपात;
" वासेट्ठ सुत्त (35) "
" ब्राह्मण धम्मिक सुत्त (19) ब्राह्मण अधोगति
" कसि भारद्वाज सुत्त (4)
1. दीघ निकाय(लोहित सुत्त)- 1. 12 लोहित को ऐसा भ्रम हुआ था कि संसार में ऐसा कोई समण या ब्राह्मण नहीं है, जो अच्छे धर्म को जान कर दूसरे को समझा सकें। भला, दूसरा, दूसरे के लिए क्या करेगा ? नए धर्म की बात करना ऐसे ही है जैसे पुराने बंधन को काट कर एक दूसरा नया बंधन डालना ? लोहित इसे पाप(बुराई) और लोभ की बात समझता था।
-बुद्ध ने उसकी शंका का समाधान कर उपदेश दिया।
मज्झिम निकाय(वासेट्ठ सुत्त, पृ 413)- बुद्ध-वासेट्ठ संवाद ;
बुद्ध- वशिष्ठ, प्राणि, तृण, वृक्ष, कीट-पतंग, चींटी और जानवरों में प्राकृतिक भेद है किन्तु मनुष्यों में कोई प्राकृतिक भेद नहीं है। मनुष्यों में कर्म मुख्य है। कर्म से लोग जाने जाते हैं।
दिव्यादान (323: 14)- बुद्ध जाति-भेद मिटाना चाहते थे। वे एक मानव जाति की कल्पना करते थे। मानवों में उनको परस्पर कोई अंतर दिखाई देता था। उनके अनुसार सभी वर्णों के लोगों के शरीर के अंग एक सामान हैं।
मज्झिम निकाय (एसुकारिक सुत्त)-
बुद्ध- ब्राह्मण ! न मैं सबको परिचरणीय(सेवनीय) कहता हूँ और न मैं सबको अपरिचरणीय(सेवनीय) कहता हूँ। ब्राह्मण ! जिसका परिचरण करने से श्रद्धा बढ़ती है, शील बढ़ता है, श्रुत बढ़ता है, ज्ञान बढ़ता है, उसे मैं परिचरणीय कहता हूँ।
सुत्तनिपात (मेत्त सुत्त): प्राणी-मात्र की रक्षा।
माता यथा नियं पुत्तं, आयुसा एक पुत्तं अनुरक्खे।
एवं पि सब्ब भुतेसु, मानसं भावये अपरिमाणं।।
सुत्त निपात(माघ सुत्त)- दान की महिमा।
अंगुत्तर निकाय 3. भौतिकवाद का खंडन
दस अव्याकृत बातें - मज्झिम निकाय - 2.2.3
उपनिषदों और ब्राह्मण के तत्व ज्ञान 'सत-चित-आनंद' के उलट बुद्ध द्वारा 'असत-अनित्य-दुक्ख' का उपदेश।
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