Sunday, December 4, 2011

गुरु बालकदास साहेब

   टेलर साहेब एक वाकया बयान कर रहे थे. एक बार गुरुजी बोले की चलो, आंधरगावं चलते है. आंधरगावं में वासुदेव और उनके भाई अनुदास रहते थे.वासुदेव, खैरी के सेगो बाबा के गुरु थे.सेगो बाबा बागडे कुल के थे. वासुदेव बाबा रामानन्द पंथ के थे.   



       
       
बालकदास साहेब बपेरा
   


   





     






 गुरु का गुरु
शुरूआती दिनों में, गुरूजी बीडी का कारखाना चलाते थे.आम आदमी की तरह वे भी बीडी पीते थे.उनके पास हमेशा बीडी का बंडल और माचिस रहा करती थी.बीडी और माचिस को लेकर टेलर साहेब ने, एक बड़ी मजेदार  घटना बताई.
येरवा घाट में टेलर साहेब के यहाँ चौका-आरती के बाद सत्संग चल रही थी. गावं के गणमान्य लोग बैठे थे.सत्संग में लोगों के द्वारा की गई शंका का समाधान गुरूजी के द्वारा किया जा रहा था.इस सत्संग में एक 10-12  साल का बालक भी बैठा था.वह बालक छुप-छुप कर बीडी पी रहा था.गुरु जी की उस लडके पर नजर पड़ी.उन्होंने उसे टोक कर कहा-बेटा,तुम्हारी उम्र कितनी है ?
"जी,12 वर्ष." -लडके ने सकुचाते हुए जवाब दिया.
 "तुम्हारा नाम क्या है ?"
"जी,दशाराम ."
"कहा रहते हो ?"
"जी,यहीं येरवाघाट."
"तुम्हारी उम्र बहुत छोटी है. मगर तुम बीडी पीते हो ?"
"जी, अब नहीं पीऊँगा."- लडके ने हाथ की बीडी और माचिस दूर फैंकते हुए जवाब दिया.
"शाबास बेटा.-गुरूजी ने उस लडके की तरफ हसरत भरी नजर से देखते हुए कहा और फिर वे हमारी और मुड़ कर बोले-खिना,बीडी छोड़ने के लिए मैंने उसे कह तो दिया.मगर इसकी लत तो मुझे भी है! बड़ी विरोधाभासी बात है न ? देखो ऐसा करते हैं की मैं भी इसे, आज से और अभी इसी वक्त से छोड़ता हूँ. टेलर बतलाते हैं की  उस घटना के बाद फिर कभी गुरूजी को कभी बीडी पीते हुए नहीं देखा गया.

शुरुआत के दिनों में गुरूजी के सिर पर लम्बी जटा हुआ करती थी. वे गावं-गावं में पटेल-साहूकारों के यहाँ भागवत लगाया करते थे.

     
           
       यह वह समय था जब इन 'नीच' समझी गई जातियों के मोहल्लों से, क्या जवान और क्या बूढ़े,
बाबा साहेब की एक पुकार पर निकल पड़ते थे.तब, बाबा साहेब ने अपने कार्य का केंद्र नागपुर बनाया था. हमारे इधर के केंद्र थे-नाका डोंगरी,गोंदिया,बालाघाट,वारासिवनी,बरघाट आदि.लोग उनकी एक आवाज पर नागपुर के लिए रवाना हो जाते थे.वे इस बात की तनिक भी फ़िक्र नहीं करते थे की उनके पास वहां तक जाने के लिए रुपया-पैसा है भी या नहीं. वे झुण्ड के झुण्ड पैदल ही निकल पड़ते करते थे.डा. आम्बेडकर ने सदियों से इन सोये हुए लोगों को झंझोड़ कर बतला दिया था की वे सूअर की तरह रहना छोड़ दे और अपने मानवीय अधिकारों के लिए उठ कर हुंकार भरे. बाबा साहेब ने उन्हें बताया था की वे भी उसी तरह पैदा हुए हैं जिस तरह अहंकारी हिन्दू .उनका भी इस देश के धन-धरती पर उतना ही हक हैं जितना की सवर्ण हिन्दुओं का है.
       उस समय हमारे समाज के लोगों पर कई तरह की पाबंदियां थी.छतरी लेकर हमारे समाज का दूल्हा नहीं निकल सकता था.हमारे समाज के लोगों की गाय गावं के 'गोहन' में सवर्ण हिन्दुओं की गायों के साथ नहीं जा सकती थी. अपने घर/आँगन में बिछी खाट/पलंग पर बैठे अपने समाज के लोगों को सवर्ण हिन्दू को देख खड़ा होना पड़ता था.सवर्ण हिन्दू के घर जाते वक्त हमारे समाज के लोगों को अपने सिर पर टोपी या कपड़ा रखना पड़ता था.अपने घर में रोपा लगाने का कार्य शुरू करने के पहले गावं के पटेल/साहूकार के खेत में 3-4 दिन बेगारी करनी पडती थी. 
        टेलर साहेब बताते है की वे दिन भर तो कपड़े सिलाई का काम करते थे किन्तु जैसे ही रात होती थी, 3-4 साथियों के साथ निकल पड़ते थे.वे घर-घर जाकर बाबा साहेब की कही हुई बातें लोगों को बतलाते थे.उन्हें समझाते थे की चाहे भूखों मरना पड़े मगर हम लोगों को अब गंदे काम नहीं करना चाहिए.रात में काम करने से वे लोग गावं के सवर्ण हिन्दुओं के गुस्से से बचे रहते थे.
         टेलर साहेब बतलाते हैं की सन 1956  के धर्मान्तरण के बाद बाबा साहेब का संदेश अपने समाज के लोगों  के घर-घर तक पहुँचाने के लिए गावं-गावं में  5-5,6-6 साथियों की टोलियाँ बनायीं थी.येरवाघाट और सालेबर्डी मिला कर जो टोली बनी थी उस में आपके पिताजी मंदरु ठेकेदार,मारवती उके(छोटे-बड़े),चरणदास उके,सुदामा, उके,मैं खिनारम बोरकर,रामचन्द्र बोरकर,सीताराम मेश्राम थे.हम लोग अपने लोगों के बीच टिमकी(बाजा) बजा-बजा कर ढिंढोरा पिटते थे की 'ढोल नहीं बजाना, ये हमारा काम नहीं है.मरे जानवरों का मांस नहीं खाना, ये गन्दा काम है.देव-धरम नहीं पूजना, ये अंधविश्वास है.हिन्दुओं के घरों में, मरने की खबर उनके रिश्तेदारों को देने का काम नहीं करना,' आदि. निश्चित रूप से इसका भारी असर हुआ.बाबा साहब की हुँकार पर साधू-संत और महार सब एक हो गए थे.जबकि, पहले इनके बीच खान-पान और रोटी-बेटी का सम्बन्ध नहीं होता था.
बालक दास साहेब, सुखराम दास साहेब और संत-मंडळी
   
   
मानव कल्याण सत्संग मंडल; कटोरी  - सुखरामदास साहेब वारासिवनी सूरज लाला कटरे, बालकदास बागडे कटोरी, जनकलाल नगपुरे मनेगावं, हरिराम टेम्भरे









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