Friday, May 18, 2018

बुद्ध का चमत्कार से परहेज

बुद्ध का चमत्कार से परहेज
दीघनिकाय के पाथिकवग्ग में 'सुनक्खत्तवत्थु' नामक एक प्रसंग आता है। इस प्रसंग में मल्लों के नगर अनुपिय्या के अंतर्गत वज्जी गाम निवासी लिच्छवि पुत्र सुनक्खत का जिक्र है जो एक समय बुद्ध का बड़ा प्रशंसक था। किन्तु वह चाहता था कि अन्य चमत्कारी महापुरुषों की तरह बुद्ध भी लोगों को चमत्कार दिखाएं । उसने बुद्ध के सामने जा कर यह बात कही। तत्सम्बंध में बुद्ध और सुनक्खत के बीच हुआ संवाद दिलचस्प है-   
सुनक्खत- "भंते ! अब मैं भगवान के धम्म को छोड़ रहा हूँ। क्योंकि, आप मुझे चमत्कार नहीं दिखाते हैं ? "
बुद्ध- "सुनक्खत! क्या मैंने तुझसे कहा था कि आ मेरे धम्म को स्वीकार कर, मैं तुझे चमत्कार दिखाऊंगा।  "
सुअक्खत- "नहीं भंते।"
"सुनक्खत! क्या तू समझता है कि चमत्कार दिखाने या न दिखाने से दुक्ख क्षय के लिए मेरे द्वारा उपदिष्ट  धम्म पर कोई अनुकूल/प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है ?"
"नहीं भंते !"
"तो मोघ पुरुस ! तू चमत्कार में क्यों पड़ता है ?"
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टिप-   पालि प्रोफ़ेसर डा विमलकीर्ति, नागपुर के साथ यह सैद्धांतिकी बनी है कि बुद्ध वचनों पर चर्चा करते समय छान्दस/संस्कृत चिन्ह यथा हलन्त् (,)और विसर्ग(:) तथा  वर्ण यथा  ऋ, श्री, श, ष, त्र, क्ष आदि का यथा सम्भव कम प्रयोग करते हुए पालि सब्दों का अधिकाधिक प्रयोग किया जाए । क्योंकि,  हमारा उद्देश्य बुद्ध-वचनों के साथ पालि भासा का प्रचार भी है। सनद रहे, पालि में ऐसे वर्ण/चिन्ह नहीं होते। अगर बुद्ध वचनों को ब्राह्मणवाद से अलग करना है तो हमें उनके ही द्वारा गड़े गए भासा-सूत्रों से बाहर निकलना होगा।     

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