Friday, May 25, 2018

व्हेनसांग

व्हेनसांग( 586/602-664 ईस्वी)
ह्वेन सांग (युआन च्वांग्स) का जन्म 602 र्ठस्वी में हुआ था। बीस वर्ष की आयु में वे भिक्षु हो गए। उसने 29 वर्ष की अवस्था में भारत की यात्रा शुरू की थी। तारकन्ध और समरकन्द के रास्ते वह ईस्वी 630 में गांधार पहुंचा था(प्राचीन भारत का इतिहासः वी डी महाजन, पृ. 584)।

कन्नोज के महाराज हर्षवर्धन ने उनका बहुत सम्मान किया था । वह भारत में लगभग 15 वर्ष रहा। इनमें से 8 वर्ष वह सम्राट के दरबार में रहा। नालन्दा विश्वद्यिालय में आचार्य शीलभद्र के पास वे  5 वर्ष अध्ययन करते रहे।

व्हेनसांग ने भारत के लगभग प्रत्येक प्रांत की यात्रा की थी । वह कश्गर, यर्कण्डा और खोतान के रास्ते अप्रेल 645 ईस्वी में चीन पहुंचा था । वह अपने साथ 600 ग्रन्थ ले गया था। भारत से लौटने पर चीनी सम्राट ली-मी-सिन् ने उन्हें मंत्री पद से सम्मानित करना चाहा था किन्तु ह्वेन सांग ने आदर के साथ इसे अस्वीकार कर शेष जीवन बौध्द विहार में ही बिताया। ह्वेन-सांग 6२ वर्ष की अवस्था में 664 ईस्वी में परिनिब्बुत हुए थे(भगवान बुध्द का इतिहास और धम्मदर्शन, पृ. 386)।

भदन्त धर्मकीर्तिजी लिखते हैं कि वह आसाम, ताम्रलिप्ती गया और वहां से दक्षिण भारत में कांजिवरम होता हुआ उसने महाराष्ट्र , वल्लभि, उज्जैन आदि प्रदेशों में भ्रमण किया। इसके बाद सिन्धु नदी पार कर गान्धार से पामीर के मार्ग से वह स्वदेश लौट गया (वही)।

ह्वेन-सांग ने अपना यात्रा विवरण तो लिखा ही किन्तु इसके साथ साथ उन्होंने 75 ग्रंथों का अनुवाद किया। ह्वेन-सांग ने अधिकतर योगाचार, अभिधर्म, प्रज्ञापारमिता और सर्वास्तिवादी अभिधर्म का अनुवाद किया। अनुवादों के अतिरिक्त ह्वेन-सांग ने विज्ञानवादी योगाचार की चीन में स्थापना की। उन्होंने दिग्गनाग के दो ग्रंथों न्यायमुख और आलम्बनपरीक्षा का भी अनुवाद किया(राहुल सांकृत्यायन: बौध्द संस्कृति, पृ. 421 )।

ह्वेनसांग ने लिखा है कि कसाई, मछियारे, नाचने वाले जल्लाद, भंगी आदि शहर के बाहर रहते हैं। आते-जाते समय ये लोग जब तक अपने घर पहुंच जाएं, सडक के बायी ओर चलते हैं। उनके घर नीची दीवारों से घिरे हैं और उनके मौहल्ले अलग हैं (प्राचीन भारत का इतिहासः वी डी महाजन, पृ. 586 )। नगर की दीवारें ईटों या टाइलों की बनाई जाती है। दीवारों के ऊपर के मीनार लकड़ी या बांस के बनाये जाते हैं। घरों की अटारियां और छज्जे लकड़ी के है जो मिट्टी या चूने के पलस्तर तथा टाइलों से ढके हुए हैं। दीवारें चूने या गारे से ढकी है और पवित्राता के लिए उसमें गोबर मिला दिया जाता है(वही )।
संघारामों का निर्माण में चारों कोणों पर तीन मंजीलों के बुर्ज बनाए जाते हैं। शहतीर और उभरे हुए सिरों पर विभिन्न आकारों में खोदकर मूर्तियां बनाई जाती हैं। द्वारों, खिड़कियों और नीची दीवारों पर बहुत से चित्र बनाये जाते हैं। भिक्षुओं के कमरे अन्दर से सुसज्जित और बाहर से सादे हैं। इमारत के बीचों-बीच एक ऊंचा और चौड़ा हॉल है। द्वार पूर्व की ओर खुलते हैं और राज-सिंहासन भी पूर्व की ओर मुंह किए हैं। लोग बहुधा उजले सफेद कपड़े पहनते हैं। रंगदार या सजे हुए कपड़ों का वे मान नहीं करते। पुरुष  कमर पर अपने कपड़े बांधते हैं और फिर उन्हें बगल के नीचे इकट्ठा करके शरीर पर बायी ओर लटका देते हैं(वही )।

ह्वेन-सांग आगे लिखता है कि सोने और चांदी दोनों के सिक्के प्रचलित थे। कौड़ियां और मोती भी मुद्रा के रूप में प्रचलित थे। लोगों का मुख्य आहार गेहूं की चपातियां, भुने हुए दाने, चीनी, घी और दूध के पदार्थ थे। कुछ अवसरों पर मछली, मृग और भेड़ का मांस भी खाया जाता था। गााय तथा कुछ जंगली जानवरों का मांस पूर्णतः वर्जित था। जो व्यक्ति नियमों का उल्लंघन करता उसे निष्कासित किया जा सकता था(वही)।

नए नगर बन गए थे और पुराने नगर समाप्त हो रहे थे। पाटलिपुत्र अब उत्तरी भारत का प्रमुख नगर नहीं रहा था और उसका स्थान कन्नौज ने ले लिया था। उसमें सैकड़ों संघाराम और 200 हिन्दू मंदिर थे। प्रयाग एक महत्वपूर्ण स्थान बन चुका था। किन्तु श्रावस्ती अब नष्ट हो रहा था और कपिलवस्तु में केवल 30 भिक्षु थे। नालन्दा और वल्लभि में बौध्द धर्म का जोर था(वही, पृ- 586-87)।

रेशम और सूत के कपड़े बनाने की कला अत्यन्त परिष्कृत थी। किसी जंगली जानवर की ऊन का  बना कपड़ा पहने जाते थे। राजा तथा उच्च व्यक्तियों के आभूषण असाधारण थे। कीमती पत्थर का ‘तारा’ और हार उनके सिर के आभूषण हैं और उनके शरीर, अंगूठियों, कंगनों तथा मालाओं से सुसज्जित हैं। धनवान व्यापारी केवल कंगन पहिनते हैं। यद्यपि लोग सादे कपड़े पहिनते हैं, तथापि वे आभूषणों के शौकिन प्रतीत होते थे। औद्योगिक जीवन जातियों तथा बड़ी-बड़ी श्रेणियों तथा निगमों पर आधारित था। देश के औद्योगिक जीवन में ब्राह्मणों का कोई भाग नहीं था। खेती और परिचर्या का काम शुद्र के हाथों में था(वही, पृ. 587)। 

ह्वेन-सांग लिखता है कि जाति-प्रथा ने हिन्दू समाज को जकड़ रखा था। ब्राह्मण धर्म-कर्म करते थे। क्षत्रिय शासक वर्ग थे। राजा प्रायः क्षत्रिय होते थे। वैश्य व्यापारी तथा वणिक थे। धनी व्यापारी सोने की वस्तुओं का व्यापार करते थे। वे प्रायः नंगे पांव जाते हैं। बहुत कम लोग पादुकाएं पहिनते हैं। वे अपने दांतों पर लाल या काले निशान लगाते हैं। वे अपने बाल ऊपर बांधते हैं और कानों में छिद्र करते हैं। शारीरिक सफाई का वे बहुत ध्यान रखते है। खाने के पहले वे हाथ-मुंह धो लेते हैं। जूठन वे कभी नहीं खाते। प्रयोग करने के बाद लकड़ी तथा मिट्टी के बर्तन नष्ट  कर दिए जाते हैं। धातु के बर्तनों को रगड़ कर मांजा जाता है। खाने के बाद वे अपने मुंह को दातुन से साफ करते हैं और हाथ-मुंह धो लेते हैं(वही)।

ह्वेन-सांग लिखता है कि अन्तर्जातीय विवाह नहीं होते थे। भोजन तथा विवाह की दृष्टि में विभिन्न जातियों में कुछ नियन्त्रण थे लेकिन उनमें सामाजिक आचार-व्यवहार के मार्ग में ये नियन्त्रण बाधक नहीं थे। विधवा विवाह की प्रथा नहीं थी। उच्च वर्गों में पर्दे की प्रथा नहीं होती थी। सती प्रथा प्रचलित थी। रानी यशोमति अपने पति प्रभाकर वर्धन के साथ ही सती हो गई थी। राजश्री भी सती होने वाली थी और उसकी जीवन-रक्षा बड़ी कठिनाई से की गई(वही, पृ. 588)।

ह्वेन-सांग लिखता है कि अनुशासन बौध्द धर्म ग्रंथों के नियमों के अनुकूल ही था। उसका उल्लंघन करने पर  उसे मौन धारण करने के लिए बाध्य किया जाता था। शिक्षा धार्मिक थी और उन्हें विहारों के माध्यम से प्रसारित किया जाता था। धार्मिक पुस्तकें लिखी हुई थी। किन्तु वेदों को मौखिक रूप से प्रचलित रखा गया था और उन्हें कागज या पत्तों पर नहीं लिखा जाता था। उस समय प्रचलित लिपि को ब्राह्मी कहा जाता था जो ब्रह्मा के मुख से निःसृत मानी जाती थी। संस्कृत विद्वान वर्ग की भाषा थी। संस्कृत व्याकरण को विधिवत नियमों में जकड़ दिया गया था(वही )।

एक व्यक्ति की शिक्षा नौ वर्ष की आयु से तीस वर्ष की आयु तक चलती थी। शिक्षा पूर्ण होने पर  गुरू को दक्षिणा दी जाती थी। कई लोग सारा जीवन अध्ययन में व्यतीत करते थे। नालंदा की शिक्षा का वर्णन करते हुए ह्वने-सांग ने लिखा है कि जब किसी व्यक्ति की कीर्ति सर्व-प्रसिध्द हो जाती है तो वह एक विचार-गोष्ठि का आयोजन करता है। गोष्ठि में भाग लेने वालों की योग्यता का वह अनुमान लगाता है और यदि उनमें से कोई अपनी परिष्कृत भाषा, सूक्ष्म खोज, गहन चिंतन और अकाट्य तर्क से विशिष्टता प्राप्त कर ले तो बहुमूल्य आभूषणों से सज्जित हाथी पर बैठा कर उसके प्रशंसक उसे विहार के द्वार पर लाते हैं। इसके विपरित यदि एक व्यक्ति वाद-विवाद में हार जाए या अश्लील वाक्य प्रयुक्त करे या तर्क के नियमों का उल्लंघन करे तो उसके ऊपर कीचड़ लगा कर उसे खाई में फैंक दिया जाता है(वही, पृ. 588-89)।

ह्वेन-सांग ने एक घटना का उल्लेख करते हुए लिखा है कि एक एक बार लोकात्य समुदाय के एक आचार्य ने 40 सिध्दांत लिखे और नालंदा विश्वद्यिालय के द्वार पर इस सूचना के साथ उन्हें लटका दिया कि यदि कोई व्यक्ति इन सिध्दांतों को गलत सिध्द कर दे तो उसकी विजय के उपलक्ष्य में मैं उसे अपना सिर दूंगा। ह्वेन-सांग ने इस चुनौति को स्वीकार किया और उस व्यक्ति को एक सार्वजनिक वाद-विवाद में हरा दिया। किन्तु ह्वेन-सांग ने उसे क्षमा कर दिया और वह ह्वेन-सांग का शिष्य बन गया(वही, पृ. 589)।

शासन प्रणाली के बारे में ह्वेन-सांग ने लिखा हे कि राजभूमि 4 भागों में बंटी थी। राज-कार्य चलाने के लिए एक भाग, मन्त्रियों और कर्मचारियों को वेतन देने के लिए दूसरा भाग, प्रवीण व्यक्तियों को पुरष्कृत करने के लिए तीसरा भाग और चौथा भाग धार्मिक सम्प्रदायों को देने के लिए है। प्रत्येक व्यक्ति अपनी वस्तुओं को शांतिपूर्वक अपने पास रखता है और निर्वाह के लिए सभी खेती करते हैं। जो राजभूमि पर खेती करते हैं वे उत्पादन का छठा भाग शुल्क के रूप में देते हैं(वही)। 

व्यापार करने वाले व्यक्ति अपने व्यवसाय के कारण इधर-उधर यात्रा करते हैं। थोड़ा सा धन देने पर नदियां और चौकियां यात्रियों के लिए खोल दी जाती हैं। सार्वजनिक कार्यों के लिए श्रमिकों को लगाया जाता है लेकिन उन्हें इसके लिए पारिश्रमिक दिया जाता है। पारिश्रमिक किए गए काम के अनुपात से ही दिया जाता है(वही )।

ह्वेनसांग कहता है कि अपराधी और विद्रोही कम हैं। नियमों को तोड़ने पर, शासक की शक्ति का उल्लंघन किया जाए तो अपराधी की खोज की जाती है और दंड दिया जाता है। शारीरिक दंड नहीं दिया जाता, उन्हें केवल जीने और मरने के लिए छोड़ दिया जाता है और उन्हें मनुष्यों में नहीं गिना जाता। पितृ-भक्ति में दोषी या बेईमान है तो उसके कान और नाक काट दिए जाते हैं। अपराध की खोज करते समय दोष-स्वीकृति का प्रमाण प्राप्त करने के लिए बल7प्रयोग नहीं किया जातां अभियुक्त से प्रश्नोत्तर के समय यदि वह साफ-साफ उत्तर दे तो उसका दंड घटा दिया जाता है लेकिन यदि वह हठपूर्वक अपराध को स्वीकार न करें तो सत्य की गहराई तक पहुंचने के लिए परीक्षा को प्रयुक्त किया जाता है(वही, पृ. 589- 90)।

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