Wednesday, October 6, 2010

राम एक आस्था-पुरुष, न की इतिहास पुरुष

दैनिक भास्कर ६ अक्टू जबलपुर के लेख "अयोध्या के आगे" में डॉ वेदप्रताप वैदिक लिखते हैं-
राम कोई इतिहास पुरुष तो थे नहीं । वे इतिहास के आर-पार रहे है। वे आस्था-पुरुष है । स्मृति-पुरुष है, भाव -पुरुष हैं । ऐसी आस्था, ऐसी स्मृति और ऐसा भाव जो करोड़ों लोगों के ह्रदय में सदा-सनातन से, अविरल और अविछिन्न रहा है । यह भाव ऐसा है जो सिर्फ हिन्दुओं में ही नहीं पाया जाता है, मुसलमानों, ईसाईयों ,यहूदियों, काले -गोरों सब में पाया जाता है । यह भाव, तर्क और बुद्धि से परे होता है ।
निश्चित ही राम एक आस्था-पुरुष है , भाव-पुरुष है न की इतिहास-पुरुष जैसे की वैदिकजी लिखते हैं। मगर, दूसरी ओर राम को इतिहास-पुरुष मानने वाले भी कम नहीं हैं ? विश्वविद्यालयों में ढेरों थीसिस मिल जायेंगे, राम को इतिहास-पुरुष सिद्ध करने के लिए। न्यूज़ चेनल वाले भी लोगों के दिल-दिमाग में ठूसते रहते हैं कि राम इतिहास-पुरुष हैं.
दुसरे, राम आस्था-पुरुष हैं । मगर, सिर्फ वैदिकजी जैसे ब्राह्मणों के और पुरे ब्रह्मण वर्ग के। राम, ब्राह्मण वर्ग के आलावा अन्य वर्ग/जातियों के आस्था का विषय नहीं हो सकते। सवाल ये है की राम के क्या आदर्श हैं ? सीता की अग्नि-परिक्षहा लेकर और शम्बूक का वध कर राम कोनसे आदर्श स्थापित करते हैं ? क्या ये आदर्श कम से कम हिन्दू नारियों के लिए आस्था का विषय है ? क्या इन आदर्शों पर इस देश के दलित-आदिवासियों को आस्था है ? राम, वैदिकजी के आस्था-पुरुष हो सकते हैं, उच्च जाति हिन्दुओं के आस्था-पुरुष हो सकते है जिनके लिए मानस में लिखा है- पुजिय विप्र शील गुन हीना, शूद्र न गुन ग्यान प्रवीना'। मगर हिन्दू नारी, जो आज भी अग्नि-परीक्षहा देने को बाध्य हो , राम को आदर्श क्यों माने ? ढोल गवांर शुद्र पशु नारी, सकल ताड़ना के अधिकारी 'मानस' को क्यों माने ? इस देश का आदिवासी, जो आज भी आदिम शैली में जंगलों में रहने अभिशप्त है, कथित रामराज्य को आदर्श क्यों माने ? ऊँच-नीच की घृणा और जातिगत श्रेष्ठता की वकालत करने वाले 'रामराज्य' को दलित क्यों माने ?

Tuesday, October 5, 2010

जुलुशो में हथियारों का प्रदर्शन धार्मिक उन्माद पैदा करता है.

दैनिक भास्कर जबलपुर ५ अग. १० की खबर के अनुसार, हाईकोर्ट के चीफ जस्टिक की अध्क्षता वाली युगलपीठ ने पुलिस से पूछा है कि विगत २ सित. को जन्माष्टमी पर्व पर निकाली गई रैली में कथित रूप से हथियारों का प्रदर्शन किये जाने के मामले पर अब तक क्या करवाई की गई ? तत्सम्बंध में दायर अपील में इसी कोर्ट की एकलपीठ के उस आदेश को चुनौती दी गई है जिसमे इसी मुद्दे पर दायर याचिका पर विगत २२ सित को हस्तछेप करने से इंकार कर दिया गया था।
आये दिनों देखा जाता है की आर एस एस , विश्व हिन्दू परिषद् , बजरंगदल आदि संगठनों द्वारा निकाले गए जुलुशो में हथियारों का प्रदर्शन किया जाता है और पुलिस तमाशाबीन बनी रहती है । इस देश में भाजपा प्रमुख राजनीतिक दल है। कई राज्यों में उसकी सरकारे है। केंद्र में वह रह चुकी है। क्या एक राष्ट्रीय पार्टी को इस पर चितन नहीं करना चाहिए ? निश्चित रूप से जुलुशो में हथियारों का प्रदर्शन धार्मिक उन्माद के साथ जनमानस में भय का वातावरण पैदा करता है। देखे, उक्त अपील पर पुलिस क्या जवाब देती है ।

Saturday, September 25, 2010

मंदिर-मस्जिद

सवाल-क्या मंदिर-मस्जिद अलग-अलग हैं ?
जवाब- हाँ , दोनों अलग अलग है.
- क्यों ?
-क्योंकि, मंदिर में बुत होता है जबकि मस्जिद में नहीं।
-मगर इससे क्या होता है ? इबादत तो दोनों जगह होती है।
-सवाल इबादत का नहीं, इबादत करने वाले का है। मंदिर में हिन्दू करता है जबकि मस्जिद में मुस्लिम।
-ये हिन्दू-मुस्लिम क्या है ?
-ये हिंदुस्तान की दो कोमें हैं।
-ये दो क्यों हैं ?
-क्योंकि, एक नहीं हैं।
-तो एक कि जगह चार होते, दो ही क्यों ?
-चार है न..... हिन्दू मुस्लिम,सिख, ईसाई। और चार ही क्यों, पांच हैं, दस हैं, पचास हैं......

पुल क्यों बनाये जाते हैं ?

पुल क्यों बनाये जाते हैं ?
ताकि बस या ट्रक किसी नदी/नाले में न गिरे।

सवर्णों की कुतिया

पिछले दिनों 'म.प्र सहारा चेनल' से एक खबर प्रसारित हुई-

भिंड जिले के सवर्णों ने एक दलित परिवार पर 1500 रु का जुरमाना ठोंक दिया। हुआ यह की गाँव के सवर्णों की एक कुतिया घूमते घुमते दलित मोहल्ले में चली गई। दलित महिला ने मानवीय स्वभाववश बची हुई झूठन कुतिया के आगे डाल दी। पर यह बात गाँव के सवर्णों को हजम नहीं हुई।

-इस तरह की ढेरों खबरें आये दिनों आती रहती हैं। हम आप पढ़ते हैं और अपने-अपने काम में लग जाते हैं। सोचता हूँ , कम से कम दलित समाज के पढ़े-लिखे लोगों को तो इसके विरुद्ध पूरी ताकत के साथ आवाज उठाना चाहिए. यूनिवर्सिटी में पढ़ रहे इस तबके के नवजवानों को जो रामराज्य और इस तरह के अन्य काल्पनिक विषयों पर बड़ी-बड़ी थीसिस लिखते हैं, अपनी इन माँ-बहनों की दशा पर क्या शोध नहीं करना चाहिए ?