Tuesday, September 3, 2019

ब्राह्मणों के 'गुरुकुल' विश्वविद्यालय क्यों नहीं ?

ब्राह्मणों के 'गुरुकुल' विश्वविद्यालय क्यों नहीं बने ?
एक समय नालंदा, तक्षशिला, विक्रमशिला, ओदन्तपूरी, जगद्दल, वल्लभी, जयेंद्र आदि विश्वविद्यालय बौद्धों के शिक्षा-संस्थान थे ? यहाँ बिना किसी भेदभाव के धर्म, दर्शन और राजनीति विषयों में शिक्षा दी जाती थी। इन शिक्षा-संस्थानों में दूर दूर, देश विदेश के विद्यार्थी पढ़ने आते थे। इन विश्वविद्यालयों ने एक से एक दार्शनिक प्रकांड विद्वान् दिए जिन्होंने अन्तराष्ट्रीय जगत में देश का नाम रोशन किया।
किसी समय इस देश में ब्राह्मणों के 'गुरुकुल' भी थे। यहाँ भी धर्म, दर्शन और राजनीति में शिक्षा दी जाती थी। यहाँ ऋषियों के मुख से वेद ऋचाएं निसृत होती थी। बड़ा स्वभाविक प्रश्न है, ये शिक्षा-संस्थान, विश्वविद्यालय क्यों नहीं बनें ? जो लोग शिक्षा की ठेकेदारी लिए बैठे थे, वे विना विश्वविद्यालयों के 'विश्वगुरु' कैसे बन गए ?
बात दरअसल यह है कि ब्राह्मणों के गुरुकुल, ब्राह्मणों के विद्या-केंद्र थे। वहां विधर्मी तो छोडिये, ब्राह्मणों के इतर अन्य स्वधार्मियों का कोई काम न था। अधिक-से अधिक क्षत्रियों के बच्चें वहां प्रवेश पा सकते थे, इसलिए कि सत्ता में क्षत्रियों का वर्चश्व था। वैश्य का इन विद्या-केन्द्रों से कोई लेना-देना नहीं था। शूद्रों के लिए गुरुकुलों के दरवाजें बंद थे।
अब जिन गुरुकुलों में स्वधार्मियों के साथ न सिर्फ भेदभाव किया जाता हो, वरन भेदभाव किये जाने की शिक्षा दी जाती हो, वे सर्व-जन के लिए शिक्षा के केंद्र कैसे हो सकते थे ? वेद का उच्चारण करने मात्र से जीभ काटने, सुनने से कान में पिघला सीसा भरने का आदेश देते हो, ऐसे मानवता-निषेध के विद्या केंद्र, विश्वविद्यालय कैसे हो सकते थे ? जो स्वधार्मियों से पशुओं से बदतर व्यवहार करने की शिक्षा देते हो, वहां गैर समाज और देशों के विद्या-व्यसनी कैसे आ सकते थे ?
इसके बावजूद भी ब्राह्मणों ने 'विश्वगुरु' का तमगा अपने सिर पर बांध लिया और जिन बौद्ध विश्वविद्यालयों के कारण वे विश्वगुरु कहलाए, उस बुद्ध को इस देश और उसकी जन्म भूमि से निकाल बाहर किया ! 

Monday, September 2, 2019

बुद्धा एंड हिज धम्मा

बुद्धा एंड हिज धम्मा'
'बुद्धा एंड हिज धम्मा' बाबासाहब डॉ अम्बेडकर का अप्रतिम ग्रन्थ है. यह एक परिणति है, जो बुद्धचरित, उनके दर्शन के प्रति, बाबासाहब क्या सोचते थे, को दर्शाता है. ति-पिटक में हजारों ग्रन्थ हैं. डॉ अम्बेडकर की दृष्टि में उन अन्यन्य ग्रंथों का निचोड़ 'बुद्धा एंड हिज धम्मा' है.
बुद्ध हमारे पथ-प्रदर्शक हैं. बुद्धिज़्म, जैसे कि बाबासाहब अम्बेडकर ने बतलाया, हमारे लिए जीवन जीने का एक ढंग है. अगर बाबासाहब हमें बुद्ध के बारे न बतलाते, तो बुद्ध हमारे लिए अपरिचित थे. हमारा प्रथम नमन बुद्ध को नहीं, बाबासाहब अम्बेडकर को है. बुद्ध हमारे लिए जीवन मार्गदाता हैं, जबकि बाबासाहब अम्बेडकर हमारे लिए मुक्तिदाता है.
बुद्धिज़्म के विभिन्न निकायों में, प्रारंभ से ही मतभेद रहें हैं. दरअसल, मतभेद के कारण ही विभिन्न निकाय हुए। बुद्धिज़्म, अपनी जन्म-भूमि से अवनत होने के बाद, अन्यन्य देशों में फैला, वहां की संस्कृति में रचा-बसा। 1956 में जब बाबासाहब अम्बेडकर ने बुद्धिज़्म को इस देश में पुनर्स्थापित किया, तब, बुद्धिस्ज्म बिलकुल भी वैसा नहीं था, जैसे बुद्ध ने देशना की थी। ब्राह्मणवाद उसे पूरी तरह निगल चूका था जैसे कबीर, रैदास आदि कई सामाजिक चितकों को निगल चूका है. ऐसी परिस्थिति में, बाबासाहब अम्बेडकर ने अन्य बुद्धिस्ट देशों से सहायता मांगी। बाबासाहब अम्बेडकर को बुद्धचरित तो मिला, उनका दर्शन भी मिला किन्तु वह उन देशों की संस्कृति और परम्पराओं को भी जाने-अनजाने साथ लाया जो उन देशों में प्रचलित हैं। 'परित्राण-पाठ' और 'विपस्सना' आदि क्रियाएं हमारी संस्कृति और संस्कारों का हिस्सा बन गई.
वर्षों की खोज, अध्ययन और चिंतन के बाद बाबासाहब अम्बेडकर, बुद्ध को ब्राह्मणवाद के चंगुल से अलग करने सफल हुए। उनके इसी प्रयास का नाम 'बुद्धा एंड हिज धम्मा' है। इसी ग्रन्थ में बाबासाहब अम्बेडकर ने बतलाया है कि बुद्ध के नाम पर प्रचलित मत-मतान्तरों, धारणाओं और परम्पराओं में क्या सही है, क्या गलत है ? यथा, हम अपने पडोसी देश सिंहलद्वीप की तरह बुद्ध के दांत के नाम पर पहाड़ की पूजा नहीं कर सकते ? बाबासाहब अम्बेडकर कृत 'बुद्धा एंड हिज धम्मा' हमारे लिए 'कालाम सुत्त' है। गोयनकाजी के विपस्सना केन्द्रों में 'बुद्धा एंड हिज धम्मा', जो अम्बेडकर अनुयायियों और धर्मान्तरित बौद्धों का पवित्र ग्रन्थ है, पर न तो बात होती है और न ही 'जय भीम' का अभिवादन किया जाता है। यहीं नहीं, इस तरह के आंबेडकर विरोधी संस्कारों से बौद्ध भिक्खुओं को प्रशिक्षित किया जाता है।
एक विपस्सी साधक, ध्यान रहे, 'साधक' और 'साधना' जैसे संस्कृति, धम्म में नहीं है; ने 'बुद्धा एंड हिज धम्मा' की यह कह आलोचना की है, कि अम्बेडकर ने बुद्ध के सिर्फ सामाजिक पहलू को पकड़ा है, जो कि भगवान् बुद्ध के धर्म का एक पहलू मात्र है. दूसरी ओर, बाबासाहब अम्बेडकर ही नहीं, चाहे पी. लक्ष्मी नरसू हो अथवा एडविन आर्नोल्ड, बुद्ध को मानवता का केंद्र कहते हैं, मानवता, जो सामाजिक रिश्तों को तय करती है।

अधिकार लोगों से मिलने चाहिए

अधिकार लोगों से मिलने चाहिए-
ऐसा मैंने सुना-
एक बार भगवान सावत्थी के जेतवन में अनाथपिंडक के आवास में विहर रहे थे।
एवं मे सुतं- एकं समयं भगवा सावत्थियं विहरति जेतवने अनाथपिण्डिकस्स आरामे।
तब एसुकारी नामक ब्राह्मण, जहाँ भगवान थे,  वहां गया। जा कर भगवान के साथ कुशल क्षेम पूछ कर एक तरफ बैठ गया। एक और बैठे एसुकारी ब्राह्मण ने भगवान से यह कहा-
तेन खो पन समयेन एसुकारी बाहमणो येन भगवा तेनुपसंकमि। उपसंकमित्वा भगवता सद्धिं सम्मोदि। सम्मोदनीयं कथं वितिसारेत्वा एकमन्त निसीदि। एकमन्त निसिन्नो सो एसुकारी बाहमणो भगवन्तं एतद वोच-
‘‘हे गोतम! ब्राह्मण चार परिचर्या (सेवा धर्म) बताते हैं- ब्राह्मण, ब्राह्मण की परिचर्या करें; क्षत्री, ब्राह्मण की परिचर्या करें; वैश्य, ब्राह्मण की परिचर्या करें; शूद्र, ब्राह्मण की परिचर्या करें। इस प्रकार, गोतम, ब्राह्मण, बाह्मण की परिचरिया बताते हैं।
‘‘बाह्मणा भो गोतम, चतस्सो परिचरिया पञ्ञापेन्ति- बाह्मणा वा बाह्मणं  परिचरेय्य, खत्तिया वा बाह्मणं परिचरेय्य, वेस्सा वा बाह्मणं परिचरेय्य, सुद्दा वा बाह्मणं परिचरेय्य। इदं भो गोतम, बाह्मणा बाह्मणस्स परिचरियं पञ्ञापेन्ति।
वही हे गोतम, ब्राह्मण, क्षत्री की परिचर्या बतलाते हैं- क्षत्री, क्षत्री की परिचर्या करें, वैश्य, क्षत्री की परिचर्या करें। शूद्र, क्षत्री की परिचर्या करें।
तत्र इदं भो गोतम, बाह्मणा, खत्तियस्स पारिचरियं पञ्ञापेन्ति- खत्तियो वा खत्तियं परिचरेय्य। वेस्सो वा खत्तियं परिचरेय्य। सुद्दो वा खत्तियं परिचरेय्य।
उसी प्रकार गोतम, ब्राहमण, वैश्य की परिचर्या बतलाते हैं- वैश्य, वैश्य की परिचर्या करें, शूद्र वैश्य की परिचर्या करें।
तत्र इदं भो गोतम, बाह्मणा, वेस्सस्स पारिचरियं पञ्ञापेन्ति- वेस्सो वा वेस्सं परिचरेय्य, सुद्दो वा वेस्सं परिचरेय्य।
उसी प्रकार ब्राहमण, शूद्र की परिचर्या बतलाते हैं- शूद्र, शूद्र की परिचर्या करें। ब्राह्मण; हे गोतम! ये चार परिचर्या बतलाते हैं।
तत्र इदं भो गोतम, बाह्मणा, सुद्दस्स पारिचरियं पञ्ञापेन्ति- सुद्दो सुद्दं परिचरेय।
हे गोतम, ब्राह्मण ये चार प्रकार की परिचर्या बतलाते हैं। यहां गोतम, क्या कहते हैं?’’
बाह्मणा, भो गोतम, इमा चतस्सो परियाचरिया पञ्ञापेन्ति।  इध भवं गोतम, किं आह ?’’
‘‘किन्तु हे ब्राह्मण, क्या लोगों ने,  ब्राहमणों को ऐसी अनुमति दी है- कि इन परिचर्याओं को प्रज्ञापित करो?’’
‘‘किं पन बाहमण, सब्बो लोको बाहमणानं एतद अनुजानाति- इमा चतस्सो परिचरिया पञ्ञापेन्तु ?’’
‘‘हे गोतम, ऐसा नहीं है।’’
‘‘नो हि इदं भो गोतम।’’
सेय्याथापि, ब्राह्मण, पुरिसो दलिद्दो अस्सको अन-आळिहयो। तस्स अकामस्स बिलं ओलग्गेयुं- इदं ते, अभ्भो पुरिस, मंसं खादितब्बं, मूलं च अनुप्पदातब्बं।
‘‘जैसे, बाहमण! कोई अ-स्वक अन-आढ्य दरिद्र पुरुष हो। अनिच्छु होते भी उसे कहा जाए- हे पुरुष! यह मांस तुम्हे खाना है और इसका मूल्य चुकाना है।
इस प्रकार ब्राह्मण! समण-ब्राह्मणों की अनुज्ञा के बिना ही ब्राह्मणों का इन चार परिचार्याओं का प्रज्ञापन करना है।
एवं येव खो, ब्राह्मण! ब्राह्मणा अप्पटिञ्ञाय तेसं समण-ब्राह्मणानं  अथ च पन इमा चतस्सो परिचारिया  पञ्ञापेन्ति।
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एसुकारी सुत्त म. नि.- 96

राहुलोवाद सुत्त (म. नि. 62)


११३. एवं मे सुतं एकं समयं भगवा सावत्थियं विहरति जेतवने अनाथपिण्डिकस्स आरामे। अथ खो भगवा पुब्बण्हसमयं निवासेत्वा पत्तचीवरमादाय सावत्थिं पिण्डाय पाविसि। आयस्मापि खो राहुलो पुब्बण्हसमयं निवासेत्वा पत्तचीवरमादाय भगवन्तं पिट्ठितो पिट्ठितो अनुबन्धि। अथ खो भगवा अपलोकेत्वा आयस्मन्तं राहुलं आमन्तेसि – ‘‘यं किञ्‍चि, राहुल, रूपं अतीतानागतपच्‍चुप्पन्‍नं अज्झत्तं वा बहिद्धा वा ओळारिकं वा सुखुमं वा हीनं वा पणीतं वा यं दूरे सन्तिके वा सब्बं रूपं नेतं मम, नेसोहमस्मि, न मेसो अत्ताति एवमेतं यथाभूतं सम्मप्पञ्‍ञाय दट्ठब्ब’’न्ति। ‘‘रूपमेव नु खो, भगवा, रूपमेव नु खो, सुगता’’ति? ‘‘रूपम्पि, राहुल, वेदनापि, राहुल, सञ्‍ञापि, राहुल, सङ्खारापि, राहुल, विञ्‍ञाणम्पि, राहुला’’ति। अथ खो आयस्मा राहुलो ‘‘को नज्‍ज [को नुज्‍ज (स्या॰ कं॰)] भगवता सम्मुखा ओवादेन ओवदितो गामं पिण्डाय पविसिस्सती’’ति ततो पटिनिवत्तित्वा अञ्‍ञतरस्मिं रुक्खमूले निसीदि पल्‍लङ्कं आभुजित्वा उजुं कायं पणिधाय परिमुखं सतिं उपट्ठपेत्वा। अद्दसा खो आयस्मा सारिपुत्तो आयस्मन्तं राहुलं अञ्‍ञतरस्मिं रुक्खमूले निसिन्‍नं पल्‍लङ्कं आभुजित्वा उजुं कायं पणिधाय परिमुखं सतिं उपट्ठपेत्वा । दिस्वान आयस्मन्तं राहुलं आमन्तेसि – ‘‘आनापानस्सतिं, राहुल, भावनं भावेहि। आनापानस्सति, राहुल, भावना भाविता बहुलीकता महप्फला होति महानिसंसा’’ति।
११४. अथ खो आयस्मा राहुलो सायन्हसमयं पटिसल्‍लाना वुट्ठितो येन भगवा तेनुपसङ्कमि; उपसङ्कमित्वा भगवन्तं अभिवादेत्वा एकमन्तं निसीदि। एकमन्तं निसिन्‍नो खो आयस्मा राहुलो भगवन्तं एतदवोच – ‘‘कथं भाविता नु खो, भन्ते, आनापानस्सति, कथं बहुलीकता महप्फला होति महानिसंसा’’ति? ‘‘यं किञ्‍चि, राहुल, अज्झत्तं पच्‍चत्तं कक्खळं खरिगतं उपादिन्‍नं, सेय्यथिदं केसा लोमा नखा दन्ता तचो मंसं न्हारु [नहारु (सी॰ स्या॰ कं॰ पी॰)] अट्ठि अट्ठिमिञ्‍जं वक्‍कं हदयं यकनं किलोमकं पिहकं पप्फासं अन्तं अन्तगुणं उदरियं करीसं, यं वा पनञ्‍ञम्पि किञ्‍चि अज्झत्तं पच्‍चत्तं कक्खळं खरिगतं उपादिन्‍नं अयं वुच्‍चति, राहुल, अज्झत्तिका पथवीधातु [पठवीधातु (सी॰ स्या॰ कं॰ पी॰)]। या चेव खो पन अज्झत्तिका पथवीधातु या च बाहिरा पथवीधातु, पथवीधातुरेवेसा। तं नेतं मम, नेसोहमस्मि, न मेसो अत्ताति एवमेतं यथाभूतं सम्मप्पञ्‍ञाय दट्ठब्बं। एवमेतं यथाभूतं सम्मप्पञ्‍ञाय दिस्वा पथवीधातुया निब्बिन्दति, पथवीधातुया चित्तं विराजेति’’
११५. ‘‘कतमा , राहुल, आपोधातु? आपोधातु सिया अज्झत्तिका, सिया बाहिरा। कतमा च, राहुल, अज्झत्तिका आपोधातु ? यं अज्झत्तं पच्‍चत्तं आपो आपोगतं उपादिन्‍नं, सेय्यथिदं पित्तं सेम्हं पुब्बो लोहितं सेदो मेदो अस्सु वसा खेळो सिङ्घाणिका लसिका मुत्तं, यं वा पनञ्‍ञम्पि किञ्‍चि अज्झत्तं पच्‍चत्तं आपो आपोगतं उपादिन्‍नं अयं वुच्‍चति, राहुल, अज्झत्तिका आपोधातु। या चेव खो पन अज्झत्तिका आपोधातु या च बाहिरा आपोधातु आपोधातुरेवेसा। तं नेतं मम, नेसोहमस्मि, न मेसो अत्ताति एवमेतं यथाभूतं सम्मप्पञ्‍ञाय दट्ठब्बं। एवमेतं यथाभूतं सम्मप्पञ्‍ञाय दिस्वा आपोधातुया निब्बिन्दति, आपोधातुया चित्तं विराजेति।
११६. ‘‘कतमा च, राहुल, तेजोधातु? तेजोधातु सिया अज्झत्तिका, सिया बाहिरा। कतमा च, राहुल, अज्झत्तिका तेजोधातु? यं अज्झत्तं पच्‍चत्तं तेजो तेजोगतं उपादिन्‍नं, सेय्यथिदं येन च सन्तप्पति येन च जीरीयति येन च परिडय्हति येन च असितपीतखायितसायितं सम्मा परिणामं गच्छति, यं वा पनञ्‍ञम्पि किञ्‍चि अज्झत्तं पच्‍चत्तं तेजो तेजोगतं उपादिन्‍नं अयं वुच्‍चति, राहुल, अज्झत्तिका तेजोधातु। या चेव खो पन अज्झत्तिका तेजोधातु या च बाहिरा तेजोधातु तेजोधातुरेवेसा। तं नेतं मम, नेसोहमस्मि, न मेसो अत्ताति एवमेतं यथाभूतं सम्मप्पञ्‍ञाय दट्ठब्बं। एवमेतं यथाभूतं सम्मप्पञ्‍ञाय दिस्वा तेजोधातुया निब्बिन्दति, तेजोधातुया चित्तं विराजेति।
११७. ‘‘कतमा , राहुल, वायोधातु? वायोधातु सिया अज्झत्तिका, सिया बाहिरा। कतमा च, राहुल, अज्झत्तिका वायोधातु? यं अज्झत्तं पच्‍चत्तं वायो वायोगतं उपादिन्‍नं, सेय्यथिदं उद्धङ्गमा वाता, अधोगमा वाता, कुच्छिसया वाता, कोट्ठासया [कोट्ठसया (सी॰ पी॰)] वाता , अङ्गमङ्गानुसारिनो वाता, अस्सासो पस्सासो, इति यं वा पनञ्‍ञम्पि किञ्‍चि अज्झत्तं पच्‍चत्तं वायो वायोगतं उपादिन्‍नं अयं वुच्‍चति, राहुल, अज्झत्तिका वायोधातु। या चेव खो पन अज्झत्तिका वायोधातु या च बाहिरा वायोधातु वायोधातुरेवेसा। तं नेतं मम, नेसोहमस्मि , न मेसो अत्ताति एवमेतं यथाभूतं सम्मप्पञ्‍ञाय दट्ठब्बं। एवमेतं यथाभूतं सम्मप्पञ्‍ञाय दिस्वा वायोधातुया निब्बिन्दति, वायोधातुया चित्तं विराजेति।
११८. ‘‘कतमा च, राहुल, आकासधातु? आकासधातु सिया अज्झत्तिका, सिया बाहिरा। कतमा च, राहुल, अज्झत्तिका आकासधातु? यं अज्झत्तं पच्‍चत्तं आकासं आकासगतं उपादिन्‍नं, सेय्यथिदं कण्णच्छिद्दं नासच्छिद्दं मुखद्वारं, येन च असितपीतखायितसायितं अज्झोहरति, यत्थ च असितपीतखायितसायितं सन्तिट्ठति, येन च असितपीतखायितसायितं अधोभागं [अधोभागा (सी॰ स्या॰ कं॰ पी॰)] निक्खमति, यं वा पनञ्‍ञम्पि किञ्‍चि अज्झत्तं पच्‍चत्तं आकासं आकासगतं, अघं अघगतं, विवरं विवरगतं, असम्फुट्ठं, मंसलोहितेहि उपादिन्‍नं [आकासगतं उपादिन्‍नं (सी॰ पी॰)] अयं वुच्‍चति, राहुल, अज्झत्तिका आकासधातु। या चेव खो पन अज्झत्तिका आकासधातु या च बाहिरा आकासधातु आकासधातुरेवेसा। तं नेतं मम, नेसोहमस्मि, न मेसो अत्ताति एवमेतं यथाभूतं सम्मप्पञ्‍ञाय दट्ठब्बं। एवमेतं यथाभूतं सम्मप्पञ्‍ञाय दिस्वा आकासधातुया चित्तं निब्बिन्दति, आकासधातुया चित्तं विराजेति।
११९. ‘‘पथवीसमं, राहुल, भावनं भावेहि। पथवीसमञ्हि ते, राहुल, भावनं भावयतो उप्पन्‍ना मनापामनापा फस्सा चित्तं न परियादाय ठस्सन्ति। सेय्यथापि, राहुल, पथविया सुचिम्पि निक्खिपन्ति, असुचिम्पि निक्खिपन्ति, गूथगतम्पि निक्खिपन्ति, मुत्तगतम्पि निक्खिपन्ति, खेळगतम्पि निक्खिपन्ति, पुब्बगतम्पि निक्खिपन्ति, लोहितगतम्पि निक्खिपन्ति, न च तेन पथवी अट्टीयति वा हरायति वा जिगुच्छति वा; एवमेव खो त्वं, राहुल, पथवीसमं भावनं भावेहि। पथवीसमञ्हि ते, राहुल, भावनं भावयतो उप्पन्‍ना मनापामनापा फस्सा चित्तं न परियादाय ठस्सन्ति।
‘‘आपोसमं, राहुल, भावनं भावेहि। आपोसमञ्हि ते, राहुल, भावनं भावयतो उप्पन्‍ना मनापामनापा फस्सा चित्तं न परियादाय ठस्सन्ति। सेय्यथापि, राहुल, आपस्मिं सुचिम्पि धोवन्ति, असुचिम्पि धोवन्ति, गूथगतम्पि धोवन्ति, मुत्तगतम्पि धोवन्ति, खेळगतम्पि धोवन्ति, पुब्बगतम्पि धोवन्ति, लोहितगतम्पि धोवन्ति, न च तेन आपो अट्टीयति वा हरायति वा जिगुच्छति वा; एवमेव खो त्वं, राहुल, आपोसमं भावनं भावेहि। आपोसमञ्हि ते, राहुल, भावनं भावयतो उप्पन्‍ना मनापामनापा फस्सा चित्तं न परियादाय ठस्सन्ति।
‘‘तेजोसमं, राहुल, भावनं भावेहि। तेजोसमञ्हि ते, राहुल, भावनं भावयतो उप्पन्‍ना मनापामनापा फस्सा चित्तं न परियादाय ठस्सन्ति। सेय्यथापि, राहुल, तेजो सुचिम्पि दहति, असुचिम्पि दहति, गूथगतम्पि दहति, मुत्तगतम्पि दहति, खेळगतम्पि दहति, पुब्बगतम्पि दहति, लोहितगतम्पि दहति, न च तेन तेजो अट्टीयति वा हरायति वा जिगुच्छति वा; एवमेव खो त्वं, राहुल, तेजोसमं भावनं भावेहि। तेजोसमञ्हि ते, राहुल, भावनं भावयतो उप्पन्‍ना मनापामनापा फस्सा चित्तं न परियादाय ठस्सन्ति।
‘‘वायोसमं, राहुल, भावनं भावेहि। वायोसमञ्हि ते, राहुल, भावनं भावयतो उप्पन्‍ना मनापामनापा फस्सा चित्तं न परियादाय ठस्सन्ति। सेय्यथापि, राहुल, वायो सुचिम्पि उपवायति, असुचिम्पि उपवायति, गूथगतम्पि उपवायति, मुत्तगतम्पि उपवायति, खेळगतम्पि उपवायति, पुब्बगतम्पि उपवायति, लोहितगतम्पि उपवायति, न च तेन वायो अट्टीयति वा हरायति वा जिगुच्छति वा; एवमेव खो त्वं, राहुल, वायोसमं भावनं भावेहि। वायोसमञ्हि ते, राहुल, भावनं भावयतो उप्पन्‍ना मनापामनापा फस्सा चित्तं न परियादाय ठस्सन्ति।
‘‘आकाससमं, राहुल, भावनं भावेहि। आकाससमञ्हि ते, राहुल, भावनं भावयतो उप्पन्‍ना मनापामनापा फस्सा चित्तं न परियादाय ठस्सन्ति। सेय्यथापि, राहुल, आकासो न कत्थचि पतिट्ठितो; एवमेव खो त्वं, राहुल, आकाससमं भावनं भावेहि। आकाससमञ्हि ते, राहुल, भावनं भावयतो उप्पन्‍ना मनापामनापा फस्सा चित्तं न परियादाय ठस्सन्ति।
१२०. ‘‘मेत्तं, राहुल, भावनं भावेहि। मेत्तञ्हि ते, राहुल, भावनं भावयतो यो ब्यापादो सो पहीयिस्सति। करुणं, राहुल, भावनं भावेहि। करुणञ्हि ते, राहुल, भावनं भावयतो या विहेसा सा पहीयिस्सति। मुदितं, राहुल, भावनं भावेहि। मुदितञ्हि ते, राहुल, भावनं भावयतो या अरति सा पहीयिस्सति। उपेक्खं , राहुल, भावनं भावेहि। उपेक्खञ्हि ते, राहुल, भावनं भावयतो यो पटिघो सो पहीयिस्सति। असुभं, राहुल, भावनं भावेहि। असुभञ्हि ते, राहुल, भावनं भावयतो यो रागो सो पहीयिस्सति। अनिच्‍चसञ्‍ञं, राहुल, भावनं भावेहि। अनिच्‍चसञ्‍ञञ्हि ते, राहुल, भावनं भावयतो यो अस्मिमानो सो पहीयिस्सति।
१२१. ‘‘आनापानस्सतिं, राहुल, भावनं भावेहि। आनापानस्सति हि ते, राहुल, भाविता बहुलीकता महप्फला होति महानिसंसा। कथं भाविता च, राहुल, आनापानस्सति, कथं बहुलीकता महप्फला होति महानिसंसा ? इध, राहुल, भिक्खु अरञ्‍ञगतो वा रुक्खमूलगतो वा सुञ्‍ञागारगतो वा निसीदति पल्‍लङ्कं आभुजित्वा उजुं कायं पणिधाय परिमुखं सतिं उपट्ठपेत्वा। सो सतोव अस्ससति सतोव [सतो (सी॰ स्या॰ कं॰ पी॰)] पस्ससति।
‘‘दीघं वा अस्ससन्तो दीघं अस्ससामीति पजानाति, दीघं वा पस्ससन्तो दीघं पस्ससामीति पजानाति; रस्सं वा अस्ससन्तो रस्सं अस्ससामीति पजानाति, रस्सं वा पस्ससन्तो रस्सं पस्ससामीति पजानाति। सब्बकायप्पटिसंवेदी अस्ससिस्सामीति सिक्खति; ‘सब्बकायप्पटिसंवेदी पस्ससिस्सामीति सिक्खति; ‘पस्सम्भयं कायसङ्खारं अस्ससिस्सामीति सिक्खति; ‘पस्सम्भयं कायसङ्खारं पस्ससिस्सामीति सिक्खति।
‘‘‘पीतिप्पटिसंवेदी अस्ससिस्सामीति सिक्खति; ‘पीतिप्पटिसंवेदी पस्ससिस्सामीति सिक्खति; ‘सुखप्पटिसंवेदी अस्ससिस्सामीति सिक्खति; ‘सुखप्पटिसंवेदी पस्ससिस्सामीति सिक्खति; ‘चित्तसङ्खारप्पटिसंवेदी अस्ससिस्सामीति सिक्खति; ‘चित्तसङ्खारप्पटिसंवेदी पस्ससिस्सामीति सिक्खति; ‘पस्सम्भयं चित्तसङ्खारं अस्ससिस्सामीति सिक्खति; ‘पस्सम्भयं चित्तसङ्खारं पस्ससिस्सामीति सिक्खति।
‘‘‘चित्तप्पटिसंवेदी अस्ससिस्सामीति सिक्खति; ‘चित्तप्पटिसंवेदी पस्ससिस्सामीति सिक्खति ; ‘अभिप्पमोदयं चित्तं अस्ससिस्सामीति सिक्खति; ‘अभिप्पमोदयं चित्तं पस्ससिस्सामीति सिक्खति; ‘समादहं चित्तं अस्ससिस्सामीति सिक्खति; ‘समादहं चित्तं पस्ससिस्सामीति सिक्खति; ‘विमोचयं चित्तं अस्ससिस्सामीति सिक्खति; ‘विमोचयं चित्तं पस्ससिस्सामीति सिक्खति।
‘‘‘अनिच्‍चानुपस्सी अस्ससिस्सामीति सिक्खति; ‘अनिच्‍चानुपस्सी पस्ससिस्सामीति सिक्खति; ‘विरागानुपस्सी अस्ससिस्सामीति सिक्खति; ‘विरागानुपस्सी पस्ससिस्सामीति सिक्खति; ‘निरोधानुपस्सी अस्ससिस्सामीति सिक्खति; ‘निरोधानुपस्सी पस्ससिस्सामीति सिक्खति; ‘पटिनिस्सग्गानुपस्सी अस्ससिस्सामीति सिक्खति; ‘पटिनिस्सग्गानुपस्सी पस्ससिस्सामीति सिक्खति।
‘‘एवं भाविता खो, राहुल, आनापानस्सति, एवं बहुलीकता महप्फला होति महानिसंसा। एवं भाविताय, राहुल, आनापानस्सतिया, एवं बहुलीकताय येपि ते चरिमका अस्सासा तेपि विदिताव निरुज्झन्ति नो अविदिता’’ति।
इदमवोच भगवा। अत्तमनो आयस्मा राहुलो भगवतो भासितं अभिनन्दीति।
महाराहुलोवादसुत्तं निट्ठितं दुतियं।

Sunday, September 1, 2019

किलिंग ऑफ़ अम्बेडकर थाट्स

किलिंग ऑफ़ अम्बेडकर थाट्स
विपस्सना हो या परित्राण पाठ, यह बुद्ध की देशना नहीं है. जो लोग इस तरह की बात करते हैं, वे अम्बेडकर के साथ-साथ बुद्ध के विचारों की हत्या करते हैं. बुद्ध कतई ऐसे नहीं है. बुद्ध का चिंतन, दर्शन कतई ऐसा नहीं है. बुद्ध आँख बंद करने की नहीं, आँख खोलने की बात करते हैं. 'कालाम सुत्त' आँख खोलने की बात करता है. 
गोयनकाजी ने बुद्ध को पारम्परिक हिन्दू सोच से पकड़ा. उनकी दृष्टि अम्बेडकरवादी नहीं थी. गोयनकाजी ने बुद्ध को किसी बीमारी के 'उपचार' के रूप में पकड़ा. जबकि अम्बेडकर ने उसे सामाजिक परिवर्तन का 'घोषणा-पत्र' कहा. गोयनकाजी की एप्रोच एक 'बीमार' की सोच है, जबकि अम्बेडकर की सोच एक 'युग दृष्टा' की सोच है. विपस्सना से मन को साधना वैसे ही है जैसे बाबा रामदेव के योगा से बिमारियों को ठीक करना।
बुद्ध के सम्बन्ध में पारम्परिक सोच का पर्दाफाश करने ही तो बाबासाहब अम्बेडकर ने 'बुद्धा एंड हिज धम्मा' लिखा. 'बुद्धा एंड हिज धम्मा' विपस्सना का कतई प्रचार नहीं करता. उलटे, गर्हा करता है. दरअसल, आम्बेडकर थाट्स को धीमे जहर से मारने का नाम है, विपस्सना. अम्बेडकरवादियों के उबलते खून को फ्रिज करने का नाम है, विपस्सना.
विपस्सना से सामाजिक 'समरसता' की बात करना ठीक वैसे ही है जैसे रामचरित मानस पाठ से 'रामराज्य' की स्थापना करना.