Wednesday, June 10, 2020

जलियांवाला कांड; पंजाब में 'ऊंच'-बनाम 'नीच' जातिय संघर्ष की सोची-समझी साजिश

जलियांवाला कांड; पंजाब में 'ऊंच'-बनाम 'नीच' जातिय संघर्ष की सोची-समझी साजिश-
पंजाब विश्वविद्यालय में प्रोफेसर गुरनाम सिंह जी ने जलियांवाला बाग के विषय में ठोस सबूतों के साथ दावा किया है कि जालियाँवाला बाग नरसंहार का कारण भारतीयों और अंग्रेजों के बीच की लड़ाई नहीं थी, बल्कि पंजाब में चल रहे 'ऊंच'-बनाम 'नीच' जातिय संघर्ष की परिणति थी. दरअसल, वहां उन अछूत सिखों की एक सभा सभा चल रही थीं, जिन्हें स्वर्ण-मंदिर में घुसने नहीं दिया गया था। प्रोफेसर गुरनाम सिंह जी के भाषण का वीडियो भी यू ट्यूब में उपलब्ध है. पुष्टि हेतु आप उसे भी देख सकते हैं।
प्रो. गुरुनाम सिंह के अनुसार प्रथम विश्वयुद्ध 1918 में भाग लेने के बाद 1919 में जो सिख सकुशल बच आये थे, वे गुरु का शुक्रिया अदा करने दरबार साहिब अमृतसर गये थे. मगर अछूत सिखों को स्वर्ण मंदिर में प्रवेश नहीं दिया गया। उनको न केवल जातिवाद के चलते अंदर जाने नही दिया गया, बल्कि उन का अपमान भी किया गया, उन को गालियां दी गई। इन सब बातों का विरोध करने के लिये वह लोग ईकठ्ठा हुए, जालियाँवाला बाग में उनकी मीटिंग रखी गई क्योंकि दोनों ही स्थान आमने सामने हैं इसलिए वही उचित स्थान चुना गया था।
उस सभा में जो गोलियां चली वो जत्थेदार अरुर सिंह के कहने पर जनरल डायर ने चलवाई थी, जो कि उन दिनों स्वर्णमंदिर के मैनेजर था। उसी ने इस पटकथा को लिखा और बदला। जब गोली चली अफरातफरी मची और हजारों लोग मारे गये तब बाकि सिखों ने जनरल डायर को दरबार साहिब ले गए और वहां जाकर जनरल डायर का सम्मान किया गया. उसको सरोपा (Robe of Honour) भेट किया गया। स्मरण रहे, इस घटना को जगदेव सिंह जस्सोवाल (Former Congress MLA, Died Dec. 2014) ने पार्लियामेंट में एक डिबेट के दौरान नोट करवाई हुई है। इतनी बड़ी इन्फर्मेशन लोगों को पता नहीं है।
जालियाँवाला बाग हत्याकांड अछूत लोगों पर हुआ था और उन पर गोली ऊँची जाति के लोगों के कहने पर चलाई गई और उस की रुपरेखा बदल दी गई। अब ऐसा क्यों किया गया पहले वह समझें। ब्रिटिश सेना में ज्यादात्तर सिपाही निम्न वर्ग के ही थे। चमार रेजिमेंट और विश्व युद्ध मे लड़े इन लड़ाकुओं ने अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा ही लिया था। ऐसे में यदि निम्न जाति के बहादूरी की यह बात सार्वजनिक हो जाती तो भारत के ऊंची जातियों को इसका बड़ा खामियाजा भुगतना पड़ता। साथ ही अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई भी कमजोर पड़ जाती। इसलिए इस लड़ाई को भारतीय बनाम अंग्रेज बनाया गया और जनरल डायर को सीधे इंग्लैंड भेजा गया।
इससे निम्न तबकों में अंग्रेजों के खिलाफ रोष पैदा हो गया और असली अपराधी बच निकले। हमारे देश के इतिहास को जितना जातिवादी लोगों ने तोड़-मरोड़ कर पेश किया है, शायद ही दुनियां के किसी और देश में किया गया हो। दरसल यह सब एक सोची-समझी साजिश के तहत किया गया। जिस जलियाँवाला काण्ड को हम यह कह कर पढ़ते हैं कि वहां पर देशभक्तों की देश की आजादी के लिए मीटिंग हो रही थी, दरअसल वहां पर देशभक्तों की तो ठीक है; पर स्वर्ण-मंदिर से जलील किए गए "अछूतों की मीटिंग" हो रही थी, जो अपने उच्च जातिय भेदभाव के मुद्दों पर विचार करने के लिए इकट्ठे हुए थे।
सोचिये! जालियांवाला हत्याकांड के मुजरिम जनरल ड़ायर को स्वघोषित उच्च जाति के बड़े-बड़े महान क्रांतिकारीयों ने क्यों नहीं मारा? या फिर यदि यह भारतीय बनाम अंग्रेज ही होता तो कोई नेता, संगठन बड़ा क्रांतिकारी उसकी अगुवाई कर रहा होता? उसका नाम आपको क्यों नहीं पता? जब जलियांवाला बाग नरसंहार के बदले की बात आई तब भी एक दलित व्यक्ति सरदार उधमसिंह ने ही उसे लंदन में घुसकर मारा क्यों? इसलिए इतिहास जरूरी नहीं कि वही सही हो जो आपने पढ़ा हो(डी. के. राणा की वाल से)।

Tuesday, June 9, 2020

पालि साहित्य सर्जन

भारत में जब बौद्ध ग्रन्थ जलाये जा रहे थे, विश्व-विद्यालयों को लूटा जा रहा था, बौद्ध भिक्खु और धम्म आचार्यों की हत्या की जा रही थी ठीक उसी समय पड़ोस के सिंहल देश में पालि  भाषा की अन्यन्य  विधाओं पर उत्कर्ष ग्रन्थ रचे जा रहे थे।

सिंहल द्वीप में पालि- साहित्य सर्जन की उक्त गतिविधियों का सारा श्रेय वहां के तत्कालीन राजा पराक्रमबाहु प्रथम( 1153 -1186 ईस्वी )  एवं पराक्रमबाहु द्वितीय (1236 -1271  ईस्वी ) को जाता है। 

पराक्रमबाहु प्रथम के शासन काल में मोग्गल्लान व्याकरण की रचना की गई तथा सारिपुत्त एवं उनके प्रमुख शिष्यों द्वारा ति-पिटक  के टीका साहित्य के सर्जन का  महान  कार्य संपन्न हुआ। पराक्रम बाहु द्वितीय के शासन काल में पालि  के काव्य, अलंकार, छंद शास्त्र आदि से सम्बंधित ग्रंथों का प्रणयन हुआ।

पालि ग्रंथों की लिए भारत के प्रकांड पंडितों को बुलाया गया।  इन पंडित भिक्खुओं ने संस्कृत के भिन्न-भिन्न ग्रंथों को आधार बनाकर पालि  में ग्रन्थ रचना की। कवियों ने अपने काव्य-ग्रंथों में सजाने और संवारने के लिए ज्ञेयावरण प्रहाण, महाकरुणा, भक्ति-भावना, धर्मकाय एवं निर्माणकाय जैसी महायानी मान्यताओं को भी बिना किसी संकोच के अपनाया था(स्रोत- पालि साहित्य का इतिहास: कोमल चन्द्र जैन)। 

हिन्दुओं का दलित प्रेम

प्रसंग लंदन के द्वितीय गोलमेज सम्मेलन का है। दलित जातियों के प्रति हिन्दुओं के व्यवहार से तंग आकर बाबासाहब अम्बेडकर ने अंग्रेजों के सामने 'पृथक निर्वाचन' की मांग रखी थी। इस पर मदनमोहन मालवीय ने भरी सभा में बाबासाहब डॉ० भीमराव अम्बेडकर को पृथक निर्वाचन को अनावश्यक बताते हुए कहा- 'अम्बेडकर मेरे छोटे भाई हैं और हम सब समान हैं, एक हैं।'

इस पर अम्बेडकर ने पानी का एक गिलास उठा कर मदन मोहन मालवीय की तरफ बढ़ा कर कहा- 'आप मेरे बड़े भाई हैं, तो छोटे भाई के हाथ का पानी पी लीजिये'।

अम्बेडकर के इस कृत्य पर मदन मोहन मालवीय स्तब्ध रह गए। सभी की नज़रे मदन मोहन मालवीय की ओर थी। किन्तु वे   डॉ० भीमराव अम्बेडकर के हाथ का पानी पीने की हिम्मत नहीं जुटा सके। 


और तब,  बाबासाहेब डॉ० अम्बेडकर आसंदी पर बैठे सभापति की और देख कर कहा-  यही है, हमारे देश के हिन्दू भाइयों का प्रेम। इसलिए, इस प्रेम को गहराई से समझने की आवश्यकता है। महोदय,  मैं तमाशे के लिए यहाँ नही आया हूँ। बल्कि उनके लिए आया हूँ जिनकी परछाई से भी ऐसे लोग अपवित्र हो जाते हैं। हम हजारों वर्षों में अपनी मानसिक गंदगी नही मिटा सके। सामाजिक गंदगी और स्वच्छ भारत तो केवल एक नारा है।

पालि में अभिलेख साहित्य

पालि में अभिलेख साहित्य
पालि साहित्य के अभिलेख साहित्य की काल-सीमा 300 ई. पू से 1500  ईस्वी  है।  इस में प्रमुख रूप से अशोक के शिलालेख, साँची और भारहुत के अभिलेख , सारनाथ के कनिष्क  कालीन अभिलेख, मोंगन(बर्मा) के 2 स्वर्ण पत्र लेख, बोबोगी पेगोडा(बर्मा) के खंडित शिलालेख, प्रोम के स्वर्ण पत्र, पेगन के 1442 ईस्वी के अभिलेख  तथा कल्याणी अभिलेख का समावेश किया जाता है।

अशोक के शिला लेखों में उपदिष्ट धर्म को केवल बौद्ध धर्म का कहना उचित नहीं है।  वह धर्म सम्पूर्ण भारतीय धर्मों का समन्वित रूप था। यद्यपि अशोक में जो परिवर्तन हुआ, वह निश्चित रूप से बौद्ध धर्म के प्रभाव के कारण हुआ था।

इससे यह भी निष्कर्ष निकलता है कि ति-पिटक अशोक के समय एक निश्चित रूप धारण कर चुका था। साँची और भारहुत के अभिलेखों में उल्लिखित सुत्तन्तिकपेटकी, धम्मकथिक, पञ्चनेकायिक, भाणक जैसे शब्द यह बतलाते हैं कि 300-200 ई. पू. पिटक, सुत्त, पञ्चनिकाय आदि में बुद्ध वचनों का वर्गीकरण प्रसिद्द था और उनका संगायन करने वाले भिक्खु भी पाए जाते थे। भारहुत और साँची को पाषाण-वेष्ठनियों पर अंकित चित्र जातक की प्राचीनता व्यक्त करते हैं। सारनाथ के कनिष्क कालीन अभिलेख धम्मचक्कपवत्तन सुत्त के एतिहासिक महत्त्व पर प्रकाश डालते हैं।

बर्मा के अभिलेख बौद्ध धर्म एवं पालि-साहित्य के विकास को जानने के लिए परम उपयोगी है। मोंगम (बर्मा) के 2 स्वर्ण-पत्र लेखों में पहला 5-6 वीं ईस्वी में बर्मा में बौद्ध धर्म की प्रगति पर प्रकाश डालता है, वही द्वितीय लेख में ति-रतन वंदना अंकित है। बोबोगी के खंडित पाषाण लेख में अभिधम्म पिटक के ही एक ग्रन्थ का उद्धरण है, जो बर्मा में अभिधम्म पिटक के प्रति व्याप्त सम्मान को व्यक्त करता है। इसी प्रकार प्रोम के स्वर्ण-पत्र  लेख में विनय और अभिधम्मपिटक के कुछ उद्धरण हैं।

पेगन के 1442 के अभिलेख में भिक्खु संघ के लिए बौद्ध उपासक वांग टिन और उसकी पत्नी द्वारा दिए दान का उल्लेख है।  अन्य वस्तुओं के साथ  उन 295 ग्रंथों का भी उल्लेख हैं, जिनका दान भिक्खु-संघ को दिया गया था।
अभिलेख में उल्लिखित 295  ग्रंथों की यह सूची बर्मा में 1500  ईस्वी तक पालि  साहित्य की प्रगति को समझने के लिए अत्यंत उपयोगी है। राजा धम्मचेति  के कल्याणी अभिलेख में, जिनका समय 1467  ईस्वी है, उन ग्रंथों का उल्लेख है, जिनकी सहायता से भिक्खुओं की उपसम्पदा विधि एवं विहार-सीमा के विषय में महत्वपूर्ण निर्णय लिया गया था।  इन ग्रंथों में पातिमोक्ख, खुद्दक सिक्खा, विमति विनोदनी, विनय पालि , सारत्थ  दीपनी, कंखा  वितरणी, विनय संगहप्पकरण , सीमा लंकारप्पकरण अदि उल्लेखनीय है(स्रोत- पालि  साहित्य का इतिहास; कोमल चंद्र जैन) ।

बौद्ध घृणा

बौद्ध घृणा-
बुद्ध- बुद्धू, मूर्ख।
मुंड/मुण्डक- मूर्ख।
प्रज्ञागिरि- ढोंगेश्वरी गुफा।
भिक्खु- भिक्षा/ भीख मांगने वाला, भिखारी।
मोहन जोदड़ो- मुर्दों का टीला।  'मुअन-जो- दड़ो' (सिन्धी भाषा का नाम)
निच्च(नित्य)- नीच।
भद्दिय(भद्र)- भद्दा।
भगवा- भंगी।


नक़ल-
धम्म चक्क/असोक चक्क- सुदर्शन चक्र।