Wednesday, January 20, 2021
Tuesday, January 19, 2021
Kalam Sutta
एवं मे सुतं- एकं समयं भगवा कोसले सु चारिकं चरमानो महत्ता भिक्खु संघेन सद्धिं येन केस मुत्तं नाम कालामानं निगमो तदवसरि. ---
कुशल कर्मों का अभ्यास करो-
कुशल कर्मों का अभ्यास करो-
भिक्खुओ! कुशल कर्मों का अभ्यास करो।
कुसलं भिक्खवे! भावेथ।
भिक्खुओ! कुशल कर्मों का अभ्यास हो सकता है।
सक्का भिक्खवे! कुसलं भावेतुं।
भिक्खुओ! यदि कुशल कर्मों का अभ्यास न किया जा सकता, तो मैं ऐसा नहीं कहता।
नो च इदं भिक्खवे! सक्का अभविस्स कुसलं भावेतुं, नाहं एवं वदेय्य।
लेकिन, क्योंकि कुशल कर्मों का अथ्यास हो सकता है, इसलिए मैं कहता हूं कि भिक्खुओ! कुशल कर्मों का अभ्यास करो।
यस्मा खो च भिक्खवे। सक्का कुसलं भावेतु, तस्माहं एवं वदामि- कुसलं भिक्खवे! भावेथ।
भिक्खुओ! यदि कुशल कर्मों का अभ्यास करने से अहित और दुक्ख होता, तो मैं ऐसा नहीं कहता।
कुसलं च हिदं भिक्खवे! भावितं अहिताय दुक्खाय संवत्तेय्य, नाहं एवं वदेय्य।
लेकिन, क्योंकि कुशल कर्मों का अभ्यास हित और सुख के लिए होता है, इसलिए मैं कहता हूं कि भिक्खुओ! कुशल कर्मों का अभ्यास करो।
यस्मा च खो भिक्खवे! कुसलं भावितं हिताय सुखाय संवत्तति, तस्माहं एवं वदामि- कुसलं भिक्खवे! भावेथ‘ ’’ति(अधिकरणवग्गोः दुकनिपातः अंगुत्तर निकाय पृ. 81/324)। ।
अकुशल कर्मों को छोड़ो
अकुशल कर्मों को छोड़ो-
भिक्खुओ! अकुशल कर्मों को छोड़ो।
अकुसलं भिक्खवे! पजहथ।
भिक्खुओ! अकुशल कर्मों को छोड़ा जा सकता है।
सक्का भिक्खवे! अकुसलं पजहितुं।
भिक्खुओ! यदि अकुशल कर्मों को न छोड़ जा सकता, तो मैं ऐसा नहीं कहता।
नो च इदं भिक्खवे! सक्का अभविस्स अकुसलं पजहेतुं, नाहं एवं वदेय्य।
लेकिन, क्योंकि अकुशल कर्मों को छोड़ा जा सकता है, इसलिए मैं कहता हूं कि भिक्खुओ! अकुशल कर्मों को छोड़ो।
यस्मा खो च भिक्खवे। सक्का अकुसलं पजहितुं, तस्माहं एवं वदामि- अकुसलं भिक्खवे! पजहथ।
भिक्खुओ! यदि अकुशल कर्मों के त्याग से हित और सुख होता, तो मैं ऐसा नहीं कहता।
अकुसलं च हिदं भिक्खवे! पहीनं हिताय सुखाय संवत्तेय्य, नाहं एवं वदेय्य।
लेकिन, क्योंकि अकुशल कर्मों का त्याग हित और सुख के लिए होता है, इसलिए मैं कहता हूं कि भिक्खुओ! अकुशल कर्मों का अभ्यास करो।
यस्मा च खो भिक्खवे! अकुसलं पहीनं हिताय सुखाय संवत्तति, तस्माहं एवं वदामि- अकुसलं भिक्खवे! पजहथ‘ ’’ति(अधिकरणवग्गोः दुकनिपातः अंगुत्तर निकाय पृ. 81/324)। ।
चक्षु होते हुए भी अकुशल धर्म(पदार्थ) न देखना
चक्षु होते हुए भी अकुशल धर्म(पदार्थ) न देखना, कान होते हुए भी अकुशल शब्द न सुनना, वाचा होते हुए भी अकुशल शब्द न बोलना; शायद, यही अष्टांगी मार्ग है.
आईए देखें, बुद्ध के उपस्थापक और धम्माधिकारी आनन्द, इसे सहधर्मी भिक्खुओं को कैसे समझाते हैं-
एकं समयं आयस्मा आनन्दो कोसम्बियं विहरति घोसितारामे।