Wednesday, May 13, 2020

पालि को वैदिक भाषा की संतान कहना भ्रामक

पालि को वैदिक भाषा की संतान कहना भ्रामक
भिक्षु जगदीश काश्यप ने अपने कालजयी ग्रन्थ पालि महाव्याकरण में वैदिक, पालि और संस्कृत की चर्चा करते हुए लिखा है कि देश तथा अवस्था के प्रभाव से वैदिक भाषा की संतान पालि तथा प्राकृत भाषाएँ हुई(दूसरा खंड: पालि और वैदिक भाषा, पृ. तेईस)।
भंतेजी के कथन की विवेचना करने पर इसमें कुछ  अस्वाभाविक दिखाई नहीं देता। एक ब्राह्मण होने के नाते ऐसा कहना उनका धर्म ही था। अब हम इसके विरोध में कई तथ्य रखते हैं-
1 . आदिमानव काल में  संकेत ही भाषा का कार्य करते थे।
2. भिन्न-भिन्न जलवायु/क्षेत्र के लोगों के उनकी भिन्न-भिन्न आवश्यकता के अनुरूप परस्पर व्यवहार के लिए भिन्न संकेतों का होना स्वाभाविक है।
2 . परस्पर व्यवहार के इन संकेतों से धीरे-धीरे बोली/ भाषा का विकास हुआ। विभिन्न  क्षेत्रीय बोलियां इसका परिणाम हैं।
3 . भारत की बात करें तो तिब्बती,  कश्मीरी आदि उत्तरीय;  बंगला, असमिया  आदि पूर्वीय; मागधी, मराठी आदि मध्य भारतीय; वैदिक आर्यवर्तीय, पंजाबी, गुजराती आदि पश्चिम भारतीय और मलयालम, कन्नड़ आदि दक्षिणी भारतीय बोली/भाषाएँ हैं।
4 .  600 ईसा पूर्व बुद्ध और महावीर ने अपने उपदेश 'मागधी भाषा' में देकर इसे  क्षेत्रीय बोली/भाषा से उठा कर मगध की राज भाषा बनाने का मार्ग प्रशस्त किया।
5. ईसा पूर्व 330 में अशोक ने बुद्ध के उपदेशों को,  जो मागधी(पालि) भाषा में थे, अपने शिलालेखों में धम्मलिपि में लिखवाकर और उन्हें अपने वृहत साम्राज्य के विभिन्न स्थानों में स्थापित करा कर भारत की संस्कृति और सभ्यता को विश्व के कोने-कोने में पहुंचा दिया।
6.  लगभग इसी समय पाणिनि(250 ई. पू. ) ने आर्यवर्त की हिंदी/ वैदिक बोली/भाषा को, जो ब्राह्मण और 'कुलीन पुरुषों ' द्वारा ही विस्मृत हो रही थी, को सूत्राबद्ध किया। पाणिनि को 300 ई. पू. के पहले रखना अत्यंत कठिन है(डॉ आर्थर ए. मेकडानल: संस्कृत व्याकरण प्रवेशिका(1973): संस्कृत व्याकरण का संक्षिप्त इतिहास पृ. 9)।
7. ब्राह्मणों ने वेदों को, जो वैदिक बोली/भाषा में हैं, तथा जो ब्राह्मण को 'देव',  'देवता' और 'पूज्य' बतलाते हैं तथा इतर ब्राह्मणों को दैत्य, दानव, राक्षस आदि घृणा के पात्र बतलाते हैं, भेद खुलने के भय से गैर-ब्राह्मणों से दूर रखा.
8. यह कि बिंदु क्र. 3 के अंतर्गत भारत की क्षेत्रीय बोली/भाषाओँ को वैदिक संस्कृत से जोड़ना भ्रामक है। ये सारी प्राकृत क्षेत्रीय बोली/भाषाएँ, जिसमें वैदिक भाषा भी सम्मिलित हैं, विभिन्न क्षेत्रीय जलवायु और आवश्यकतों के अनुरूप समृद्ध हुई हैं।  अंतर केवल इतना है कि जिस प्रकार वैदिक/संस्कृत को आर्यों ने तरजीह दी उसी प्रकार  मागधी भाषा को बुद्ध और महावीर ने तरजीह दी।
9. दरअसल, भारत का इतिहास 'आर्य' और 'गैर-आर्य' संस्कृतियों अर्थात ब्राह्मण और समण(श्रमण) संघर्ष का इतिहास है। 'समण-संस्कृति' के ध्वज-वाहक  स्वयं को यहाँ की आदि समृद्ध सभ्यता  'मोहन-जोदड़ो और हड़प्पा संस्कृति ' से जोड़ते हैं। बाद के दिनों में आर्य और आर्येतर सांस्कृतिक आन्दोलन की चरम परिणति हम बौद्ध धर्म के अभ्युदय में देखते हैं (डॉ गोविन्द चन्द्र पांडे: बौद्ध धर्म के विकास का इतिहास, पृ.. 1)।
10. ब्राह्मण संस्कृति और इसके झंडाबरदारों का यह कथन कि 'वैदिक संस्कृत' भारतीय भाषाओँ की जननी है,  भ्रामक और तथ्यों को झूठलाने वाला कुप्रचार है.
11.  दक्षिण भारत की मलयालम, कन्नड़ आदि 'द्रविड़-भाषा परिवार' की भाषाओँ को तो स्वयं ब्राह्मण भाषाविद 'भारोपीय भाषा परिवार' के अंतर्गत नहीं मानते। यद्यपि 'सिन्धु घाटी' की लिपि को अभी तक पढ़ा नहीं जा सका है किन्तु अधिक संभावना यही है कि वे 'द्रविड़ भाषाएँ' ही बोला करते थे(वी, डी. महाजन: प्राचीन भारत का इतिहास, पृ. 43)।
12.  संस्कृत की अंधभक्ति और पालि के दुराग्रह ने अशोक के शिलालेखों की लिपि को 'ब्राह्मी' प्रचार कर दिया। जबकि उन शिलालेखों में स्पष्ट लिखवाया गया है कि यह 'धम्मलिपि' में हैं.

Tuesday, May 12, 2020

दलित साहित्य की 10 सर्वोत्तम रचानाएं

सन 2013 में बीबीसी हिंदी के लिए दलित साहित्य की 10 श्रेष्ठ रचनाओं का चयन ओमप्रकाश वाल्मीकि ने किया था जो हिंदी दलित साहित्य के सबसे बड़े लेखक हैं।
16 सितंबर 2013 को प्रस्तुत इस रिपोर्ट को बीबीसी के लिए अमरेश द्विवेदी ने तैयार किया था।
2013 की इस अवधि के बाद हिंदी दलित साहित्य ने काफ़ी फैलाव एवं महत्व प्राप्त किया है। अनेक विश्वविद्यालयों में दलित रचनाओं एवं किताबों पर एमफिल, पीएचडी सहित अनेक प्रकार के शोध अध्ययन हो रहे हैं तथा ये चीज़ें स्कूल, कॉलेज के पाठ्यक्रमों में भी लग रही हैं।
क्या 2013 की इस अवधि के बाद हिंदी दलित साहित्य की रचनाओं का ऐसा कोई आकलन आया है?
मसलन, 2013 के बाद हिंदी दलित साहित्य की 10 सर्वश्रेष्ठ रचनाओं की।अगर तलाश की जाए तो उनमें किस किस को रखा जा सकता है?
बहरहाल, बीबीसी के लिए वाल्मीकि के उक्त आकलन से यहाँ नीचे परिचय कीजिये :
हिंदी दलित साहित्य में दलितों के जीवन को केंद्र में रखकर अनेक किताबें (एवं कविता-कहानियाँ) लिखी गई हैं. मैंने उनमें से कुछ वैसी किताबों (एवं कविता-कहानियों) को यहां शामिल किया है जिनमें दलित जीवन की सच्चाई बेहद यथार्थवादी नज़रिए से अभिव्यक्त हुई है.
1. जूठन (आत्मकथा)- ओम प्रकाश वाल्मीकि
दलित साहित्य में ‘जूठन’ ने अपना एक विशिष्ट स्थान बनाया है. इस पुस्तक ने दलित, गैर-दलित पाठकों, आलोचकों के बीच जो लोकप्रियता अर्जित की है, वह उल्लेखनीय है.
स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद भी दलितों को शिक्षा प्राप्त करने के लिए जो एक लंबा संघर्ष करना पड़ा, 'जूठन' इसे गंभीरता से उठाती है.
प्रस्तुति और भाषा के स्तर पर यह रचना पाठकों के अन्तर्मन को झकझोर देती है.
भारतीय जीवन में रची-बसी जाति–व्यवस्था के सवाल को इस रचना में गहरे सरोकारों के साथ उठाया गया है.
दलितों की वेदना और उनका संघर्ष पाठक की संवेदना से जुड़कर मानवीय संवेदना को जगाने की कोशिश करते हैं. इसीलिए यह पुस्तक पाठकों के बीच इतनी लोकप्रिय हुई है.
2. मुर्दहिया (आत्मकथा) – तुलसी राम
‘जूठन’ भारत के पश्चिमी उत्तर-प्रदेश की ब्राह्मणवादी, सामंती मानसिकता के उत्पीड़न की अभिव्यक्ति है तो ‘मुर्दहिया’ पूर्वी उत्तर प्रदेश के ग्रामीण अंचल में शिक्षा के लिए जूझते एक दलित की मार्मिक अभिव्यक्ति है.
जहां सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक विसंगतियां क़दम–क़दम पर दलित का रास्ता रोक कर खड़ी हो जाती है और उसके भीतर हीनताबोध पैदा करने के तमाम षड्यंत्र रचती है.
लेकिन एक दलित संघर्ष करते हुए इन तमाम विसंगतियों से अपने आत्मविश्वास के बल पर बाहर आता है और जेएनयू जैसे विश्वविद्यालय में विदेशी भाषा का विद्वान बनता है.
यही इस रचना को एक गंभीर सरोकारों की रचना बनाता है जिसे पाठक और आलोचक स्वीकार करते हैं.
3. पच्चीस चौका डेढ़ सौ (कहानी) – ओम प्रकाश वाल्मीकि
दलित कहानियों में सामाजिक परिवेशगत पीड़ाएं, शोषण के विविध आयाम खुल कर और तर्क संगत रूप से अभिव्यक्त हुए हैं.
ग्रामीण जीवन में अशिक्षित दलित का जो शोषण होता रहा है, वह किसी भी देश और समाज के लिए गहरी शर्मिंदगी का सबब होना चाहिए था.
‘पच्चीस चौका डेढ़ सौ’ कहानी में इसी तरह के शोषण को जब पाठक पढ़ता है, तो वह समाज में व्याप्त शोषण की संस्कृति के प्रति गहरी निराशा से भर उठता है.
ब्याज पर दिए जाने वाले हिसाब में किस तरह एक सम्पन्न व्यक्ति, एक गरीब दलित को ठगता है और एक झूठ को महिमा-मण्डित करता है, वह पाठक की संवेदना को झकजोर कर रख देता है.
4. अपना गाँव (कहानी ) – मोहन दास नैमिशराय
‘अपना गाँव’ मोहनदास नैमिशराय की एक महत्त्वपूर्ण कहानी है जो दलित मुक्ति-संघर्ष आंदोलन की आंतरिक वेदना से पाठकों को रूबरू कराती है.
दलित साहित्य की यह विशिष्ट कहानी है. दलितों में स्वाभिमान और आत्मविश्वास जगाने की भाव भूमि तैयार करती है.
मोहनदास नैमिशराय ने भारतीय संविधान निर्माता डॉक्टर भीमराव अँबेडकर की जीवनी भी लिखी है.
इसीलिए यह विशिष्ट कहानी बन कर पाठकों की संवेदना से दलित समस्या को जोड़ती है.
दलितों के भीतर हज़ारों साल के उत्पीड़न ने जो आक्रोश जगाया है वह इस कहानी में स्वाभाविक रूप से अभिव्यक्त होता है.
भाषा की सहजता इस कहानी को गंभीर सरोकारों से जोड़ने में सफल होती है.
5. ठाकुर का कुआं (कविता ) – ओम प्रकाश वाल्मीकि
भारतीय समाज व्यवस्था ने दलितों के मौलिक अधिकार ही नहीं छीने बल्कि उन्हें निकृष्ट जीवन जीने के लिए भी बाध्य किया और उन पर कड़े कानून भी लागू किए. उनके संपत्ति अर्जित करने कर प्रतिबंध लगाए.
आज भी दलितों के पास अपनी निजी जमीन व अन्य संपत्ति नहीं है जिसे अनदेखा करते हुए अनेक राज्य सरकारें दलितों को स्थायी निवास प्रमाण-पत्र जारी नहीं करती हैं यानी कहने को वे भारत के नागरिक हैं लेकिन राज्य सरकारें ऐसा नहीं मानती हैं.
सैकड़ों साल एक ही स्थान पर रहने के बावजूद वे उस स्थान के निवासी नहीं माने जाते हैं क्योंकि उनके पास संपत्ति के कागजात नहीं हैं.
ठाकुर का कुआं (कविता ) इसी सामाजिक सच्चाई को अभिव्यक्त करती है और दलितों की अंत:पीड़ा को सहज और सरल शब्दों में पाठकों के सामने रखती है.
चूल्हा मिट्टी का /मिट्टी तालाब की /तालाब ठाकुर का ...
6. सुनो ब्राह्मण (कविता ) – मलखान सिंह
मलखान सिंह की ‘सुनो ब्राह्मण’ कविता ने दलित साहित्य में जो प्रतिष्ठा अर्जित की है वह अपने आप में एक उपलब्धि मानी जाएगी.
ये कविता वर्ण-व्यवस्था, ब्राह्मणवादी, सामंती–व्यवस्था पर तीखेपन के साथ हमला करती है.
साथ ही उन तमाम मिथकों, बिम्बों और प्रतीकों को भी चेतावनी देती है जो साहित्य में जड़ जमाए बैठे हैं.
सीधे–सीधे संवादात्मक शैली में यह कविता अपनी पूरी ऊर्जा के साथ दलित चेतना को पाठकों के सामने बेबाकी से प्रस्तुत करती है.
दलित साहित्य की यह एक श्रेष्ठ और महत्त्वपूर्ण रचना है॰
सुनो ब्राह्मण ! हमारी दासता का सफर / तुम्हारे जन्म से शुरू होता है /और इसका अंत भी / तुम्हारे अंत के साथ होगा.
7. नो बार (कहानी) – जयप्रकाश कर्दम
'अछूत' मराठी के दलित साहित्यकार दया पवार की रचना है जिसमें महाराष्ट्र की महार जाति के जीवन संघर्ष का जीवंत चित्रण है.
अखबारों के वैवाहिक विज्ञापनों में अक्सर लिखा होता है– जाति-बंधन नहीं (नो बार).
लेकिन इसमें भी एक छिपा एजेंडा होता है. एक दलित के लिए यह शर्त लागू नहीं यानी दलित स्वीकार्य नहीं.
यह कहानी इसी समस्या को केंद्र में रख कर सामाजिक जीवन में रची बसी जाति वैमनस्य की भावना को अभिव्यक्त करती है.
इस कहानी के प्रस्तुतिकरण से जो प्रभावोत्पादकता पैदा होती है, वह पाठक को छू जाती है. वही इसे एक अच्छी कहानी के रूप में मान्यता दिलाती है.
8. मैं दूंगा माकूल जवाब (कविता) – असंगघोष
असंगघोष की यह कविता दलित साहित्य में अपनी एक खास जगह बना चुकी है.
यह कविता अपनी प्रस्तुति में जितनी सहज और सरल है, बोधगम्यता में उतनी ज्यादा गहन अनुभूतियों को भी अभिव्यक्त करती है.
दलित के भीतर उफनते आक्रोश की यह कविता मानवीय संवेदनाओं को बहुत दूर तक ले जाती है.
दलितों को शिक्षा से दूर रखने के जो षड्यंत्र व्यवस्था के नाम पर रचे गए, यह कविता उनके लिए एक माकूल जवाब है.
इसीलिए यह दलित कविता में अपना एक विशिष्ट स्थान बनाने में सफल हुई है.
समय के साथ /इसका/ मैं दूंगा माकूल जवाब/मेरे जगह/पढ़ेंगे मेरे बच्चे /जरूर !
9. दोहरा अभिशाप (आत्मकथा) – कौशल्या वैसन्त्री
कौशल्या वैसन्त्री की यह आत्मकथा हिन्दी दलित साहित्य की पहली महिला आत्मकथा मानी जाती है.
कौशल्या वैसन्त्री अपने जीवन की एक–एक पर्त को जिस तरह उघाड़ कर पाठकों के सामने रखती हैं वह एक साहस का काम है.
इस आत्मकथा की एक विशिष्टता है उसकी भाषा, जो जीवन की गंभीर और कटू अनुभूतियों को तटस्थता के साथ अभिव्यक्त करती है.
एक दलित स्त्री को दोहरे अभिशाप से गुज़रना पड़ता है- एक उसका स्त्री होना और दूसरा दलित होना.
कौशल्या वैसन्त्री इन दोनों अभिशापों को एक साथ जीती हैं जो उनके अनुभव जगत को एक गहनता प्रदान करते हैं.
10. शिकंजे का दर्द (आत्मकथा ) - सुशीला टाकभौरे
सुशीला टाकभौरे की इस आत्मकथा ने अपने पारिवारिक और सामाजिक संघर्ष को जिस तरह शब्दबद्ध किया है वह इसे दलित साहित्य में एक विशिष्ट स्थान दिलाता है.
एक स्त्री होने की पीड़ा और दलित जीवन की विसंगतियों को अभिव्यक्त करने में एक आत्मकथाकार को सफलता मिली है.
इसीलिए यह दलित साहित्य की एक श्रेष्ठ रचना है.
Musafir Baitha जी की वॉल से।

धम्मपद

गाथा 38-
अन-वट्ठित(अस्थिर) चित्तस्स(चित्त का), सद्धम्मं(सद्धम्म को ) अविजानतो(न जानता) ।
परिप्लव(चंचल) पसादस्स(चित्त की ), पञ्ञा(प्रज्ञा ) न(नहीं) परिपूरति(परिपूर्ण होती है)। ।
अस्थिर चित्त की, जो सद्धम्म को नहीं जानता।
और जिसका चित्त चंचल है, उसकी प्रज्ञा पूर्ण नहीं हो सकती । ।
गाथा- 39
अन-वस्सुत(अन-आश्रव) चित्तस्स(चित्त का), अन्वाहत(अन-आहत) चेतसो(चित्त वाले व्यक्ति का )।
पुञ्ञ पाप हिनस्स(विहीन को), नत्थि जागरातो भयं। ।
आश्रव हिन चित्त का, जिसका मन मल रहित है। ।
जो पुन्य पाप विहीन है, उस जाग्रत पुरुष को भय नहीं है । ।

Monday, May 11, 2020

पालि के विरुद्ध कुचक्र

पालि के विरुद्ध कुचक्र
बड़े दुक्ख की बात है कि एक ओर जहां पालि भाषा उवं साहित्य के प्रचार-प्रसार का प्रयत्न चल रहा है, वही दूसरी ओर वर्ग विशेष के कुछ लोग  एक विशेष प्रकार की भ्रान्ति फैला रहे हैं कि बौद्ध-विद्या के महत्व के समक्ष पालि भाषा एवं साहित्य का महत्व नगण्य है। उनका कहना है कि पालि भाषा में विद्यमान ग्रंथों का ज्ञान तो अंगेजी या अन्य भाषा में सम्पन्न अनुवाद-ग्रंथों से भी किया जा सकता हे। अतः जहां कही पालि भाषा का स्वतंत्र विषय के रूप में पठन-पाठन हो रहा हो वहां उसके स्थान पर 'पालि एवं बौद्ध-विद्या' विषय कर दिया जाए। कितनी भयावह है, यह भ्रान्ति!
यदि किसी भाषा के स्वतंत्र अस्तित्व को नष्ट कर उसमें धर्म एवं दर्शन की घुसपैठ करायी गई तो विश्वविद्यालयों में कोई भाषा स्वतंत्र विषय के रूप में नहीं रह सकेगी। कारण, प्रत्येक भाषा का किसी न किसी धर्म-दर्शन से सम्बन्ध होता ही है। इसके अतिरिक्त यह बात समझ नहीं आती है कि बौद्ध-विद्याा के तथाकथित समर्थक पालि को स्वतंत्रा विषय के रूप में देखकर हैरान क्यों है? सच्चे बौद्ध विद्या प्रेमी को तो इस बात के गौरव का अनुभव करना चाहिए कि बौद्ध-विद्या का प्रतिनिधित्व करने वाली एक मात्रा पालि भाषा के पठन-पाठन की व्यवस्था कर उसे भारत में समुचित सम्मान दिया जा रहा है।
वास्तविकता तो यह कि पालि-साहित्य में वह सब कुछ है जो अन्य भाषाओं के साहित्य में उपलब्ध होता है। इसके अतिरिक्त यह साहित्य बुद्ध, धर्म तथा संघ का सबसे बड़ा परिचायक है। इसका अनुभव तभी किया जा सकता है जब स्वार्थपूर्ण दुराग्रह को त्यागकर निष्पक्ष भाव से उस साहित्य का अध्ययन किया जाए। अकेला ति-पिटक एवं अट्ठकथा-साहित्य ही लगभग तीन महाभारत के बराबर है(डॉ. कोमलचन्द्र जैनः प्राक्कथनः पालि-साहित्य का इतिहास, पृ. 6)। 

Sunday, May 10, 2020

बौद्ध धर्म; एक आर्येतर सांस्कृतिक संघर्ष

बौद्ध धर्म; एक आर्येतर सांस्कृतिक संघर्ष-
पिछले इतिहासकार भारत की आर्येतर जातियों को प्रायः बर्बर ओर असभ्य मानते थे, अतयव यह कल्पना करते थे कि वैदिक तथा परवर्ती भरतीय सभ्यता के अभ्युन्नत तत्व मूलतः आर्यों की देन होंगे। परन्तु अब हरप्पा संस्कृति के पता लगने पर न केवल यह दृष्टि भ्रान्त ठहरति है, प्रत्युत यह प्रतीत होता है कि भारत में आर्यों के आक्रमण को एक सभ्य प्रदेश में बर्बर जाति का प्रवेश समझना चाहिए।
यद्यपि आर्यों ने अपनी पूर्व वर्तिनी आर्येतर सभ्यता को ध्वस्त कर अपनी विशिष्ट भाषा, धर्म ओर समाज को भारत में प्रतिष्ठित किया तथापि यह निर्विवाद है कि सांस्कृतिक विध्वंस निरन्वय विनाश नहीं था और सिन्धु-संस्कृति  के अनेक तत्व परवर्ती आर्य सभ्यता में अंगीकृत हुए।
आर्य तथा आर्येतर सांस्कृतिक परम्पराओं का समन्वय भारतीय समाज के निर्माण की आधार-शिला सिद्ध हुई। इसका प्रभाव एक ओर उत्तर वैदिक कालिन समाज-रचना में स्पष्ट देखा जा सकता है, दूसरी ओर उस बौद्धिक और आध्यात्मिक आन्दोलन में जिसका चरम परिणाम बौद्ध धर्म का अभ्युदय था (डॉ. गोविन्द चन्द्र पाण्डेयः बौद्ध धर्म के विकास का इतिहास, पृ. 1)।