Tuesday, October 17, 2017

हमें, पालि क्यों सीखना चाहिए?

हमें  पालि क्यों सीखना चाहिए?
क्योंकि, पालि बुद्ध की भाषा है। क्योंकि, पालि धम्म की भाषा है।
क्योंकि, पालि हमें एकता के सूत्र में बांधती है। क्योंकि, पालि हमें धम्म का पाठ पढ़ाती है। क्योंकि, पालि हम में धम्म का एहसास है।
पालि, हमें इसलिए सीखना चाहिए-
क्योंकि, पाली ति-पिटक की भाषा है। सारे बौद्ध-ग्रंथ पालि में हैं। पालि जाने बिना ति-पिटक पढ़ा नहीं जा सकता। पढ़े बिना इसमें शोध व चिंतन किया नहीं जा सकता। क्या आज हमारे युवाओं को ति-पिटक ग्रंथों पर शोध नहीं करना चाहिए?
अगर गीता और मानस पर नए-नए शोध प्रबन्ध लिखे जाते हैं तो ति-पिटक ग्रंथों पर शोध-प्रबन्ध क्यों नहीं लिखे जाना चाहिए? शोध-प्रबन्ध लिखने से धम्म के नए-नए आयाम खुलेंगे। हमारे पथ-प्रदर्शक बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर ने पालि सीखकर ही तो ‘बुद्धा एण्ड धम्मा’ लिखा था। पालि पढ़े बिना क्या ऐसा कालजयी ग्रंथ लिखना संभव था? 
क्योंकि, अशोक-काल में पालि लोक-भाषा थी। क्योंकि, अशोक-काल में पालि राष्ट्र-भाषा थी। क्या यह जानने की आवश्यकता नहीं है कि अशोक के समय पालि राष्ट्र-भाषा क्यों थी?
क्योंकि, अशोक बुद्ध की तरह धम्म का प्रचार पालि में चाहते थे। क्योंकि, धम्म ही पालि है। क्योंकि, पालि ही धम्म है। और इसलिए अशोक ने पालि को राष्ट्र-भाषा के रूप में स्वीकार किया।   
क्योंकि, अशोक ने सारे शिला-लेख पालि में हैं। क्योंकि, जब अशोक स्वयं अपने सिला-लेखों में लिखवाता है कि यह ‘धम्म-लिपि’ है तो फिर ‘यह ‘ब्राहमी-लिपि’ क्यों और कैसे हो गई?
बुद्ध-वचनों के अर्थ का अनर्थ ब्राहमण अपने वर्ग-हित के लिए किस प्रकार करते हैं, अशोक अच्छी तरह जानते थे। उसे स्वयं हजारों भिक्खुओं के प्राण-दंड का, अनजाने में भागीदार होना पड़ा था।
क्या बुद्ध की देशना ऐसी हो सकती है कि एक तरफ तो वह ‘आत्मा’ को नकार दे और दूसरी तरफ पुनर्जन्म भी मान ले? इतिहास गवाह है कि इस तरह की दो मुंही बातें ब्राहमण अपने ‘भगवानों’ से कराते रहे हैं।
  अशोक के शिला-लेख में साफ-साफ लिखा है कि यह धम्म-लिपि है। फिर, यह ‘ब्राहमी-लिपि’ कब और कैसे हो गई? क्या हमारे लोगों को यह जानने की आवश्यकता नहीं है? और अगर हमारे लोग, पालि नहीं सीखेंगे तो ऐसा होना ही है।
अशोक के शिला-लेखों को पढ़ते हमें आना चाहिए। हमें पढ़ते इसलिए भी आना चाहिए क्योंकि, इन शिला-लेखों में बुद्ध-वचन हैं। अंग्रेजों ने क्या पढ़ा, अथवा हमें क्या पढ़ाना चाहा, क्या हमें इसकी जांच नहीं करनी चाहिए? और, बिना पाली सीखें यह कैसे संभव है?
धम्म प्रचार का कार्य अशोक पालि में करता है। राजकीय मुद्रा का एक बड़ा भाग वह पालि के प्रचार-प्रसार पर खर्च करता है। क्यों ? 
पालि हमें इसलिए भी सीखनी चाहिए क्योंकि, पालि हमारे संस्कारों  की भाषा है। पालि हमारे आचार और विचारों की भाषा है। हमारे यहां, बच्चे को होश में आते ही उसे जो संस्कार दिए जाते हैं, वे पालि में होते हैं।
क्योंकि, हमारे घरों में, बुद्ध विहारों में बुद्ध-वन्दना पालि में होती है। बोधि-पूजा, चैत्य-पूजा आदि की सारी गाथाएं पालि में हैं। दैनिक सुत्त-पठन पालि में होता है।
अगर हिन्दी, मराठी अथवा अंग्रेजी की तरह पालि भी हम पढ़ना-लिखना सीख लें तो-
1. पालि जानने वालों की संख्या में इजाफा होगा। लोकतंत्र में सारी योजनाएं संख्या के आधार पर होती है।
-सरकार, पालि के विकास पर ध्यान देगी।
-पालि, तीसरी भाषा के रूप में स्कूल-कालेजों में पढ़ायी जा सकेगी।
-पालि में रोजगार के अवसर खुलेंगे।
2. बुद्ध-वन्दना की गाथाएं और सुत्त हम ठीक से समझ पाएंगे।
-हमारी विरासत, ति-पिटक ग्रंथों की ओर लोगों का ध्यान जाएगा।
-इन के अनुवाद और पठन-पाठन पर शोध-परक काम होगा।
-लोग अपनी-अपनी प्रादेशिक भाषाओं में इनका अनुवाद करेंगे।
3. भारत को बौद्धमय बनाने में मदद मिलेगी।
पालि सीखने के लिए क्या करना चाहिए?
अपने घर की दीवार पर लिख लेना चाहिए कि ‘पालि हमें सीखना है’।
@amritlalukey.blogspot.com


बुद्ध-भूमि महाविहार : नागपुर



बुद्ध-भूमि महाविहार
बोद्ध-पसिक्खणं संट्ठानं।

 ता नागपुर नगरे सुपतिट्ठिता।

 भदन्त आनन्द कोसल्यायण तस्सा निमाण-कत्ता।
बहु सामणेर-बालका इध पठन्ति, पाठेन्ति।

-अ. ला. ऊके
भ. बुद्धदत्त पालि पसिक्खण, संवद्धन पतिट्ठान

कथा दुब्बलेन बलेन च

एकस्मिं वने एको सीहो आसि ।
तस्मिं वने पन एको ससो अपि आसि ।
एकं  दिनं सीहो ससम्हा आह- ‘‘अहं तुवं खादामि।’’
ससो वदति- ‘‘सीहो राजा, मा मं खाद।’’
सीहो- ‘‘कथं?’’
ससो- ‘‘महाराज! अस्मिं वने अञञो  सीहो अपि अत्थि। सो मं खादतुं इच्छति।’’
सीहो- ‘‘कुत्थो वसति सो दुग्गतो ?’’
ससो- ‘‘महाराज! सो सन्तिके एकस्मिं उदपाने वसति।’’
सीहो- ‘‘तं दस्सतु  ।’’
ससो- महाराज! मम पिठं-पिठं आगच्छतु  ।’’
‘‘पस्स महाराज!’’ -ससो एकं उदपानं सन्तिके ठितं आह।
‘‘को रे दुग्गतो?’’ -उदपाने अञञो सीहो दिस्वा मिगराजा सींहनादं नदित्वा अगज्जि।
अञञस्स सीहस्स अपि पटिनदित्वा, मिगराजा उदपाने पक्खन्दि।
-अ. ला. ऊके
भ. बुद्धदत्त पालि पसिक्खण, संवद्धन पतिट्ठान
........................................
कुत्थ- कहां। आह- कहा। उदपान- कुआ      सन्तिके-पास के            ठितं- खड़ा हो
अवोच- बोला।           नदति- गर्जना अञञ- अन्य।      पक्खन्दति- कूदना।

दरार

लघुकथाः दरार
तब मैं जीजाजी के साथ रहता था। उस समय उनके परिवार में मेरी बर्ड़ी बहन और बड़ी बिटिया थी। जीजाजी, सरकारी नौकरी में सहायक खाद्य -निरीक्षक थे। तब उनकी पोसि्ंटग बालाघाट थी।
जिसकी किस्मत खुलती है, उसे ही गांव से शहर आने का मौका नसीब होता है। तब, मैं हाई-स्कूल में पढ़ रहा था। पढ़ाई के लिए मुझे बालाघाट मेरी बड़ी बहन लायी थी। जीजाजी की उदारता न होती तो बेशक, मैं उनके यहां टिक न पाता। तब इस परिवार में, जीजाजी का एक छोटा भाई भी रहता था। इसका नाम देवराज था। देवराज मेरे से एकाध साल छोटा होगा। मेरी उससे अच्छी पटती थी।
एक खाद्य-निरीक्षक के अन्डर में जिले की कई राईस-मिलें और खाद्य-दुकानें हुआ करती हैं। निरीक्षण के लिए जीजाजी जब-तब जाते और रात-बरात पीकर घर आते थे। वे या तो बिना भोजन किए चुपचाप सो जाते या बहन से मार-पीट करते।
पीकर आना और घरवाली से मार-पीट करना भारतीय समाज में आम बात है। यह ‘सीन’ कभी-कभी असहनीय भी हो जाता है। इससे निपटने महिलाएं या तो किसी ‘देवी’ का उपवास करती है या घुट-घुट कर जल-मरती है। मेरी बहन सन्तोषी माता का व्रत रखती थी।
ऐसा ही एक ‘व्रत-उद्यापन’ का दिन था। उपवास में सारा दिन चला गया था। शाम को बहन का उपवास खत्म होना था। जीजाजी का कोई पता नहीं था। समय काटने बहन पड़ोसन से, उन्हीं के आंगन में खड़ी हो बतिया रही थी।
रात करीब 10.30 बजे जीजाजी आए। बहन को आभास हो गया था किन्तु, वह बतियाते रही। शायद, अपनी झल्लाहट दूर कर रही थी। इस बीच जीजाजी मुझसे 2.3 बार पूछ चूके थे।
थोड़ी ही देर में बहन आई और किचन में चली गई। वह थाली लगाने लगी। इसी बीच, जीजाजी ने सिर के बाल पकड़ा और बहन को मारना-पीटना शुरू कर किया। वह पूछ रहे थे कि उसने आने में आधा घंटा क्यों लगया?
जीजाजी बूरी तरह पीट रहे थे। मुझे सहन नहीं हुआ। मैं घर के पीछे बाड़ी तरफ चला गया। किन्तु, देवराज, जो वहीं था, ने खड़े हो जीजाजी का हाथ पकड़ लिया। शायद जीजाजी को इस ‘सीन’ की अपेक्षा नहीं थी। हम सब, बिना भोजन किए चुपचाप सो गए।
सबेरे, जीजाजी ने हम दोनों को बुलाया और घर से निकल जाने का आदेश दिया। एकाध साल बाद मैं पुनः जीजाजी के यहां रहने लगा था किन्तु देवराज; उनके रिश्तों में आई दरार फिर कभी भर न सकी।
- अ. ला. उके

Monday, September 11, 2017

बुद्ध सर्वज्ञ नहीं (Buddha rejected that He is omniscient)

बुद्ध के समकालीन जैन तीर्थंकर वर्द्धमान को सर्वज्ञ, सर्वदर्शी कहा जाता था।  इसका प्रभाव पीछे बुद्ध के अनुयायियों पर भी पड़े बिना नहीं रहा । तो भी बुद्ध स्वयं सर्वज्ञता के ख्याल के विरुद्ध थे(राहुल सांकृत्यायन : बौद्ध संस्कृति : पृ 56)।

"सुतं मेतं, भन्ते- समणो गोतमो सब्बञ्ञू् सब्बदस्सावी।"
 ‘‘मैने ऐसा(मे-एतं)  सुना(सुतं) है,  भन्ते! समण गौतम सर्वज्ञ(सब्बञ्ञू् ), सर्वदर्शी(सब्बदस्सावी) हैं।
अपरिसेसं ञाणदस्सनं पटिजानाति।
निखिल(अपरिसेसं ) ज्ञान-दर्शन(ञाणदस्सनं) का दावा करते(पटिजानाति) हैं।
चरतो च मे तिट्ठतो च सुत्तस्स च जागरस्स च सततं समितं ञाणदस्सनं पच्चुपट्ठितं।
चलते(चरतो), खड़े(तिट्ठतो), सोते(सुत्तस्स) जागते(जागरस्स) निरन्तर(सततं) सदा ज्ञान-दर्शन उपस्थित(पच्चुपट्ठितं) रहता है।
कच्चि ते, भन्ते, भगवतो वुत्तवादिनो।
 क्या भन्ते! ऐसा कहने वाले (ते) भगवान के प्रति(भगवतो) यथार्थ कहने वाले हैं?
न च भगवन्तं अभूतेन अब्भाचिक्खन्ति?"
कहीं, वे भगवान की असत्य(अभूतेन) से निन्दा तो नहीं करते?’’- वच्छगोत्त परिब्बाजक ने बुद्ध से पूछा।

"ये ते, वच्छ, एवमाहंसु- समणो गोतमो सब्बञञू .
वत्स! जो कोई(ये ते) मुझे ऐसा कहते (एवं-आहंसु) हैं- समण गोतम सर्वज्ञ हैं;
न मे ते वुत्तवादिनो, वे(ते) मेरे बारे में(मे) यथार्थ कहने वाले(वुत्तवादिनो) नहीं(न) हैं।
अब्भाचिक्खन्ति च पन मं असता अभूतेन।"
वह असत्य से मेरी(मं) निन्दा ही करते(अब्भाचिखन्ति) हैं।’’ -बुद्ध ने कहा(स्रोत- तेविज्जवच्छगोत्त सुत्तः मज्झिम निकाय)। प्रस्तुति- अ. ला. ऊके
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कच्चि - संदेहार्थक अव्यय
अब्भाचिक्खति- दोषारोपण/ निंदा करना (अब्भाक्खाति )