Friday, October 15, 2010

हम और हमारी परम्पराएँ

दैनिक भास्कर जबलपुर (म प्र) १५ अक्टू १० में प्रकाशित एक खबर के अनुसार, नवरात्र अष्टमी के दिन देश की धार्मिक नगरी उज्जैन में दो हजार वर्षों से चली आ रही पुरानी परम्परा के तहत तीन दर्जन से अधिक देवी-देवताओं के मन्दिरों में माता मन्दिर से लेकर भैरव मन्दिर तक २६ कि मी लम्बी शराब की धार से तांत्रिक पूजा की जाती है । महाकालेश्वर मंदिर के समीप स्थित २४ खम्बा माता मन्दिर से शुरू होने वाली यह शासकीय नगर पूजा जिले के कलेक्टर सहित अन्य उंच्च अधिकारीयों द्वारा जनता की सुख-शांति, समृधि, आपसी सद-भाव तथा किसी अनिष्ट, महामारी और प्राकृतिक आपदा के निवारणार्थ की जाती है। ताम्बे के कलश में छिद्र के माध्यम से शराब की धार से २६ की मी की यह नगर पूजा सुबह से रात्रि तक चलती है ।

Monday, October 11, 2010

सामाजिक जिम्मेदारियों से दूर देश के बढ़ते धन कुबेर

एक सर्वे के अनुसार, देश में धन कुबेरों की संख्या में जबर्दस्त इजाफा हो रहा है। मगर दूसरी ओर, एक औसत भारतीय की आज भी सालाना आय रु. ५०००० रु से अधिक नहीं है । अब ऐसे में, नक्सलवादी पैदा नहीं होंगे तो और क्या होगा ? पूँजी को कुछ ही घरों में जमा करने वाली व्यवस्था कहाँ तक जायज हैं ?

Saturday, October 9, 2010

परिवर्तन की विवशता

दलित चेतना के चलते गाँव में परिवर्तन मिशन स्कूल पिछले दो वर्षों से चल रहा था। नया शिक्षहा-सत्र प्रारम्भ होते ही बच्चे अगली कक्ष्हा में प्रवेश ले रहे थे।
'जय भीम गुरूजी।"
"जयभीम।" - शिक्ष्हक ने बच्चे का अभिवादन स्वीकार किया।
"और आनंद, अकेले आये हो ? तुम्हारे पिताजी कहाँ हैं ?" - शिक्ष्हक ने ओपचारिकता वश पूछा।
"जी, दारू पीकर पड़े है।" बच्चे ने सकुचाते हुए जवाब दिया।

Wednesday, October 6, 2010

राम एक आस्था-पुरुष, न की इतिहास पुरुष

दैनिक भास्कर ६ अक्टू जबलपुर के लेख "अयोध्या के आगे" में डॉ वेदप्रताप वैदिक लिखते हैं-
राम कोई इतिहास पुरुष तो थे नहीं । वे इतिहास के आर-पार रहे है। वे आस्था-पुरुष है । स्मृति-पुरुष है, भाव -पुरुष हैं । ऐसी आस्था, ऐसी स्मृति और ऐसा भाव जो करोड़ों लोगों के ह्रदय में सदा-सनातन से, अविरल और अविछिन्न रहा है । यह भाव ऐसा है जो सिर्फ हिन्दुओं में ही नहीं पाया जाता है, मुसलमानों, ईसाईयों ,यहूदियों, काले -गोरों सब में पाया जाता है । यह भाव, तर्क और बुद्धि से परे होता है ।
निश्चित ही राम एक आस्था-पुरुष है , भाव-पुरुष है न की इतिहास-पुरुष जैसे की वैदिकजी लिखते हैं। मगर, दूसरी ओर राम को इतिहास-पुरुष मानने वाले भी कम नहीं हैं ? विश्वविद्यालयों में ढेरों थीसिस मिल जायेंगे, राम को इतिहास-पुरुष सिद्ध करने के लिए। न्यूज़ चेनल वाले भी लोगों के दिल-दिमाग में ठूसते रहते हैं कि राम इतिहास-पुरुष हैं.
दुसरे, राम आस्था-पुरुष हैं । मगर, सिर्फ वैदिकजी जैसे ब्राह्मणों के और पुरे ब्रह्मण वर्ग के। राम, ब्राह्मण वर्ग के आलावा अन्य वर्ग/जातियों के आस्था का विषय नहीं हो सकते। सवाल ये है की राम के क्या आदर्श हैं ? सीता की अग्नि-परिक्षहा लेकर और शम्बूक का वध कर राम कोनसे आदर्श स्थापित करते हैं ? क्या ये आदर्श कम से कम हिन्दू नारियों के लिए आस्था का विषय है ? क्या इन आदर्शों पर इस देश के दलित-आदिवासियों को आस्था है ? राम, वैदिकजी के आस्था-पुरुष हो सकते हैं, उच्च जाति हिन्दुओं के आस्था-पुरुष हो सकते है जिनके लिए मानस में लिखा है- पुजिय विप्र शील गुन हीना, शूद्र न गुन ग्यान प्रवीना'। मगर हिन्दू नारी, जो आज भी अग्नि-परीक्षहा देने को बाध्य हो , राम को आदर्श क्यों माने ? ढोल गवांर शुद्र पशु नारी, सकल ताड़ना के अधिकारी 'मानस' को क्यों माने ? इस देश का आदिवासी, जो आज भी आदिम शैली में जंगलों में रहने अभिशप्त है, कथित रामराज्य को आदर्श क्यों माने ? ऊँच-नीच की घृणा और जातिगत श्रेष्ठता की वकालत करने वाले 'रामराज्य' को दलित क्यों माने ?

Tuesday, October 5, 2010

जुलुशो में हथियारों का प्रदर्शन धार्मिक उन्माद पैदा करता है.

दैनिक भास्कर जबलपुर ५ अग. १० की खबर के अनुसार, हाईकोर्ट के चीफ जस्टिक की अध्क्षता वाली युगलपीठ ने पुलिस से पूछा है कि विगत २ सित. को जन्माष्टमी पर्व पर निकाली गई रैली में कथित रूप से हथियारों का प्रदर्शन किये जाने के मामले पर अब तक क्या करवाई की गई ? तत्सम्बंध में दायर अपील में इसी कोर्ट की एकलपीठ के उस आदेश को चुनौती दी गई है जिसमे इसी मुद्दे पर दायर याचिका पर विगत २२ सित को हस्तछेप करने से इंकार कर दिया गया था।
आये दिनों देखा जाता है की आर एस एस , विश्व हिन्दू परिषद् , बजरंगदल आदि संगठनों द्वारा निकाले गए जुलुशो में हथियारों का प्रदर्शन किया जाता है और पुलिस तमाशाबीन बनी रहती है । इस देश में भाजपा प्रमुख राजनीतिक दल है। कई राज्यों में उसकी सरकारे है। केंद्र में वह रह चुकी है। क्या एक राष्ट्रीय पार्टी को इस पर चितन नहीं करना चाहिए ? निश्चित रूप से जुलुशो में हथियारों का प्रदर्शन धार्मिक उन्माद के साथ जनमानस में भय का वातावरण पैदा करता है। देखे, उक्त अपील पर पुलिस क्या जवाब देती है ।