Thursday, November 24, 2011

बोधिसत्व मंजुश्री महा विहार(Boddhisatv Manjushri Mahavihar)

       कामठी-रामटेक रोड से जब आप रामटेक की ओर जाते हैं तब मनसर का यह मंजुश्री बुद्ध महाविहार आपका ध्यान अनायास आकर्षित करता है

 यह महाविहार लम्बे-चौड़े क्षेत्र में बनाया गया है.बाहर के विस्तृत मैदान में भगवान् बुद्ध की ऊँची-ऊँची कई खड़ी मूर्तियाँ हैं. मूर्तियों के हाथ विभिन्न मुद्राओं में हैं.एक कार्यशाला को देख कर लग रहा था कि बड़ी-सी चट्टान को तराश कर भगवान् बुद्ध की लेती हुई मुद्रा में मूर्ति बनायीं जा रही.
 
    मंजुश्री शब्द का उल्लेख त्रिपिटक में मिलता है.
मंजुश्री को बौद्ध धर्म की महायान शाखा में ध्यानावस्था का प्रतीक माना गया है.प्रज्ञापारमिता सुत्त  में उल्लेख आया है कि मंजुश्री किसी नाग राजा की कन्या थी जिसका समाधि प्रक्रिया पर भगवान बुद्ध से संवाद हुआ था.

स्वामी अछूतानन्द हरिहर(6 May 1869- 20 Jul. 1933)

      स्वामी अछूतानन्द हरिहर, आदि-वंश  आन्दोलन के प्रणेता थे. उन्होंने उ.प्र. में इस सामाजिक-धार्मिक आन्दोलन की स्थापना की थी. उनका असली नाम हीरालाल था. अछुतानंद नाम तो उनके गुरु ने उन्हें प्रदान किया था.
        स्वामी जी जन्म 6 मई 1869 को उ.प्र. के फरुखाबाद जिले के सौरिख नामक छोटे-से गाँव में हुआ था. उनकी माता का नाम राम पियारी और पिता का नाम मोतीराम था. बालक हीरालाल के माता-पिता ने काफी समय पहले से ही सवर्ण हिन्दुओं की जातिगत-घृणा और कलह से तंग आ कर पैत्रिक गाँव छोड़ दिया था. वे जिला मैनपुरी के उमरी गाँव में आ बसे थे. बाद में हीरालाल के पिता जी ने आर्मी ज्वाइन कर लिया था. बालक हीरालाल बचपन से ही तीव्र बुद्धि के थे. उन्होंने 14 वर्ष की उम्र में स्कूल छोड़ दिया था. आपका ब्याह हिराबाई से हुआ था. संतान के नाम पर इनको चार पुत्रियाँ थी.
           शुरू में स्वामी जी ने आर्य समाजियों के साथ थे।   मगर, जल्दी ही हिन्दू आर्य-समाजियों से इनका भ्रम टूट गया. तब स्वामी जी ने जाति-पांति और छुआ-छूत के विरुद्ध स्वत्रंत रूप से आन्दोलन चलाया. उन्होंने गाँव-गाँव भ्रमण कर अपनी बात को लोगों के सामने रखा.
           स्वामी जी सन 1917 में दिल्ली आये. आपने अपने लोगों को जगाने के लिए यहाँ से आदि-हिन्दू नामक हिंदी मासिक पत्रिका का सम्पादन किया था.स्वामी अछुतानंद हरिहर के अनुसार आदि-हिन्दू जातियां अर्थात अनार्य इस भारत-भूमि के मूल निवासी थे.आर्यों जातियों ने यहाँ आकर छल-कपट से उनको दास बनाया और बाद में कई तरह की निर्योग्यताएं उन पर लाद दी. आर्य जातियों का यह षड्यंत्र यहीं तक सीमित नहीं रहा बल्कि, आगे चलकर अनार्य जातियों को पशुओं से भी बदतर जीवन जीने को बाध्य किया.
        स्वामी  अछूतानंद हरिहर ने दिल्ली में अछूत नेता वीररतन दास और जगतराम जाटिया के साथ मिल कर अखिल भारतीय स्तर पर अछूत महासभा का गठन किया. सन 1922 के दरम्यान दिल्ली में ही स्वामी जी ने अछूत जातियों का एक बड़ा सम्मेलन आयोजित कर उस में प्रिंस आफ वेल्स को आमंत्रित किया था. वहां आपने प्रिंस आफ वेल्स को अछूत जातियों के उत्थान से सम्बन्धित 17 बिन्दुओं का मेमोरेंडम दिया था. इस मेमोरेंडम के मांग की गई थी कि आदि-हिन्दू (दलित जातियों) के लिए पृथक चुनाव और प्रतिनिधित्व का प्रावधान हो. इसके साथ ही छुआ-छूत के उच्छेद के लिए कड़े नियम बनाये जाये. इन जातियों के शिक्षित बच्चों को नौकरी और व्यवसाय में प्राथमिकता मिले. बलात-श्रम पर पाबंदी लगे और गाँव के कोटवार इन जातियों के हो आदि आदि।
         सन 1927 में स्वामी जी ने एक पब्लिक मीटिंग में हिन्दू और मुसलमानों की तर्ज पर आदि हिन्दुओं(दलित जातियों) के लिए पृथक स्वत्रंता की मांग की थी. आपने कहा कि दलित जातियां इसकी सही हकदार है. 30 नव. 1930 को स्वामी जी ने सायमन कमीशन से मुलाकात की थी, जिसके सदस्य बाबा साहेब डा. आम्बेडकर थे.
डा. आम्बेडकर ने स्वामी जी को को गुरु माना है।  स्वामीजी को जब मालूम हुआ कि डा. आम्बेडकर, जो अछूत समाज के हैं और देश की दबी-कुचली जातियों के लिए कार्य कर रहे हैं तो उन्होंने डा. आम्बेडकर से मिलने की ठानी. सन 1928 में संपन्न 'आदि हिन्दू' महा सभा के एक अधिवेशन में उनकी पहली मुलाकात हुई थी. बाद में इन दोनों महापुरुषों ने देश के आजादी के साथ-साथ दबी-पिछड़ी जातियों के अधिकारों के लिए, जो उनके शोषकों को सुनाई दे , ऐसी आवाज बुलंद की.
      राउंड टेबल कन्फेरेंश के दौरान स्वामी अछूतानन्द हरिहर ने भारत में अछूतों के सर्व मान्य नेता के तौर पर डा. आम्बेडकर और राव बहादूर श्रीनिवासन को सपोर्ट के लिए देश के कई कोनों से टेलीग्राम कराये थे.यह स्वामी जी का प्रयास था की ब्रिटिश भारत में अछूतों को संसद और विधान सभाओं में प्रथक प्रधिनिधित्व और दलित जातियों वाले अधिसंख्यक सीटों पर दोहरे मत का अधिकार मिला था. किन्तु गाँधी जी के आमरण अनशन ने इन दोनों मांगों की मिटटी-पलीद कर दी. किसी तरह 24 सित. 1932  को पूना पेक्ट हुआ जिसके साक्षी स्वामी जी थे.
       स्वामी अछुतानंद हरिहर ने हिन्दू धर्म की काट के तौर पर 'आदि-हिन्दू धर्म'  इजाद किया था. आदि-हिन्दू धर्म की 7 मान्यताएं थी-1. इस देश के मूल निवासी होने से वे 'आदि-हिन्दू' हैं. आदि-हिन्दू  होने के नाते उनका कर्तव्य है कि वे अपनी इस मात्र- भूमि पर सत्य और न्याय का शासन स्थापित करे.2. आर्यों के आने  के पहले यहाँ के मूल-निवासियों की जो आस्था और मान्यताएं थी, वही उनका 'आदि-धर्म' है. 3. यह कि ईश्वर है और  ईश्वर सर्व शक्तिमान और सच्चा है. ईश्वर अवतार नहीं लेता. 4. सभी मनुष्य बराबर है और वे आपस में भाई-भाई है. वर्ण, जाति और वंश/कुल के आधार पर उन में किसी तरह के उंच-नीच का भेद गलत है. 5.क्रोध,मोह,लोभ और काम वासना से अलिप्त रहना मन का धर्म है. वेश्यागमन,जुआ, हिंसा और मद्य-पान से अलिप्त रहना शरीर का धर्म है.6. संत कबीर का कथन सत्य है कि सब ब्राहमण-ग्रन्थ झूठे, अन्यायी और उनके वर्ग हित को साधने वाले हैं. हिन्दुओं के धर्म-शास्त्र ही उनके अधोगति के कारण है और इसलिए वे ब्राह्मण देवताओं, ईश्वर के अवतारों, ब्रह्मनिक धार्मिक उपदेशों को त्यागने की शपथ लेते हैं.यह भी शपथ लेते हैं कि न तो वे कोई ब्राहमनिक-संस्कार करेंगे और न ही अपने किसी सामाजिक-धार्मिक संस्कार को संपन्न कराने ब्राह्मण पंडित को बुलाएँगे.7. वे अपने पूर्वजों के उच्च चरित्र और आदि-वंश के गर्व भरे इतिहास को प्रचार-प्रसार करेंगे.
      देश की शोषित-पीड़ित जातियों के लोग जो हिन्दुओं से भयाक्रांत थे और जिनके लिए अंग्रेजों से आजादी पाने का कोई अर्थ नहीं था, हिन्दुओं से अपनी आजादी के लिए संघर्षरत थे. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस जो तब, बड़े जोर-शोर से आजादी का आन्दोलन चला रहा था, के कर्ता-धर्ताओं के  सामने स्वामी अछुतानंद हरिहर ने जमीदारी उन्मूलन की मांग रखी थी. स्वामीजी के पत्र के उत्तर में मोतीलाल नेहरू ने लिखा था- पहले आजादी के आन्दोलन में सहयोग करे. जमीदारी उन्मूलन के सम्बन्ध में स्वराज प्राप्त होने पर विचार किया जा सकता है.
        भारत के इस महान सपूत की मृत्यु  20  जुला. 1933 को 54 वर्ष की आयु में कानपूर के पास बेना झाबर में हुई थी. देश के कोने-कोने से आये दबे-कुचले लोगों ने उनकी शव-यात्रा में शरीक हो अपने नायक को नमन किया था.
              

Wednesday, November 23, 2011

अभंग (Abhang)


      महाराष्ट्र के अन्दर वारकरी सम्प्रदाय के संतों ने 13  वी शदी के दौरान समाज में अलख जगाने के जो छंद  क्षेत्रीय भाषा में गाये, उन्हें अभंग के नाम से जाना जाता है.यह एक प्रकार से हिंदी के छंद की तरह है. मोटे और पर छंद के उलट, अभंग में मात्राओं के स्थान पर अक्षरों की संख्या गिनी जाती है.अक्षरों की संख्या का पालन कठोरता से नहीं किया जाता.बल्कि,यों कहना सही होगा कि उच्चारण की सुविधानुसार अक्षरों की संख्या कम-ज्यादा हो सकती है.
       अभंग दो प्रकार के होते हैं-चार चरणों के और दो चरणों के.चार चरणों वाले अभंग की प्रथम तीन चरणों में 6-6 अक्षर होते हैं जबकि अंतिम चरण में चार अक्षर. इसके साथ ही दूसरे और तीसरे चरणों में यमक का पुट होता है.रही बात चौथा चरण की तो वह अभंग को पूर्णता प्रदान करता है-             
                                  काय करूँ आता , धरुनिया भीड़
                                  नि:शंक हे तोंड, वाजविले ।।
                                  नव्हे जगी कोणी,मुक्तियांचा जाण
                                  सार्थक लाजुण, नव्हे हित ।।

  दो चरणों वाले अभंग के प्रत्येक चरण में 8-8 अक्षर होते हैं और अंत में यमक होता है-
                 जे का रंजले गांजले । त्यासी म्हणे जो आपुले।।
 .....................................................................................................................              

वाचे चा रसाळ अंतरी निर्मळ  ।  त्याचा गळा माळ, असो-नसो ।। 
आत्म अनुभव,चोखडळया वारा ।  त्याचा माथा ज़रा,असो-नसो ।।
पर-स्त्रीच्या ठायी,जो का नपुसंक ।  त्याचा अंगा राख, असो-नसो ।।
पर द्रव्या-सी अंधा,निन्देसी तो मुका । तोच संत देखा,तुका म्हणे ।।
  
जे का रंजले गांजले, त्यासी म्हणावी आपुले ।।  तोचि साधू ओड्खावा,देव तेथेचि पहावा ।।
म्रदु स्वभाव नवनित,तैसे सज्ज्नाचे चित ।।  त्यासी अश्रुगिता नाही,ज्यासी घरी जो ह्रदयी ।।
दया करने पुत्रासी,तोचि दास आणि दासी ।।  तुका म्हणे सांगू किती, तोचि भगवंता चि मूर्ति ।।

मुक्त होता परि, बड़े झाला बध्द  ।  घेवुनिया छंद, माझे-माझे
शुक न ही केशी,गोवियले पाय ।   विसरोनि जाय,पक्ष दोन्हीं ।।
पाप पुण्य अंगी,घेतले जळुन ।  वर्म नेने कौन,करीता तो ।।
तुका म्हणे वाया, गेले वाया विन ।  मृग पावे शिण, मृग जळ ।।

सदा असावे, संसारी । लक्ष लावावे परब्रम्ही ।।
संसारा चा धंधा, सर्व ही करवा।  निज ध्यास व्हावा, भगवंताचा ।।
तुका म्हणे संती, विवेक कारावा । राग न धरावा, बोलण्याचा ।।

संत पावले सागरी ।  गंगा आली आम्हा वरी ।।
जेथे उळे रज धूळ ।  तेथे करावे आंघोळ ।।
सेतू बंध वाराणसी । सर्व तीर्थ पायापासी ।।
तुका म्हणे धन्य झालो । संत पावली मिळालो ।।

रूप पाहता लोचनी । सुख झाले हो साजनी ।।
तोहा विठ्ठल बरवा । तोहा माधव बरवा ।।
बहुत सुक्रता ची जोडी।  म्हणोनी विठ्ठल आवळी ।।
सर्व सुखाचे सागर।  बाप रुख्मा देविवर ।।

मोक्ष पद तुच्छ केली या कारणे ।  आम्हा जन्म घेणे,युगा युगी ।।

नर नारी बाळ,अवघे नारायण ।  ऐसे माझे मन, करि देवा ।।
नारायण मूर्ती न कळे जयासी  । तया गर्भवासी, येणे जाने ।।

अवघा चा संसार, सुखाचा करिन ।  आनंद भरीन,तिन्ही लोका ।।
जाईन गे माय, तया पंढरपुरा  । भेटीन  माहेरा, आपुलिया ।।

सर्व सुक्रताचे फळ, मी लावीन ।  क्षेमम्या देईन, पांडूरंगी ।।
बाप रुख्म्या वरु, विठ्ठलाचे भेटी । आपुलिया स्वसाठी, करुनी ठ्ठेला ।।

साधू बोध झाला,नुरोनिया ठ्ठेला  । ठ्ठायीच मुराला, अनुभव ।।
कापुराच्या वाती उजडल्या ज्योति।   ठ्ठायीच समाप्ति, झाली जैसी ।।
मोक्ष रेखा आल्या, भाग्येविन टला । साधूचा अंकिला,हरि भक्त ।।
ज्ञानदेव गोडी संगति सज्जनी ।  हरि दिसे जनीवनी,  आत्मरूप ।।

शेवटची पाळी, तेव्हा मानुष जन्म । चुकलिया वर्म, फेरा पडे ।।
एक जन्म ओळखी, करा आत्माराम।  संसार सुगम, भोगू नका ।।
संसारी असावे, असुनी नसावे।  कीर्तन करावे, वेळो वेळा ।।
नामा म्हणे विठ्हो, भक्तचिया द्वारी । घेवूनिया करि, सुदर्शन ।।

तुर्येची परिपक्वता, हेच उन्मुनी अवस्था । निम्बोलीयास मधुरता,जैसी पक्व दशे ।।
तुर्या ते शुध्द वासना,तेथेहाची कळवत पना ।  उन्मुनी बुझूनि निर्वासना,म्हणुनी गोळ ते ।।
जैसी साखर उदकी विरे,परि तेथेची मधुरता उरे । तैसी तुर्या स्वरूपी मुरे,ते उन्मुनी गा ।।

प्रणवाची अर्ध्द मात्रा, ते तुर्या जान गा मैत्रा । तयाचे स्थान पवित्रा,ब्रम्हरंध्र* ।।        मन 
ब्रम्हरंध्रा ठ्ठायी मन झाले लीन,केले अमृत पान, सतरावी चे

आम्ही गुरु बोध चे भिखारी,आमची बस्ती ब्रम्हपुरी
बोझे वाहिले स्थुलाचे,गमन केले सूक्ष्माचे
कारण मारगी लागलो ,महाकारणा सी गेलो 
तेथे बसे तुर्या रानी,जाणताती संत मुनि
परा तुर्या घरा पुढे , निज स्वरूपाचि दृष्टी उघडे
चोखा म्हणे हेचि सार,जाने तोचि परमेश्वर

तरुवर बीजा पोटी,बीज तरुवरा शेवटी।  तैसे तुम्हा-आम्हा झाले,एकाएकी समावले ।।
उदका वरी तरंग,तरंग उदकाचे अंग ।  तुका म्हणे बिंब छाया,ठ्ठायी पावली विलया ।।

नेनु ग माय, कैसा हा योगी। जो ठ्ठायी जन्मिला तोच ठ्ठायी भोगी ।।
माय कुवारी बाप ब्रम्हचारी।  एकवीस पुत्र जिच्या उदरी ।।
पित्याचा अंश घेऊन आला।   मातेसी त्याने उपभोग केला ।।
आचार सोळूनी झाला तो भ्रष्ट । मावशी संगे लावला पाट ।।
आणिक एक सांगून काई । बहिण भोगली एक पराई ।।
ज्ञानदेव म्हणे अनुभव जाने । अनुभवा विन काहींच नेने ।।

क्षणो क्षणी हाच करावा विचार। तरा वया पार भव सिंधु ।।
नाशीवंत देह जाना हा सकळ । आयुष्य खातो काळ सावधान ।।
संत समागमी धरावे आवळी । करावी तातळी परमार्थाची ।।
तुका म्हणे इही लोकाच्या व्यवहारे।  नका डोळे घुरे भरुनि राहो ।।

अमोलिक रत्न संपाळले तुझ । का रे ब्रम्ह बीज न ओळखसी ।।
न जळे न बुळे न भेव चोरा । ते वस्तू चतुरा सेवो सुख ।।
ज्ञानदेव म्हणे अविनाशी जोळले । आणूनि ठ्ठेवले गुरुमुखी ।।

 सद्गुरू सारखा असता पाठ्ठी राखा । इतराची लेखा कौन करि ।।
राजयाची कांता काय भीख मांगे।  मनाचिया योगे सर्व सिद्धी ।।
कल्प तरु वटी जो  कोणी बसला । काय ऊने त्याला सांगा जो जो ।।
ज्ञानदेव म्हणे तरलो तरलो । आता उद्धरलो गुरु कृपे ।।

सद्गुरू वाचुनी त्राता त्रिभुवनी।  दिन उध्दरणी दुजा नाही ।।
अनंत जन्मीचा शीण उतरला । सद्गुरू भेटला सदानंद ।।
देऊनिया हाती नीज बोध रत्न । तोडीला प्रयत्न संसाराचा ।।
तुका म्हणे गुरु उपकारासी । ......................................।।

हेच दान देगा देवा । मुखी साखरी चा रवा ।।
गुण गाईन आवळी । हेच माझी सर्व जोळी ।।
न लागे धन संपदा । साधू संग देई सदा ।।
तुका म्हणे गर्भ वासी।  सुखे घालावी आम्हासी ।।

संत चरण रज,लागता सहज-  वासने चे बीज जळुनी जाये ।।
मग राम नाम उपजे आवळी- सुख घळो न घळी,वाळू लागे ।।
कंठ्ठी प्रेम डाटे, नयनी नीर लोटे-  हृदयी प्रगटे राम रूप ।।
तुका म्हणे साधन सुलभ गोमट- तरीच उपतिष्टे पूर्वपुण्ये ।।

पापा ची वासना, नको दाउं डोळा- त्याहुनी आँधळा, बराच मी ।।
निंदे चे श्रवण, नको माझे कानी- बधीर करुनी, करि देवा ।।
अपवित्र वाणी, नको माझ्या मुखा- त्याहुनी मुका, बराच मी ।।
नको मज कधी,परस्त्री संगति- जना तुनी माती, उठ्ठ्ता भली ।।
तुका म्हणे मज, अवघ्याचा कंटाळा- तू एल गोपाळा, आवडसी ।।

पापा ची संचिती, देहा सी दंडण- तुझ नारायण, बोल नाही ।
पेरी कडू जिरे, मागे अमृत फळे- अर्क वृक्ष केळे,कैसी येती ।
सुख अथवा दुख, भोग हे देहा चा- नाश हा ज्ञानाचा, न करावा ।
तुका म्हणे आंता, देवाची रुसावे- मनासि पुसावे, काय केले ।

भक्ती चे हे वर्म, जयाचिया हाती,तया घरा शान्ति, क्षमा दया ।
अष्ट महासिद्धी, ओळखती द्वारी,नवजती दूरि, जवळी त्याचा ।
तेथे दुष्ट गुण, न मिळे नि:शेष,चैतनाचा वास, जया माझी ।
संतुष्ट हे चित, सदा सर्व काळ,तुटली हळ हळ, त्रिगुणाची ।
तुका म्हणे येथे, काय तो संदेह,आमचे गौरव, आम्ही कंत ।

भक्त ऐसे जाना, जे देही उदास- गेले आस पास, निवारुनि ।
विषय तो त्याचा, झाला नारायण- ना वळे जन धन, माता पिता ।
निर्वाणी गोविंद, असे मागे पुढे- काहीच साकडे, पडो नेदी ।
तुका म्हणे सत्य, कर्म व्हावे साह्य- घातलिया भय, नरकी जान ।

पिकलिया सेंदे, कळू पण गेले-  तैसे आम्हा केले पांडुरंग ।
काम क्रोध लोभ, मुरले ठ्ठायीच-  सर्व आनंदा ची स्रष्टी झाली ।
आठ्ठव नाठव, गेले भावा भाव-  झाला स्वयेंव,  पांडुरंग ।
तुका म्हणे भाग्य या नावे म्हणिजे- संसारी जन्मिजे याचि लागी ।

करुनी आरती - आता ओवाळू श्रीपती
आज पुरले नवस - धान्य काळ हा दिवस
पाहा पाहा हो सकळा- पुण्यवंत तुम्ही बाळा
तुका म्हणे टाळी- होता सन्निध जवळी

आसनी बसुनी, खेचरी साधती- लाल टीखे दिसती, ब्रम्ह नव्हे
दृष्टी लावूनी, नासाग्री तो पाहे- नामी रुपी राहे, ब्रम्ह नव्हे
डोळे लावूनिया, चक्षु चालविती- चिन्मय झळकती, ब्रम्ह नव्हे
मुक्ता बाई म्हणे, ब्रम्ह पाहे डोळा- गुरु-पुत्र विरला, जानतसे

उजळले भाग्य आता - अवघी चिंता वारयली
संत दर्शने चा लाभ - पद्मनाभ जोळ्येला
संपुष्ट हृदय पोटी - करुनिया पोटी साठःविला
तुका म्हणे होता ठ्ठेवा - तोया जिवा सान्पळला

संचित तैसी बुद्धी,उपजे मना मधी - सांगितली सिद्धी, नव जाय
ज्याचा जैसा ठ्ठेवा,तो त्यासी धावे- न लागसी करावे, उपदेश
घेऊन उठती, आपुलाले गुण - भविष्य प्रमाण, तुका म्हणे

पंच भूताचीया,सान्पळलो संदि - घातलो से बंदी अहंकारे
आपला आपण, बान्धविला गळा - नेणेची निराळा, असता हि
कासया हा सत्य, मानिला संसारा - कांहे केले चार, माझे माझे
कोना हि शरण, गेलो नारायण - कोना हि वासना, आवरती
किंचित सुखा चा, धरिला अभिलाष - तेणे काळ नाश, बहु पुढे
तुका म्हणे आता,देह देवू बळी - करुनी सांडू होळी , संचिता ची

क्षमा शास्त्र जया नरा चिया हाती - दुष्ट तया प्रती काय करी
तृण नाही तेथे, पडिला दावाग्नी - जाय तो विझोनी आपोआप
तुका म्हणे क्षमा सर्वाचे हित - धरा अखंडित सुख रूप

सद्गुरू नामका पूर्ण कृपा केली - नीज वस्तू दाखवली माझी मज
माझे सुख मज दाखवले डोळा - दिली प्रेम काळा ज्ञान मुद्रा
तया उतराई होऊ कोन्या गुने - ....................................

जौवरी त्रिपदा सोधना पडे-अर्धे मात्रे परते न सापळे
क्षरा-अक्षरी निवाळा न घडे- उत्तम पुरुषी समरसे      मुकुंद मुनि (परमामृत)

तू एक मी एक,हा न तुटे कलंक
जौवरि न होय सम-एक,तवरि परम प्राप्ति कैसे घडे

इहलोकि चा हा देह,देव इच्छिताती पाहे
धन्य आम्ही जन्म आलो,दास विठ्ठोबा चे झालो
आयुष्या चे साधने, सच्चिदानंद  पदवी घेणे
तुका म्हणे पावटणी , करू स्वर्गाचि निशानी

चित्त शुध्द करि,शत्रु मित्र होती - व्याघ्रदिक न खाती, सर्प तया
विष ते अमृत , आघात तो हित - अकर्तव्य नित होत त्यासी
दुख: ते देईल सर्व सुख काळ  - होतील शीतल,अग्नी ज्वाला
तुका म्हणे कृपा केली नारायण - जानि येत येणे, अनुभव

रात्र दिवस आम्हा,युद्धाचा प्रसंग - अंतर बाह्य जग आणि मन
जिवाहि आगीज पडती आघात - घेवूनीया नित्य-नित्य करि
तुका म्हणे तुझ्या नामाचिया बळे - अवघियाचे काळे, केले तोंड

देह चि विटाळ म्हणती सकळ,आत्मा तो निर्मळ, शुध्द बुध्द
चोखा म्हणे माझा संदेह मिटला,देहीच भेटला,देव आम्हा

नर देहाचे उचित,काही करावे आत्महित
यथानुश्क्यता चीतवीत - सर्वोत्मासी लावावे

माझ्या हे मी पणावर, पडो हे पासान - जळो हे भीषण, माझेपन

आयेका ज्ञानाचे लक्षण, ज्ञान म्हणजे आत्म ज्ञान
पाहावा आपणा सी आपण, या नावे ज्ञान

जड शोधोनिया चैतन्य काढिले,जड काय झाले सांगा मज
दुधा तुनि तूप वेगळे काढिले,दुध काय झाले सांगा मज
गारी तुनि पाणी वेगळे काढिले,गार काय झाले सांगा मज
दागीतुनि सोने वेगळे काढिले,दागि काय झाले सांगा मज
तुका म्हणे आहे स्वयंभू  उभा - चैतन्यचा गाभा सिद्ध असो

चहु देही चा खेळ,तोच सद्गुरू चा बाळ
चक्रव्यूह चे उगवणे,आंत जाउन बाहेर येने
गुरुकृपे चे अंजन,तोच आत्म-खून जान
'भागा' सद्गुरू शरण,त्याने केले समाधान

देह हाडका चा केला, रक्त मांसाने लीपिला
मृत्यू आणि वृध्द पण, तैसे मत्सर अभिमान
सर्वे वैरी हे आपुले,देह लपोनी बसले
देह आसक्ती धरू नका,सान्गे तथागत लोका


Tuesday, November 22, 2011

घनश्याम वासनिक (Ghanshyam Wasnik)

         हमारे आस-खास कुछ खास लोग भी हो सकते हैं.पर चूँकि,वे हमारे आस-पास होते हैं अत: हमारे लिए वे खास नहीं होते.वे हमारे बाबा/दादा हो सकते हैं या फिर, गाँव के रिश्ते में काका.हमें उन के बार में पता होता है, उनके जीवन और संघर्ष के चर्चे हम सुने होते हैं. मगर, चूँकि वे हमारे आस-पास होते हैं,शायद इसी वजह की वे हमारे लिए कोई खास मायने नहीं रखते.म.प्र. के एक छोटे-से गाँव नांदी(कटंगी) के घनश्याम वासनिक मुझे कुछ ऐसा ही नाम लगा.
       पिछले दिनों  मार्च 11  में मेरा जाना बालाघाट हुआ था.रिटायर्मेंट के बाद दिन इत्मिनान के होते हैं. छुट्टियों का बहाना नहीं होता और सबसे बड़ी बात, आप बड़े सुकून में होते हैं,फुर्सत में होते हैं.आप अपने मन पसंद काम अब ढंग से कर सकते हैं.किसी बात की जल्दी नहीं होती.
      इस बार मैंने नांदी के घनश्याम वासनिक जी से मिलने का प्लान बनाया.वह 22 मार्च का दिन था.हम कार से सीधे उनके घर पहुंचे.दोपहर के करीब 2 बज रहे होंगे.आव-भगत के बाद मैंने उनसे  इंटरव्यू लेने की इजाजत ले ली.साहेब जी ने सहज ही हाँ कर दी.यहाँ मैं बता दूं कि मेरे साथ एक और सज्जन थे-येरवाघाट के खिनारम जी बोरकर. साहेब जी भी सामाजिक सरोकार के क्षेत्र में एक जबर्दस्त व्यक्तित्व है. इसकी चर्चा हम फिर कभी अन्यत्र  करेंगे.
        घनश्याम वासनिक जी करीब 85 वर्ष के हैं..शरीर अभी काफी तंदुरस्त है.हल्के श्याम वर्ण के ऊँची-पूरी कद-काठी.चेहरे पर आज भी कुछ कर गुजर जाने की दृढ़ता और आँखों में वक्त को पकड़ने की मजबूती. मैंने हमेशा उन्हें सफेद धवल वस्त्रों में देखा है.छुटपन से ही मैं उनके व्यक्तित्व से बड़ा प्रभावित था.
        हमारे गुरु जी बालकदास साहेब से उनके पारिवारिक सम्बन्ध थे.गुरु जी के कार्यक्रम के सिलसिले में उनका आना हमारे यहाँ होते रहता था.और जब सत्संग चलती तो रात-रात भर मैं उनकी चर्चा सुनता. बाद के दिनों में,  मैं  उनकी चर्चा में शरीक होने लगा था.मुझे ज्ञान-ध्यान की बातों में बड़ी दिल-चस्पी रहती थी.पारिवारिक दूसरे कार्यों से मैं शुरू से ही अलग था. पिता जी मेरी फितरत समझते थे और इसलिए वे मुझे अन्य कार्यों में होने की अपेक्षा नहीं रखते थे.पढ़ना और सत्संग, ये मेरा शौक था.ये मेरी हाबी थी, ये मेरा जूनून था.यह शौक आज भी बदस्तूर जारी है. हाँ, अब कागज-पेन की जगह लेपटाप आ गया है.
        बहारहाल,हम बात घनश्याम वासनिक जी की कर रहे थे.हमारे इधर अर्थात बालाघाट-भंडारा जिले में जहाँ  कहीं बड़ी चर्चा हो, सत्संग हो या शादी-ब्याह का मौका हो, लोग घनश्याम वासनिक जी को याद करते हैं.उन्हें लेने के लिए आदमी दौड़ाते हैं.उनके आने से कार्यक्रम का जैसे लेवल बढ़ जाता है .यह आज भी जारी है. यद्यपि अब वे ज्यादा चल-फिर नहीं सकते हैं.
      एक और खास बात- उनकी गायन की दक्षता का कोई मेल नहीं है.हजारों लोगों के बीच सामाजिक चेतना के भजन/गीत गाना मायने रखता है, खास कर हिन्दू भारत में.सवर्ण पटेल और साहूकारों के गाँवों में ढीढी निकालना, मंच पर सामाजिक चेतना के गीत गाना हिम्मत और अक्ल का काम है.आप घर में और अपने लोगों  के बीच जो चाहे बोल सकते हैं. मगर,सवर्ण हिन्दुओं के कार्यक्रमों में उनके स्टेज पर उनके देवी-देवता और धार्मिक-कर्मकांडों की पोल खोलना अलग बात है. यह माद्दा पैदा होने के लिए शेरनी का दूध पीना होता है.घनश्याम वासनिक जी ने बेशक, शेरनी का दूध पीया था.आप शेर की दबंगता और निडरता उनके चेहरे पर देख सकते हैं.
         हमारे गुरु बालकदास साहेब, घनश्याम जी को बराबरी का सम्मान देते थे. यद्यपि, वे उम्र में बड़े थे.गुरु जी, कबीर पंथी थे.वे कटंगी के महंत ज्ञानदास साहेब की गद्दी के महंत थे.ज्ञानदास साहेब अपने समय में कबीर विचारधारा के भारी विद्वान् थे.दूसरी तरफ, घनश्याम वासनिक जी बौद्ध धर्म के प्रकांड विद्वान् थे.वे बाबा साहेब के परम अनुयायी थे.उन्होंने बाबा साहेब को देखा था.वास्तव में,गुरु जी और घनश्याम वासनिक जी के बीच गुरु-शिष्य का सम्बन्ध था.

Monday, November 21, 2011

बुद्ध भूमि महाविहार नागपुर(Budhd Bhoomi Mahavihar)

 पिछले दिनों मार्च 2011  में जब हम लोग नागपुर गए थे तो बुद्ध भूमि महाविहार भी गए थे. यह विहार नागपुर के आउटर में कामठी रोड पर स्थित है. यह डा. भदंत आनंद कौशल्यायन के द्वारा संचालित किया जा रहा था. मगर अब  उनके महा परिनिर्वाण के बाद भी यह उसी तरह संचालित किया जा रहा है, जैसे कि उनके जीवित अवस्था में संचालित किया जा रहा था. हमें वहां छोटे-छोटे चीवरधारी बच्चें अध्ययनरत  मिले.भंते जी का सपना था कि भारत को बौद्धमय बनाना है, जैसे की बाबा साहेब डा. आम्बेडकर की सोच थी, तो कुछ बच्चों को शुरू से ही इस पुनित कार्य में लगाना होगा.बच्चें विहार में रहे. बुद्ध विहार की मेनेजमेंट कमेटी  उनके रहने और खाने-पीने का बंदोबस्त करे.
       बच्चों को शुरू से ही संस्कारित करना उस नींव की तरह है, जो मजबूती के साथ खड़ी रहती है.धम्म प्रचार का यह ठोस उपाय है- भंते जी की सोच थी. धम्म के कार्य में रूचि रखने वाले साधारण गृहस्थ भी चीवर धारण करते हैं.मगर, बच्चें जो शुरू से ही धम्म-कार्य में संस्कारित होते हैं, वे अंत तक पूरे  मनोयोग से यह कार्य करते हैं.
      हम चीवर धारी बच्चों से इंटरेक्ट हुए. वे काफी प्रसन्न लग रहे थे. मुझे लगा कि उनकी सुख-सुविधा का ठीक ध्यान रखा जा रहा है. विहार के कई कमरों में बच्चों के आवास और खान-पान की व्यवस्था की जाती है.विहार परिसर के ही लम्बे-चौड़े प्रागण में दीक्षा-भूमि की शैली में भव्य स्तूप-नुमा कन्स्ट्रशन किया जा रहा है.मुख्य सडक मार्ग पर ही बड़ी-सी गेट है. जिससे आप बुद्ध भूमि महा विहार परिसर में प्रवेश करते हैं. कन्स्ट्रशन वर्क्स को देखने से लगता है की कार्य लम्बे समय से पेंडिंग है.
        मैंने देखा है की बुद्ध विहार के निर्माण कार्यों में पैसे की कमी एक बड़ा मसला है.हम देखते हैं की बाबा साहब के अनुयायियों की, ज्यादा से ज्यादा यह दूसरी पीढ़ी है. ये ठीक है की कुछ लोग नौकरी में आ गए हैं.मगर अभी भी करीब 70 % लोग कम-या ज्यादा उसी स्थिति में है जिन्हें रोजी-रोटी के लाले हैं. अब बेचारे वे बुद्ध विहार बनाने में कैसे मदद करे ? हिन्दू उन्हें मदद करते नहीं है जबकि 100%  दलित समाज के लोग, हिन्दू मन्दिर बनाने में मदद करते हैं-तन से, मन से और धन से.