Wednesday, September 11, 2019

बाबासाहेब अम्बेडकरो

बाबासाहेब अम्बेडकरो

बाबासाहेब अम्बेडकरस्स सम्पुण्ण-नामं किं ?
बाबासाहेब अम्बेडकरस्स सम्पूण्ण-नामं भिमरावो रामजी अम्बेडकरो।

बाबासाहेब अम्बेडकरो कस्मिं ठाने जातो?
बाबासाहेब अम्बेडकरो मज्झपदेसस्स महू गामे जातो?

बाबासाहेब अम्बेडकरो कस्मिं दिनंकं जातो?
भिमरावो अट्ठारससत एकनवुतिमे वस्से एप्पिल मासस्स
चतुद्दसमे दिने जातो।

बाबासाहब अम्बेडकरस्स बालपने नाम किं ?
बाबासाहब अम्बेडकरस्स बालपने नाम भिमरावो ?

भीमराववस्स पितुस्स नाम किं?
भीमरावस्स पितुस्स नाम आवुस रामजी सकपालो।

तस्स मातुया नाम किं ?
तस्स मातुया नाम अवुसा भीमाताई ।

भीमाय पितु को?
भीमाय पितु सूबेदार मेजर मुरवाड़करो।

को बालक भीमरावस्स अय्यको/पितामहो ?
हवालदार मालोजी सकपालो तस्स अय्यको/पितामहो।

बालक भीमरावस्स पितु रामजी सकपालो केन पदेन सुसोभितो?
बालक भीमरावस्स पितु रामजी सकपालो सेना व्यूहे सूबेदार पदेन सुसोभितो?

बालक भीमरावस्स पितुच्छा नाम किं ?
भीमरावस्स पितुच्छा(बुआ) नाम आवुसा मीराताई।

सूबेदार रामजी सकपालो कस्मिं विज्झालये अज्झापेति ?
सूबेदार रामजी सकपालो एकस्मिं आंग्ल सेनिक विज्झालये अज्झापेति?

अज्झापको सूबेदार रामजी सकपालो कस्मिं विसये पारंगतो आसि,
अपि च केन-केन विसये अज्झापेतुं सक्कोति ?

अज्झापको सूबेदार  रामजी सकपालो मराठी विसये पारंगतो आसि
अपि च आंग्ल भासा अज्झापेतुं सक्कोति।

सूबेदार रामजी सकपालस्स घरे कस्स मानितं पूजितं आसि? 
रामजी सकपालस्स परिवारो कबीरपंथी आसि।

आवुस बलरामो को आसि?
आवुस बलरामो बालक भीमरावस्स जेट्ठ भाता आसि।

आवुस आनन्दरावो को?
आवुस आनन्दरावो अपि च बालक भीमरावस्स जेट्ठ भाता?

किं बालक भीमरावस्स भगिनी एव अत्थि वा  ?
आम! मंजुला च तुलसी नामेन बालक भीमरावस्स द्वे जेटठा भगिनियो सन्ति।

बालक भीमरावो सूबेदार रामजी सकपालस्स कतमे सन्तानो अत्थि ?
आम! बालक भीमरावो सूबेदार रामजी सकपालस्स चतुद्दसमे सन्तानो अत्थि?

बालक भीमरावो आरभे कस्मिं विज्झालये पवेसं पाविसि?
सतारा ठितं सासकीय महाविज्झालये बालक भीमरावो आरभे पवेसं पाविसि?

तेन समये तस्स नाम किं लिखितं आसि?
पवेसं समये तस्स नाम ‘भीवा रामजी अम्बावडेकरो’ लिखितं आसि।

अम्बावडेकरो अत्थं किं ?
अम्बावडेकरो बालक भीमरावस्स पेतक-गामं नाम आसि।
अनुक्कमेन....

माता पूजनीया

माता वन्दनीया
Image may contain: 2 peopleमाता पूजनीया, माता वंदनीया। ता जननीया । ता पठविया, ता धरणीया। माता पुत्त/पुत्ती जनेति, पालेति पोसेति। यदा-कदा रोसेति, ताळेति, कटु वचनं भासेति, अथ ते पुत्त, पुत्ती हिताय सुखाय च। सन्तान हिताय, माता अनेका दुक्खा सहति। यं किंचि पुत्त/पुत्ती पत्थेति, तं सब्ब देति। पुत्त/पुत्तिया अपि मातुया रक्खणं करणीयं। यथोचित आदरभावो पालनीयं। ता सब्बत्था पूजनीया। ता सब्बत्था वन्दनीया। माता यथा नियं पुत्तं, आयुसा एक पुत्त अनुरक्खे. एवं अपि सब्ब भूतेसु, मानसं भावये अपरिणामं.

Monday, September 9, 2019

भीमस्तुति

उस दिन,  भंते जी बता रहे दे रहे थे-
बुद्ध विहारों में  'भीम स्तुति' का संगायन नहीं करना चाहिए।  फिर, स्वयं ही बताने लगे कि बुद्ध विहार ध्यान का केंद्र है और बाबासाहब अम्बेडकर एक राजनीतिक पुरुष हैं और इसलिए,  बुद्ध विहार में बाबासाहब अम्बेडकर की स्तुति उचित नहीं है !  'दिव्य प्रभ रत्न तू, साधु वरदान तू'  भीम गाथा में कई शब्द ऐसे हैं, जो भगवान बुद्ध के धर्म की मर्यादा के अनुकूल नहीं है !

अगले रविवार को जब मैं बुद्ध विहार गया तो देख कर आश्चर्यचकित रह गया कि साप्ताहिक बुद्ध वंदना के संगायन में भीम-स्तुति नहीं थी। मैंने जानना चाहा तो बुद्ध विहार समिति पदाधिकारियों ने भंतेजी तरफ संकेत किया। मैंने भंतेजी से पूछा कि बाबासाहब के प्रति उनकी यह सोच का आधार क्या है ? इस पर  भंते जी ने कहा कि उन्होंने अपने विचार रखे थे।

बेशक, बुद्ध हमारे आदर्श हैं, मार्गदाता हैं किन्तु वे हमारे मुक्तिदाता नहीं है। हमारे मुक्तिदाता बाबासाहब अम्बेडकर है। अगर बाबासाहब अम्बेडकर न होते तो हम, जो आज हैं,  न होते। हम आज भी सारे मानवीय अधिकारों से वंचित होते, मरे जानवरों को ढो रहे होते।  शिक्षा के दरवाजे हमारे लिए बाबासाहब अम्बेडकर ने खोले।  सम्मान के साथ जीना बाबासाहब अम्बेडकर ने सिखाया । और बुद्ध का मार्ग भी हमें बाबासाहब अम्बेडकर ने दिखाया। बुद्ध हमारे शास्ता हैं तो अम्बेडकर हमारे गुरु है। बुद्ध अगर दीपक है तो बाबासाहब आंबेडकर हमारी आँख है।

अगर बाबासाहब अम्बेडकर न होते तो बुद्ध भी न होते। बुद्ध को कौन जानता था उनकी इस मातृ-भूमि में ? यह बाबासाहब अम्बेडकर थे जिन्होंने बुद्ध को हमें जनाया। हमारे लिए बाबासाहब अम्बेडकर पहले हैं, बाद में बुद्ध।

बेशक,  बुद्ध के धम्म का केंद्र  मानवता है।  किन्तु इसकी जरुरत हमें नहीं,  हमारे शोषकों को अधिक है । क्यों हमारे शोषक बौद्ध भिक्खुओं के मार्फ़त बुद्ध और अम्बेडकर में भेद पैदा कर रहे हैं ? अब इसमें कोई छिपी बात नहीं है कि बौद्ध भिक्खुओं को बाकायदा प्रशिक्षित किया जा रहा है, बाबासाहब आंबेडकर के विरुद्द । आखिर कौन देता है, इन भिक्खुओं को इस तरह का विभेदकारी प्रशिक्षण ?  सनद रहे, ध्यान और आत्म-संयम के नाम पर देश में फैले ढेरों विपस्सना केन्द्रों में भिक्खुओं को चुन-चुन कर प्रशिक्षण दिया जाता है। क्या बुद्ध और अम्बेडकर के बीच विभेद के बीज यहाँ बोये जाते हैं ? 

भीम स्तुति में  बाबा साहब के प्रति किसी कवि की अतिरेक श्रद्धा पच नहीं रही है तो बुद्ध-वंदना और परित्राण पाठ में 'यक्खा देवा च ब्रह्मनो' में यक्ष, देव और ब्रह्मा का आव्हान कैसे पच रहा है ?  ब्रह्मा की स्तुति कैसे पच रही है। 'भवतु सब्ब मंगल, रक्खन्तु सब्ब देवता' में कौन-से देवता से रक्षा की कामना की जाती है ? 'अट्ठङग उपोसथ शील' में  'ब्रह्मचरिया वेरमणी' के क्या मायने है ? धम्म की वाणी में क्या यह साधुचरिया/बुद्धचरिया या विशुद्धचरिया वेरमणी नहीं हो सकती ? 

सत्य

सत्य परास्त होता है, क्योंकि वह झूठ नहीं बोलता. फिर भी, सत्य अनुकरणीय है, क्योंकि झूठ का परीक्षण इसी से होता है.
-बोधिचर्यावतार

वेदों की प्राचीनता

सनातनी पारंपरिक और वामपंथी ब्राह्मण वेदों को सबसे प्राचीन, लगभग 3500 वर्ष पुराने मानते हैं। क्या वेद दुनिया का सबसे प्राचीन ग्रन्थ है ?

नवीनत्तम खोजों से यह स्थापित हो चूका है कि बेबीलोन, सीरिया, मिस्र या ईरान की संस्कृति वैदिक संस्कृति से बहुत अधिक पुरानी है। 'एपिक ऑफ़ गिलगमेश', 'पैपिरस पांडुलिपियाँ' या 'डेड सी स्क्रोल्स' लगभग 3000-3500 वर्ष पुराने दुनिया के सबसे प्राचीन आलेख पुरातत्ववेत्ताओं को प्राप्त हुए हैं (पृ 57)। ये आलेख मिस्र,  रसशाम्र और असीरियाई इलाकों में मिले हैं।
पिछले कुछ दशकों से सवर्ण वामपंथी वैदिक समाज की प्राचीनता के पूर्वाग्रह और मोह में मोहनजोदड़ो- हड़प्पा को वैदिक साबित करने की कवायद में लगे हैं। लन्दन के ब्रिटिश संग्रहालय में असीरियाई कीलाक्षर लिखित पकाई मिटटी की पट्टिकाएं हैं इनमें से अनेक सुमेर संस्कृति के समय की हैं(पृ 60 )।

बेबीलोन भारत की ब्राहमण संस्कृति से बहुत ज्यादा प्राचीन है। मिस्री संस्कृति के विशेषज्ञ  जी. मास्पेरो ने उन्नीसवी सदी के अंत में इजिप्ट के प्राचीनत्तम साहित्य का अध्ययन किया था। मास्पेरो ने प्राचीन पत्र, कविताओं और एक उपन्यास या प्राचीन कथाकृति के अंश अपनी किताब 'न्यू लाइट ऑन एशियंट इजिप्ट' में उध्दृत किये हैं(पृ 61)।

निश्चय ही अब्राहमीय ब्राह्मण पश्चिम एशिया में मिस्र से लेकर कैस्पियन सागर और असीरिया क्षेत्र से गुजरते हुए युद्धों की अशांति से संत्रस्त होकर भारत आएt, उनकी किताबों में उक्त समूचे इलाके के लेखन और मिथकों की छायाएं मौजूद रहनी स्वाभाविक है(पृ 61)।

आर्यों के भारत में आने के पूर्व सिन्धु-उपत्यका में असीरिया(मेसोपोटामिया) की समसामयिक एक सभी जाति रहती थी जिसका सामंत शाही समाज अफगानिस्तान में दाखिल होने वाले आर्यों के पितृ-सत्तात्मक समाज से कहीं अधिक उन्नत अवस्था में था(दर्शन दिग्दर्शन  पृ 381: राहुल संकृत्यायन पृ 380 )।
असभ्य लड़ाकू जर्मनों ने जैसे सभ्य संस्कृत रोमनों और उनके विशाल साम्राज्य को ईसा की चौथी शताब्दी में परस्त कर दिया, उसी तरह सर जान मार्शल के अनुसार, इन आर्यों ने सिन्धु-उपत्यका के नागरिकों को परस्त कर वहां अपना प्रभुत्व 18 00 ई.पू  के आस-पास जमाया। यूरोपीय इतिहासकारों के अनुसार, यह वही समय है पश्चिम में भी हिंदी-यूरोपीय जाति की दूसरी शाखा यूनानियों ने यूनान में वहां के भूमध्य जातीय निवासियों को हराकर प्रभुत्व स्थापित किया(वही)।

मोहनजोदड़ो और हड़प्पा की खुदाइयों से जो 'सिन्धु-सभ्यता' उभर कर आयी है, उससे  पता चलता है कि मेसोपोटामिया के नागरिक जीवन की भांति सिन्धुवासी भी सभ्य समाज के नागरिक जीवन को बिता रहे थे। वह कृषि, शिल्प, वाणिज्य के अभ्यस्त व्यवसायी थे। ताम्र और पीतल युग में रहते हुए भी उन्होंने काफी उन्नति की थी। उनका एक सांगोपांग धर्म था। एक तरह की चित्रलिपि थी। यद्यपि चित्रलिपि में जो मुद्राएँ और दूसरी लेख-सामग्री मिली हैं, अभी वह पढ़ी नहीं जा सकी है, लेकिन दूसरी परीक्षाओं से मालूम होता है कि सिन्धु-सभ्यता असुर और काल्दी(Chaldean) सभ्यता की समसामयिक ही नहीं उनकी भगिनी-सभ्यता थी और उसी तरह के धर्म का ख्याल उसमें था। वहां लिंग और दूसरे देव-चिन्ह या देव-मूर्तियाँ पूजी जाती थी(वही, पृ 381 )।