Thursday, May 29, 2014

खड़गपुर का रहस्यमयी कुआं (Khadagpur's Mysterious Wel)

   पिछली  24 अप्रेल 14  को एक शादी में शरीक होने के सिलसिले में हमारा जाना अपने पैतृक गावं सालेबर्डी  हुआ। सालेबर्डी जाने के लिए हमने वारासिवनी-रामपायली वाला मुख्य मार्ग न पकड़ कर अन्सेरा-खड़गपुर मार्ग पकड़ा।

 चूँकि वारासिवनी से रामपायली के लिए जो रोड है , वह पिछले 3 -4 वर्षों से इस कदर उखड़ा और गढ्ढों से भरा है कि लोग बमुश्किल ही वहां से आना-जाना करते हैं। यद्यपि यह मुख्य मार्ग है जो भंडारा (महा.) को बालाघाट (म प्र) जिले से जोड़ता है।
अपने यहाँ 'विकास' के नाम पर चुनाव लड़ा जाता है।  अभी इसी चुनाव में मोदी ने विकास के नाम पर चुनाव जीता। यद्यपि , म प्र में पिछले 10 वर्षों से बीजेपी की सरकार है।  मगर ,विकास किधर हो रहा है , समझ के परे है।

खैर, हम बात रहस्यमयी कुएं की कर रहे थे। दरअसल , गावं जाते वक्त  दिमाग इतना ख़राब होता है कि बात कुछ भी हो, रोड बीच में घुस आता है।

जैसे कि मैं बतला रहा था , वारासिवनी से हमने अन्सेरा-खड़गपुर मार्ग पकड़ा। मगर , यह रोड सही हो , ऐसा नहीं है।  करीब 2 की मी में कच्चा रोड ऐसा है कि नानी याद आती है। हाँ , इसके बाद 8-9  की मी का रोड पक्का है , जो एकदम दुरुस्त है। सड़क पर अपनी गाड़ी के अलावा आपको दूसरी गाड़ियां दूर-दूर तक नज़र नहीं आएगी। 

अन्सेरा के बाद खड़गपुर का जंगल शुरू होता है। किसी ज़माने में खड़गपुर का जंगल बहुत घना था। यहाँ पर घटित मामे-भानजे की दर्दनाक घटना रोंगटे खड़ा करती है। दादी के अनुसार, लकड़ी काटने मामा-भांजा जंगल गए थे। तभी,  कहीं से शेर आया और भांजे को खींचते हुए घनी झाड़ियों में गायब हो गया। उस समय से कोई भी मामा-भानजा एक साथ इस जंगल से नहीं जाता । मगर , अब यहाँ कोई जंगली जानवर रहता हो, लगता नहीं।


एकाएक , पास बैठे भतीजे प्रशांत ने सड़क के बायीं ओर किसी रहस्यमयी कुएं की ओर संकेत किया ।  मैंने झट ही गाड़ी धीमी कर सड़क के एक ओर खड़ी कर दी। हम सब नीचे उतरे।

वहां पहले से ही कुछ लोग खड़े थे। लोग तरह-तरह की बातें कर रहे थे। बतलाए अनुसार , यहाँ का पानी  कम नहीं होता, चाहे ठण्ड  हो या गर्मी । दूसरे , यह कुआं  4-5   की  मी आगे जा कर पांजरा नामक गावं से गुजरती चनई नदी के गहरे डोह में निकलता है।  यहाँ काफी गहरा पानी है जिसे 'नन्द भौरा' कहते है। यहाँ तीन गावं ; अन्सेरा,  खड़गपुर और जराह मोहगावं का 'चिमटा' है , अर्थात तीन गावों की सीमा मिलती है।

India living aside of Railway Tracks

  अगर आपको ट्रेन में साइड लोअर बर्थ मिल गई तो फिर आप अपने ही देश में बसते एक और भारत से सीधे रुबरूं हो सकते हैं।  बशर्ते, आप ए सी (एयर कंडीशन कम्पार्टमेंट )में न बैठे हो।

 अपने यहाँ यही दिक्कत है कि ए सी में बैठते ही आप जमीन से कट जाते हैं। वैसे, रेलवे खुद भी नहीं चाहती की 'साहब लोग' एयर कंडीशन कम्पार्टमेंट में बैठ कर  बाहर ताक-झांक करे।

बाहर , विदेशों में ऐसा नहीं होता।  'एम्सटरडेम विजिट' के दौरान मैंने यूरोप में देखा कि वहां ट्रेनों और बसों में खिड़कियों के कांच पूरी तरह ट्रांसपेरेंट होते हैं।  मगर , हमारे यहाँ 'डिस्टेंस' मेंटेन किया जाता है। 

एक समय था जब हम जनरल बोगी में सफर करते थे।  शुरुआत के दिन थे।  नया खून था और जेब में फाईन भरने के लिए पैसे नहीं थे । जनरल बोगी का  डंडा पकडे लटक कर सैकड़ों की मी का सफर करते थे ।   मगर , अब ऐसा नहीं है। अब तो इमरजेंसी में जनरल की टिकिट खरीदवा कर भी मिसेज स्लीपर की बोगी के तरफ धकेलती है। 

स्लीपर बोगी में बैठने के दो फायदे हैं।  एक तो आप जमीन से जुड़े रहते हैं और दूसरे , आपको अपनी औकात पता होती है ।
हमारे यहाँ अजीब से नियम हैं।  जब आप अपने परिवार को विस्तार देने में रहते हैं तब आपके पास छोटा-सा कमरा होता हैं।  मगर , जैसे जैसे बच्चें बड़े हो कर पढ़ाई या नौकरी के लिए आपसे अलग रहते हैं , सरकार आपके  'एंटाइटल्ड' कमरे का साइज़ बढ़ाते जाती है।
 कुछ इसी तरह का नियम ट्रेन या प्लेन में सफर करने का है। एक आफिस असिस्टेंस फस्ट क्लास की टिकिट का एंटाइटल्ड होता है ।  मगर,  बाबू मोशाय है कि बैठते स्लीपर क्लास में ही हैं !

Thursday, May 1, 2014

Aishwarya-Smita Wedding

जब आप किसी उद्देश्य को लेकर चलते हैं, तो वह पूरा हो ही जाता है।  हम लोग जून लास्ट में भोपाल आए थे।  सोच थी कि ताई की शादी के बाद अब छोटू की शादी करनी है। छोटू 30 वर्ष को पूर्ण कर रहा था।  यह एक ऐसी उम्र होती है जब लडके की शादी हो जानी चाहिए।

यूँ इस शादी मे एकाध ट्विस्ट भी है , मगर अब इस पर चर्चा करना बेमानी है।

दल्ली राजहरा के शेंडे परिवार पति-पत्नी दोनों;  दिल के बड़े ही साफ और सच्चे हमें लगे।  उनकी सच्चाई और साफ़गोई देख कर हम बेहद अभिभूत हुए। शुरुआत से ले कर लड़की की विदाई तक हर एक कार्य को वे जिस तरह सलीके से कर रहे थे , दरअसल मुझे ईर्ष्या हो रही थी। हमें ख़ुशी है कि ऐसे परिवार से हमारा सम्बन्ध हुआ। यहाँ मुझे मुंबई का सीन  रह रह  कर याद आता है।



मैं भाग्य और भगवान को नहीँ मानता। दरअसल, मुझे इनकी सत्ता पर विश्वास कम; समाज पर पड़ रहे इन के दुष्परिणामों की चिंता ज्यादा होती है।
अमीर लोग भाग्य और भगवान को जेब मे ले कर चलते हैँ।  मगर, गरीबों के साथ ऐसा नहीं होता।  वास्तव में,  भाग्य और भगवान से मेरी व्यक्तिवादी कम समष्टिवादी चिन्ता अधिक होती  है। दरअसल , लॉ ऑफ़ प्राबेबिलिटी का चक्कर ऐसा है कि लोग भाग्य और  भगवान को घसीट कर ला ही लेते हैं। वैसे , राहुल सांकृत्यायन के बात में भी दम है। यह कि भाग्य और भगवान समाज के बुद्धिजीवी और मक्कार लोगों के दिमाग़ की उपज है।

रिश्ते अच्छी जगह हो, अच्छे परिवार से हो;   कौन नहीं चाहता।  सब चाहते हैं कि काम  ठीक-ठाक हो। रिश्ते बने और निभाए भी जाए। 

शेंडे परिवार का साथ पा कर मुझे सचमुच सुखद अनुभूति हुई।  शेंडे परिवार सिर्फ़ एक बात के लिए बार-बार जोर दे रहा था।  यह कि शादी  दल्ली-राजहरा से हो।

दरअसल,  वे पति-पत्नी दोनों विगत तीस-पैतीस वर्षों से वहाँ बस गए थे।  दूसरे, मेडम शेंडे के माता-पिता वहीँ के थे। जाहिर है बड़े-बुजुर्गों को प्रॉब्लम होना स्वाभाविक था। मुझे उनकी उनकी रिक्वैस्ट जेनुईन लगी।  हमने उन्हें कहा कि उस स्थिति में हम बारात वगैरे नहीं लायेंगे। बल्कि, शादी के 2-3 दिन पहले से हम लोग वही आ जाएँगे। ठहरने का और बाकि सब इंतजाम उन्हें करना होगा।  जहाँ तक खर्च की बात है, जो भी खर्च होगा, उसका 50% हम वहन करेँगे।  शेंडे परिवार ने मुस्करा कर हामी भरी। 

बातों का आदान–प्रदान होते रहा।  व्यवस्था दो महीने पहले से शुरू कर दी गई थी।  बुकिंग की जा रही थी।  दूल्हा और दुल्हन  के कपडे, जेवरात दोनों ओर से सहमती ले कर ख़रीदे जा रहे थे। और इस तरह 18 अप्रेल की तिथी आ गई।  

हम लोग 16 अप्रेल को ही दल्ली राजहरा चले गए थे। जलाराम टेम्पल जो बीच मॉर्केट में स्थित है और जिसमें शादी वगैरे जैसे फंक्शन किए जाने की व्यवस्था है, पहले ही बुक किया जा चूका था।  

यह गुजरातियों का मन्दिर है। मन्दिर परिसर में ऊपर छोटे-बड़े आठ कमरे और नीचे हॉल  हैं। एक कमरे में अटेच्ड लेट-बाथ है जबकि बाकी कमरों के लिए कॉमन लैट-बाथ हैं। नीचे हॉल काफी बड़ा है जिससे लगा हुआ किचन है।  हॉल में कुर्सियां लगा कर ख़ाना खाया जा सकता है। हल्दी का फंक्शन हम ने यही पर किया। शेंडे परिवार ने अपने निवास स्थान के साथ-साथ यहाँ हॉल में भी म्यूजिक सिस्टम की व्यवस्था करवा दी थी । हल्दी का फंक्शन विधि विधान और मस्ती के साथ देर रात तक चला। 

जलाराम टेम्पल से सट कर सड़क की दूसरी तरफ़ एक बड़ा-सा लॉन  है।  शादी का फंक्शन यही होना था। लान को खूबसूरत तरीके से सजाया ज रहा था। 

जलाराम मन्दिर के स्टाफ और अन्य कर्मचारियों का व्यवहार बहुत ही अच्छा लगा।  सारा काम ठीक ढंग से हो रहा था।  पब्लिक फंक्शन में छोटी-छोटी बातों पर विवाद हो जाता है।  मगर, यहाँ एकदम घरेलु माहौल था। स्नान के लिए गर्म पानी किसी मेहमान ने कहा तो नीचे किचन में पानी गर्म कर दिया जाने लगा।  नि:संदेह सारी व्यवस्था में मेहमानों का अहम् रोल था।  सभी एक दूसरे को समझ कर काम कर रहे थे। 

बारात सही समय पर निकली। मेरे बड़े लडके राहुल ने भिलाई से ही फायर क्रेकर लाए थे। वाकई, आसमान में रंग-बिरंगी फटाकों की होड़ देखते ही बन रही थी। 

घोड़ी और बेंड बारात में चार चाँद  लगा रहे थे। बेंड वाले इतनी तन्मयता और जोश से बजा रहे थे कि बस उन्हें देखते ही बनता था । दूल्हा जैसे ही घोड़ी पर बैठा तो कुछ घबरा रहा था। मगर,  थोड़ी देर बाद ही उसने खुद को संभाल लिया। मैं पास में था।  मैंने छोटू को ढांढस बंधाया। दरअसल, घोड़ी का शौक ऐसा ही होता है !

शादी का कार्यक्रम सही समय पर सम्पन्न हुआ। भंतेजी मंच पर विराजमान थे।  भीमा मेडम उन्हें सहायता कर रही थी। बड़ी शांति और गरिमामय माहौल में वेडिंग का फंक्शन सम्पन्न हुआ। वेडिंग की रस्म ख़त्म होते ही डीजे फ्लोर पर कुछ बाराती थिरकने लगे। मंच के सामने ही एक तरफ डीजे लगा था। यद्यपि आचार- संहिता लागू होने के कारण दिया गया रात 10 बजे का समय खत्म होने को 15 मिनट हो गए थे ।
  डिनर संतुलित और परफेक्ट था। मगर, इसी बीच किसी ने मेरी बड़ी बहू सोनू का पर्स चुरा लिया।  वह दूल्हे की सहायिका के रूप में मंच पर विराजमान थी। किसी ने उनकी बेख्याली का फायदा उठा कर पीछे से पर्स पार कर दिया।  आप जानते हैं , शादी में तरह-तरह के लोग आते हैं ।

पर्स, और वह भी विदेश मे बसने वाली बहू का ! जाहिर है, घटना को हल्के से नहीं लिया जा सकता था। कई-कई कयास लगाए गए।  मेरी हालत तो माथा पीटने की थी , जैसे कि अक्सर होता है।  यहाँ, मुझे स्वीकारना पडेगा कि ऐसी स्थितियों में मैं बडी गिव-अप की स्थिति मे आ जाता हूँ, जबकि यह गलत है। पिछली दो बार प्रयास करने पर सामान मिला भी है। 
मेरी भांजी हेमलता महीस्वर जो जामिया मिलिया दिल्ली में प्रोफ़ेसर हैं, ने संबंधित किसी अफिसर से बात की।  दूसरे दिन, सारा समान मिल गया सिवाय नगद रकम के। शादी के खर्च के लिए खुद मैने सोनू को 50,000/- दिया था। दूसरे, ताई ने भी सेफ समझ अपना हैन्ड-बेग सोनू को हवाले किया था।

Sunday, April 27, 2014

आओ चले गावं की ओर


छोटू (ऐश्वर्य ) की वेडिंग 18 अप्रेल 2014  सम्पन्न होने के बाद  हम लोग  दल्ली-राजहरा से सीधे सालेबर्डी गए।  तय प्रोग्राम के अनुसार, 19  अप्रेल का नाइट हाल्ट सालेबर्डी था।

अन्य समाजों में नई नवेली दुल्हन और दूल्हे को अपने कुल या पारिवारिक देवी/देवता के पास ले जाने का रिवाज़ है।  मेरे दिमाग में था कि मैं  नई नवेली दुल्हन और दूल्हे को अपने पितृ-स्थान ले चलूं।  हम लोगों ने तो देवी-देवताओं को काफी पहले अलग रख दिया है न ।

घर के बड़े-बुजुर्गों का आशीर्वाद नई नवेली दुल्हन और दूल्हे को लेना चाहिए। बड़े-बुजुर्गों का दर्शन प्रेरणादायी होता है। वे जमीन से जुड़े रहने की सीख देते हैं। 


इस बार दामाद बिपिन और बिटिया भी साथ थे। हम उम्र होने से बिटिया-दामाद और बेटा-बहू के बीच गाढ़ी छन रही थी।  उम्र के साथ-साथ विचारों का अंतर मैं साफ-साफ देख रहा था।  विचारों की समानता उम्र का लिहाज नहीं करती , एक बार पुन: यह विचार मुझे दकियानूसी लगा।  मैं अलग होकर भी अलग नहीं रह सकता था।  बेटे और दामाद से भला आप अलग कैसे हो सकते हैं ?
नौकरी या व्यवसाय की वजह से हम लोग गावं से दूर रहते हैं। गाँव जैसे कस्बों में, अलग-थलग बसी कालोनियों में लम्बे समय तक प्रवास करते हैं।  और फिर, हम में से बहुत लोग मेट्रोपोलिटन शहरों में जा कर बसते हैं- जन्म-स्थान से दूर । अपनों से दूर, परिवेश और विचारोँ से दूर।

बच्चें होते हैं, पलते-बढ़ते हैं।  शिक्षा प्राप्त करते हैं- शहर में, मेट्रोपोलिटन नगरों में।  पढ़-लिख कर शादी होने के बाद बच्चों में अपने पितृ-स्थान में जाने की ललक हो, यह जरुरी नहीं है. मुझे इसके लिए आज-कल के बच्चों पर कम उनके माँ-बाप पर तरस अधिक आता है। 

खैर , यह मेरी सोच थी कि गावं जाना चाहिए और यह सोच कार्यान्वित हुई. लड़का, बाप को समझे, यह बड़ी बात है. मुझे फख्र है कि छोटू ने इसे वेटेज़ दिया.

गावं परम्पराओं  चलता है। दरअसल, परम्पराओं का नाम ही गावं है। दामाद घर आए तो आरती सजा कर उनको टीका लगाना है। आँगन में लकड़ी के पाटे पर पैर धोना है। और फिर ,  नई-नवेली दुल्हन-और दूल्हे को सबके पैर पड़ना है । भाई यही हमारी तहज़ीब है। तहज़ीब का नाम गावं है और हमारा देश गावों मे बसा है।  

मगर , इसका क्या किया जाए कि यह तहज़ीब अब गांवों को भी टा टा करने लगीं है।

Monday, March 31, 2014

झूलेलाल

झूलेलाल

File:Jhulelal hindu deity.jpg
सिंधियों के इष्ट देवता झूलेलाल 

हम सभी ने यह कव्वाली हजार- हजार बार सुनी होगी -
'ओ लाल मेरी पत रखियो भला झूले लालन।  सिन्ध्री दा सेवन दा , सखी शहबाज़ कलंदर।  दमा दम मस्त कलंदर , अली दम दम के अंदर  ........  ।  दोस्तों , यह लेख पढने के बाद आप जरुर इस सूफियाना कव्वाली को एक बार और सूने। मेरा दावा है कि अब आपको एक नया मज़ा आएगा।    

सिंधी समाज में झूलेलाल का नाम बड़े आदर से लिया जाता है। झूलेलाल का मतलब है , प्रकाश और जल का देवता।  झूलेलाल सिंधियों के लिए भगवान है। उनके तारक है , उद्धारक है।

14 अग 1947 को पाकिस्तान के अस्तित्व में आने के बाद लाखों की संख्या में हिन्दू और सिक्ख पाकिस्तान छोड़कर भारत आए थे। ये शरणार्थी अधिकांशत: पाकिस्तान के सिंध प्रदेश और इसके आस-पास के भू-भाग की अपनी मातृ-भूमि छोड़ कर भारत आए थे। भारत सरकार की मदद से देश के विभिन्न भागों में इन्हे बसाया गया था।

यद्यपि , सिंध प्रदेश के आलावा हिन्दू पाकिस्तान के दूसरे इलाकों से भी शरणार्थी के रूप में भारत आए थे।  मगर, सिंध प्रदेश के निवासी ही सिंधियों के रूप में अपनी पहचान कैसे बचा पाए हैं , शोध का विषय है।

शोध का विषय तो यह भी है कि हिदुस्तान -पाकिस्तान बंटवारे को आज 67 वर्ष हो गए।  मगर, आज भी हमारे राष्ट्र गान में 'सिंध'  शब्द का समावेश है जो हमें लगातार स्मरण कराता है कि एक समय विश्व की महान सभ्यता रही 'सिंधु घाटी सभ्यता'(3300 -1700  ई पू )  के हम कभी वारिश थे , हैं और रहेंगे। सिंधी विद्वान् और लेखक दादाराम पंजवानी के शब्दों में,  निश्चित ही सिंधी,  हिन्दुस्थान और पाकिस्तान के अटूट दोस्ती की मिशाल है जिसे दोनों देशों के शासक चाहे भी तो नहीं मिटा सकते।
File:CiviltàValleIndoMappa.png
Source- Wikipedia

सिंध प्रदेश के निवासियों की एक खास संस्कृति रही होगी ।  नि:संदेह, सांस्कृतिक रूप से सिंधियों की अलग पहचान है । इनके धार्मिक संस्कारों में सूफी संतों और सिक्खों की गुरु नानक की शिक्षाओं का स्पष्ट प्रभाव दृष्टिगोचर होता है। इनका रहन-सहन, बोल-भाषा अलग है। इनके नाम के अंत में 'राम ' , 'मल' , ' चंद ' और उपनाम के अंत में  ' नी ' प्राय: देखा जा सकता है।

सन 1967 में भारत सरकार ने सिंधी को एक पृथक भाषा के रूप में मान्यता दी। भारत सरकार के सन 2001  के आकड़ों के अनुसार सिंधियों की आबादी  2,571, 526  दर्ज है।

यद्यपि, सिंधियों को गुजरात में बसाया गया था,  क्योंकि यहाँ की आबो-हवा सिंध प्रदेश से मिलती-जुलती थी।  तथापि , सिंधी किसी क्षेत्र विशेष में घनीभूत न बस कर जिसको जहाँ लगा , बस गए। आज सिंधी जहाँ भी हैं , जैसे भी हैं , किसी न किसी व्यवसाय में लगे हैं।  किराने से लेकर कपडा मार्किट में  सिंधियों का दबदबा है। वे स्वभाव से मेहनती होते हैं। अब तो राजनीति में भी आपको सिंधी मिल जाएंगे। आचार्य कृपलानी, एल के आडवाणी जैसी हस्तियां इसके उदहारण हैं।

सिंधी लोग झूलेलाल को बड़ी श्रद्धा से मानते हैं। 'चेती चाँद' का उनका धार्मिक महोत्सव इसका उदहारण है। वे उन्हें भगवान मानते हैं। बरहणा  साहिब (भ. झूलेलाल) की जब शोभायात्रा निकाली जाती है और छेजरिस (डांस में भाग लेने वाला दल ) गुजराती डांस 'डांडिया ' की तर्ज पर हाथों में डांडी लेकर जब गोलाकार  घूमते हुए डांस करता है तो राह चलते लोग जैसे थम जाते हैं । ये लोग 'पंजरा ' गाते हैं जो दरिया देवता के लिए स्तुति गान है।

भ. झूलेलाल को दरिया लाल , उदेरो लाल, दूल्हा लाल, लाल साईं , ज़िन्दाँ पीर  आदि कई नाम और विशेषणों से सम्बोधित किया जाता है। झूलेलाल का जन्म 10 वीं शताब्दी में हुआ था। सिंधी परम्परा अनुसार भ. झूलेलाल का जन्म  सन 951 के चैत्र शुक्ल द्वितिया को माना जाता है। चेती चाँद अर्थात चैत्र महीने का दूसरा दिन।

कहा जाता है कि बालक झूलेलाल को गोरखनाथ से दीक्षा दिलायी गई थी। गुरु गोरखनाथ ने झूलेलाल को  'अलख निरंजन ' का बीज मन्त्र दिया था।

 झूलेलाल के बारे में चमत्कारिक बातें कहीं जाती है। कहा जाता है कि सिंध (पाकिस्तान ) के ठट्टा नगर में मिरकशाह नामक मुस्लिम बादशाह था। मिरकशाह ने अपने राज्य में रह रहे हिंदुओं को आदेश दिया कि वे इस्लाम धर्म स्वीकार कर ले। हिंदुओं को इससे बड़ी ठेस लगी। वर्षों पुरानी उनकी संस्कृति और तहज़ीब वे बलात कैसे छोड़ सकते थे ?

एक दिन सारे हिन्दू ठट्टा नगर के पास से बहती सिंधु नदी के तट पर एकत्र हुए।  उन्होंने मन्नत मांगी की कि इस दुःख की घडी में कोई ईश्वरीय अवतार उनकी मदद करे । एकाएक नदी में लहरें उठने लगी। उन लहरों पर एक विशाल मछली के रूप में दिव्य पुरुष प्रगट हुए।  आकाशवाणी हुई कि सात दिन के बाद नसरपुर के भक्त रतनराय  की पत्नी देवकी के गर्भ में भगवान् अवतार लेंगे।

नीयत समय अर्थात सातवें दिन रतनराय उर्फ़ रतनचंद  की पत्नी देवकी के गर्भ में भगवान् ने जन्म लिया। बच्चे का नाम उदयचंद  रखा गया था। प्यार से बच्चे को 'दरिया लाल' या  'उदेरो लाल' (अर्थात पानी से जिसका उदय हुआ) तो कुछ 'अमर लाल'  कहने लगे । कहा जाता है कि जिस झूले पर बालक को रखा गया था , स्वत: अपने आप झूलने लगा था।  इसलिए बालक को 'झूलेलाल' के नाम से पुकारा जाने लगा।

झूलेलाल के जन्म के बाद ही माता का देहांत हो गया था। रतनराय उर्फ़ रतनचंद ने बाद में दूसरी शादी कर ली थी। बालक झूलेलाल या उदेरोलाल या अमर लाल के बारे में ऐसी कई चमत्कारिक घटनाएं बहु-श्रुत व प्रचलित हैं। बालक झूलेलाल जैसे-जैसे बड़ा होता है, चमत्कारिक घटनाओं की श्रंखला बढती जाती है।

Source-Sindh Festival
एक दिन बादशाह के आदेश पर झूलेलाल को दरबार में पेश किया गया।  झूलेलाल ने कहा कि मुस्लिम जिसे अल्लाह के नाम से पुकारते हैं और हिन्दू जिसे ईश्वर कहते हैं , दरअसल दोनों एक ही शक्ति के दो नाम हैं।और इसलिए हिन्दू और मुस्लिम कौम में सिर्फ नाम और पूजा पद्यति का फर्क है। झूलेलाल के तर्क का बादशाह को सलाह दे रहे मौलवियों में कोई फर्क नहीं पड़ा।  उलटे मौलवियों ने बादशाह को सलाह दी कि वह झूलेलाल को इस्लाम के अनुसार 'काफिर'  घोषित कर बंधक बनाने का सैनिकों को आदेश दे।

बादशाह ने सैनिकों को झूलेलाल को गिरफ्तार करने का आदेश दिया। तभी वहाँ एकाएक समुद्री तूफान पैदा हुआ । जब उस समुद्री तूफान में बादशाह का महल डूबने लगा तो बाद्शाह ने झूलेलाल के आगे समर्पण कर दिया।

झूलेलाल के सोनाराम औए भेदोराम नाम के दो बड़े भाई और थे।  मगर , ऐसा लगता है , झूलेलाल से उनकी पटरी नहीं बैठती थी।  और यहीं कारण है , उन्हें अपने मिशन के आगे बढ़ाने के लिए अपने चचेरे भाई पगड़ गेतूराम का सहारा लेना पड़ा। भ. झूलेलाल ने जिस पंथ की नीवं रखी, उसे 'दरियाहि पंथ ' कहा गया ।

नसरपुर के करीब 10 की मी दूरी पर हाला गावं में 'उदेरोलाल-जो का मंदिर है।  कहा जाता है कि भ. झूलेलाल ने एक मुस्लिम परिवार से जमीन लेकर इसका निर्माण कराया था। बाद में ब्रिटिश हुकूमत में यहाँ एक रेलवे स्टेशन बना जिसका नाम 'उदेरोलाल '  है।

बारह वर्ष की उम्र तक आते-आते झूलेलाल ने भक्ति-भाव के अतिरिक्त हिन्दू-मुस्लिम एकता के लिए काफी काम किया था। उनके हजारों- हजारों शिष्य हुए।  उन्होंने कई मंदिर बनवाए।

झूलेलाल जब 13 वर्ष पार किये तब उन्हें लगा कि जिस उद्देश्य के लिए उनका जन्म हुआ , वह पूर्ण हो चूका है। तब, उन्होंने अपने प्रिय शिष्य पगड गेतुराम को बुला कर आवश्यक निर्देश दिए। उन्होंने पंथ के काम को आगे बढ़ाने के लिए निर्देश दिए। उन्होंने पगड गेतुराम से कहा उनके वंशज आगे से  'ठाकुर' और खुद भ. झूलेलाल  के अनुयायी  'सेवक' (shewaks ) कहलाएंगे। मंदिरों में पूजा-अर्चना करने वाले ' बाबो' नाम से पुकारे जाएंगे।

और अंत में उन्होंने झिझन नामक स्थान पर समाधी ली,  जहाँ पर उनके हिन्दू और मुस्लिम दोनों समुदायों के बड़ी मात्रा  में शिष्य उपस्थित थे।  यहाँ पर मुस्लिम बादशाह मिरकशाह  के प्रतिनिधि भी उपस्थित थे। सिंधी परम्परा के अनुसार यह तिथि  सन 964 के भाद्र पद चतुर्दशी थी।

हिन्दू मॅथोलॉजी में संत ज्ञानेश्वर के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने 13 वर्ष में ज्ञानेश्वरी लिखकर समाधि ले ली थी। यद्यपि, न तो ज्ञानेश्वर और न ही झूलेलाल की प्रतिमा देखकर ऐसा लगता है।