Monday, April 23, 2018

ज्ञानदास साहेब

ज्ञानदास साहेब
ज्ञानदास साहेब
हमारे गुरु जी महंत बालकदास साहेब को कबीरपंथ की गुरु गद्दी महंत गुरु ज्ञानदास साहेब, कटंगी वाले से मिली थी। ज्ञानदास साहेब से मेरा सीधा परिचय नहीं है। स्वभावत: ज्ञानदास साहेब के बारे में मुझे जानने की इच्छा हुई। गुरुजी अक्सर मुझे उन पलों की कहानी सुनाया करते थे कि कैसे गुरु ज्ञानदास साहेब ने उन्हें अपने उत्ताधिकारी के रूप में चुना था।  इस चर्चा में कटंगी का नाम आता था। कटंगी में, ज्ञानदास साहेब की एक पुत्री है, इस तरह की जानकारी मेरे पास थी और एक  बात, देवाची चिचखेड़े को मैं पहले से जानता था। मगर, मुझे यह नहीं मालूम था कि देवा जी चिचखेड़े और ज्ञानदास साहेब की पुत्री में कोई रिश्ता है.

बहरहाल,पिछले मार्च 11 को, अवसर निकाल कर मैंने कटंगी का विजिट किया। हम लोग सालेबर्डी, जो मेरा नेटिव गावं है, से निकले थे।  प्लान के अनुसार येरवाघाट के खिनाराम बोरकर साहेब को भी हमने अपने साथ रख लिया। हम नवेगावं होते हुए कटंगी पहुंचे। खिनाराम बोरकर 'टेलर साहेब' के नाम से जाने जाते हैं। आप गुरु जी के प्रथम शिष्य हैं। प्रथम शिष्य होने से गुरु जी के शिष्यों में उनको खास मुकाम हासिल है।  मुझे पता था कि गुरु ज्ञानदास साहेब की पुत्री/दामाद से टेलर साहेब का परिचय है। हम सीधे चिचखेड़ेजी के घर पहुचे।  चिचखेड़ेजी के घर पहुँचते-पहुचते रात हो गई थी। अत: हमने रात्रि विश्राम भी उन्हीं के यहाँ करने का फैसला किया ताकि विस्तार से चर्चा हो सके।

ज्ञानदास साहेब का पहले का नाम भसवड़ था। 'ज्ञानदास' की पदवी तो उन्हें कटंगी के जमींदार जगराम पालीवाल ने दी थी। ज्ञानदास साहेब धर्म, दर्शन और अध्यात्म के बड़े विद्वान थे।  शायद, इसी कारण उन्हें 'ज्ञानदास' की पदवी मिली थी। वे ऊँचे-पुरे अच्छे कद-काठी के व्यक्ति थे। वे हमेशा सिर पर कोसे का साफा बांधा  करते थे। उनके एक हाथ में कुबड़ी(यौगिक क्रिया में श्वास-प्रश्वास को नियंत्रित करने के लिए लकड़ी का एक यंत्र) और दूसरे हाथ में झारी( पीने का पानी रखने के लिए लकड़ी का बर्तन) हमेशा उनके पास होता था। ज्ञानदास साहेब ने उमरी(कटंगी) में अपनी पुत्री के यहाँ 17 जून 1968 को अपना शरीर छोड़ा था।

ज्ञानदास साहेब के गुरु का नाम रामदास साहेब था.रामदास साहेब की कबीर गुरु-गद्दी समनापुर थी। समनापुर काफी बड़ा कस्बा है।  यह गोंदिया-बालाघाट रेलवे रूट पर स्थित है। बताया जाता है, रामदास साहेब रिटायर्ड पुलिस आफिसर थे.

 ज्ञानदास साहेब का जन्म हिरकने परिवार में हुआ था। उनकी तीन संतान थी। पुत्र का नाम हाऊसिदास तथा हंसा और सेवंता नामक दो पुत्रियाँ थी। सेवंता, उमरी के गढ़पाल परिवार में ब्याही गई थी। सेवंता की पुत्री का विवाह कटंगी के एक समृध्द परिवार, देवाजी चिचखेड़े के साथ हुआ था। देवाजी चिचखेड़े का बाप-दादाओं से लम्बा-चौड़ा कारोबार है।  उनके पास खेती के आलावा आज भी दो आयल मिलें,राईस मिल और आटा चक्की हैं।

 रात्रि में चर्चा के दौरान मिसेज चिचखेड़े ने उस दिलचस्प वाकया का बयां किया, जिसे मैंने अपने गुरु जी से कई बार सुना था। ज्ञानदास साहेब को अपनी देह छोड़ने का पूर्वाभास् हो गया था। उन्होंने अपने अन्तिम संस्कार से सम्बन्धित सारी तैयारियां खुद अपने सामने करवाई। यहाँ तक की डोली भी तैयार करवाई थी।  संत परम्परा में शव को अर्थी में न ले जा कर डोली में समाधि अवस्था में बैठे हुए भजन-मंडळी के साथ ले जाया जाता है। मिटटी भी समाधि अवस्था में बैठे हुए दी जाती है।

बालकदास साहेब वगैरे एक दिन पहले ही उनके दर्शन कर जा चुके थे। उनके प्रिय अन्य दो महंत कल्याणदास साहेब और सुखरामदास साहेब भी जा चुके थे। यद्यपि, बालकदास साहेब को, साहबजी काफी रोक रहे थे किन्तु, कोई जरुरी कार्य-वश उन्हें जाना पड़ा था। समय को सन्निकट देख साहेबजी को चिंता होने लगी। उन्होंने सेवंता को पास में बुलाया और कुछ अस्पष्ट शब्दों में कहा- सेवंता, मुझे मुक्ति कौन देगा ? सेवंता भी संत की बेटी थी।  उसने तुरंत आगे बढ़ कर दृढ  शब्दों में कहा- पिताजी, मुक्ति मैं दूंगी। ज्ञानदास साहेब तब, उस अवस्था में भी मुस्करा दिए थे। सनद रहे, संत परम्परा में, देह-त्याग के पहले मनासन्न संत/साधू के कान में एक खास मन्त्र पढ़ कर फूंक मारनी पड़ती है। तभी वह सांसारिक बधनों से मुक्त होता है,ऐसा कहा जाता है और यह काम कोई योग्य-उत्तराधिकारी ही करता है। 

kabir Ashram damakheda

कबीर आश्रम दामाखेड़ा-  












कबीर मेला रायपुर-






भिक्षु जगदीश काश्यप

भिक्षु जगदीश काश्यप( 1908-1976)

भिक्षु जगदीश कश्यप, भदन्त आनंद कौसल्यायन व महापण्डित राहुल सांकृत्यायन के समकालीन। आपने बौध्द साहित्य समृध्द करने के साथ साथ कई संस्थाओं का निर्माण भी किया था।

भदन्त जगदीश कस्सप पालि भाषा और साहित्य के बेजोड़ पण्डित हुए। पालि व्याकरण के क्षेत्र में उनका कार्य अप्रतिम है। उनके प्रमुख ग्रंथ नागरी लिपि में 41 भागों में संपादित और प्रकाशित सम्पूर्ण पालि तिपिटक, पालि महाव्याकरण, तर्क शास्त्र (आगमन), तर्क शास्त्र( निगमन), अभिधम्म फिलास्फी, पालि निस्सेनी(लघु पालि व्याकरण) , बुध्दिज्म फार एवरीबडी, बुध्दिस्ट आऊटलुक, पालि त्रि-पिटक सद्दानुक्कमणिका, दीघनिकाय (हिन्दी व्याकरण), संयुत्तनिकाय (हिन्दी अनुवाद भाग-2), मिलिन्द प्रश्न आदि।

भदन्तजी का जन्म 2 मई 1908 का रांचीे, बिहार (वर्तमान में झारखंड)के एक कायस्थ परिवार में हुआ था। इनके बचपन का नाम जगदीश नारायण था। जगदीश नारायण के पिता श्याम नारायण रांची कोर्ट में कर्मचारी थे। जगदीश नारायण ने सन् 1929 में पटना कालेज से बी. ए. किया था। तत्पश्चात इन्होने बनारस हिन्दू विश्वद्यिालय से दर्शन शास्त्र में एम. ए. किया।

प्रारम्भ में जगदीश नारायण आर्य समाज से जुड़े थे। वर्ष 1931-33 में आपने गुरुकुल संस्कृत विद्यापीठ में प्राचार्य के पद पर कार्य किया था। वे बलिष्ट कद-काठी और रोबदार व्यक्तित्व के धनी थे। किन्तु शीघ्र ही गुरूकुल के संगठन से उनका मोह भंग हो गया। उन्होंने देखा कि आर्य-समाजी सामाजिक-संबंधों में अपनी जाति से मुक्त नहीं हो पाए थे।

इस बीच उनका रुझान धम्म की ओर बढ़ने लगा। बौध्द धर्म में उच्चतर अध्ययन के लिए काशी के डॉ. भगवान दास और आर्य समाजी गुरू अयोध्या प्रसाद ने उन्हें बतलाया कि इसके लिए उन्हें मूल पालि में ति-पिटक का अध्ययन करना होगा। उन्हें समझते देर नहीं लगी कि इस हेतु उन्हें सिरिलंका ही जाना होगा। जगदीश नारायण ने सिरिलंका के विद्यालंकार परिवेण के विहार प्रमुख को पत्र लिखा। शीघ्र ही उन्हें इसका विहार प्रमुख पूज्य भंते धम्मानंद महाथेर की ओर से पत्र मिला। यह पत्र राहुल सांस्कृत्यायन का था। राहुल सांस्कृत्यायन ने उन्हें सलाह दी थी कि वह उनके भारत आगमन पर उनसे मिले।

राहुल सांस्कृत्यायन जब बौध्द ग्रंथों की की तिब्बति पांडुलिपियों का विशाल संग्रह लेकर भारत आए तब जगदीश नारायण ने उनसे मुलाकात की। यह विपुल बौध्द साहित्य प्राचीन काल में नालंदा महाविहार से ही तिब्बत और अन्य देशों में गया था। जगदीश नारायण यह सब देख कर काफी प्रभावित हुए। उन्हें  लगा कि नालंदा को फिर से वही स्थान देने के लिए क्यों न काम किया जाए। उन्होंने राहुलजी अपने मन की बात बतायी।
एक दिन राहुल सांस्कृत्यायन ने जगदीश नारायण का ध्यान कालामों को बुध्द के उपदेश की ओर खींचा  जिसमें बुध्द ने कहा था कि उनकी बात को केवल इसलिए ही स्वीकार कर लेना चाहिए क्योंकि यह उन्होंने कही है। उसके बारे में आश्वत होने के बाद ही उसे स्वीकार या अस्वीकार करना चाहिए। जगदीश नारायण पर इसका गहरा प्रभाव पड़ा।

जगदीश नारायण के माता-पिता उनके विवाह न करने के निर्णय से वैसे ही क्षुब्ध थे, किन्तु जब उन्हें यह जब पता हुआ कि वह अध्ययन के लिए सिरीलंका जा रहे हैं, तो उन्हें भारी आघात लगा। सन् 1934 में में जगदीश नारायण ने सिरिलंका में रह कर पूज्य महाथेरो धम्मानंद से प्रवज्या ली थी। दीक्षित होने के बाद आपका नाम भिक्खु जगदीश काश्यप हो गया। सिरिलंका विद्यालंकार परिवेण से आपने ‘ति-पिटकाचार्य’ की उपाधि प्राप्त की। पालि का अध्ययन करने के बाद आपने बौध्द ग्रंथों पर लिखना आरम्भ किया।

इसी बीच राहुलजी के साथ भिक्षु जगदीश काश्यप ने जापान की यात्रा की। किन्तु भारत में गांधीजी के असहयोग आन्दोलन में भाग लेने के कारण उन्हें आगे जाने नहीं दिया गया। वे पेनांग में ही रुक कर पालि ग्रंथों  के अनुवाद के साथ-साथ चीनी सीखने लगे। यही पर उन्होंने ‘दीघनिकाय’ और ‘मिलिन्द पन्ह' के हिन्दी अनुवाद की पांडुलिपि छपने के लिए भारत भेज दी। पेनांग में काश्यप जी लगभग एक वर्ष रुके थे। बौध्द पंडित के रूप में उनकी काफी ख्याति फैली।

काश्यपजी को ‘आनापान सतिपट्ठान (विपस्सना साधना) का अच्छा खासा अभ्यास था। आपने काफी समय बौध्द योग साधना में बिताया। वे इसमें और उच्चतम अवस्था प्राप्त करना चाहते थे। जबकि राहुल सांस्कृत्यायन और भदन्त आनन्द कौसल्यायन चाहते थे कि उन्हें बुध्द की तरह चारिका करते हुए धम्म प्रचार करना चाहिए। किन्तु भिक्खु जगदीश काश्यप अपने दोनों गुरू भाईयों की सलाह को दरकिनार कर एक वर्ष शालागल जंगल में ‘सतिपट्ठान’ का उच्चतम अभ्यास करते रहे। वे वर्ष 1936 के अंत में भारत लौट आए।
भिक्खु जगदीश काश्यप वर्ष 1937 में सारनाथ की महाबोधी सोसायटी के सम्पर्क में आए। महाबोधि सोसायटी के महासचिव देवप्रिय वलिसिंहा के साथ यहां एक स्कूल स्थापित कर दलित वर्ग के बच्चों को पढ़ाया। यहीं से प्रतिदिन वाराणसी विद्यापीठ जाकर आप पालि पढ़ाया करते थे।

पूज्य भंते जगदीश काश्यप ने बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में अध्ययन कार्य किया।उन्होंने न केवल संस्कृत विभाग में पालि पढ़ाई अपितु दर्शन विभाग में बौध्द तर्कशास्त्र का अध्यापन किया। उन्होंने वहां पालि और बौध्द धर्म के अध्ययन को प्रारम्भ करने का प्रयास किया।

वर्ष 1947 में जब भारत स्वतंत्र हुआ तो नालंदा के गौरव को फिर से स्थापित करने के पूर्व संकल्प की ओर उनका ध्यान गया। वर्ष 1949 में बनारस से त्याग-पत्र देकर नालन्दा आ गए। वे बिहार में पैदा हुए थे और बिहार के माटी का कर्ज उन्हें झकजोर रहा था। बुध्द की जहां-तहां बिखरी मूर्तियां उनसे सवाल कर रही थी। बिहार की स्थानीय भाषा उन्हें पालि के अत्यन्त निकट जान पड़ी। जगदीश काश्यप ने लोगों को इस सत्य से अवगत कराया कि विहारों से पटे पड़े रहने के कारण ही प्रदेश का नाम विहार पड़ा था। नालंदा के निकट ‘सारि-चक’ गांव सारिपुत्त के नाम पड़ा था।

नालंदा के खंडहर जगदीश काश्यप को आमंत्रित कर रहे थे कि वे उसके स्वर्णीम गौरव को पुनः स्थापित  करने में वे पहल करें। काश्यपजी ने नालन्दा विश्वविद्यालय (खण्डहर) के पास मुस्लिम भाईयों से जमीन लेकर आपने नव-नालन्दा विश्वविद्यालय की स्थापना की। दरअसल, प्राचीन नालंदा विश्वद्यिालय के खंडहरों की निकटवर्ती भूमि इस्लामपुर रियासत के मुस्लिम जमींदार की थी। एक दिन भंतेजी चारिका करते जमींदार की डेहरी पर पहुंचे। भिक्षा-पात्र आगे करते हुए भंतेजी ने जमींदार से कहा- ‘आपके पूर्वजों पर नालंदा को जलाकर फूंकने का जो कलंक है, उसे धोने का यह उचित समय है। नालंदा में फिर से उसी स्थान पर पुराने विश्वविद्यालय को खड़ा किया जा रहा है। यह क्षेत्र आपके अधिकार में हैं। भवन के लिए आप जमीन दे दें।’ जमींदार आश्चर्य चकित था। उसने तुरंत भूमि का हुक्मनामा पात्र में डाल कर भंतेजी को प्रणाम किया। भंतेजी ने पुण्यानुमोदन स्वरूप जमींदार को भरपूर आर्शिवचन देकर उनसे विदा ली।

नव-नालंदा विश्वद्यिालय का उद्घाटन 20 नव. 1951 को देश के प्रथम राष्टपति डॉ. राजेन्द्रप्रसाद के हाथों हुआ था। डॉ. राजेन्द्रप्रसाद रूढ़िवादी हिन्दू थे किन्तु पूज्य भंते काश्यपजी उन्हें मनाने में सफल हुए। भंतेजी में बात ही कुछ ऐसी थी। नव-नालंदा विश्वद्यिालय के पुस्तकालय के लिए काश्यपजी ने अकथ परिश्रम किया। भंतेजी नालंदा को श्रमण धर्म और संस्कृति का केन्द्र बनाना चाहते थे। इसलिए उन्होंने बौध्द धर्म के साथ जैन धर्म के दोनों निकायों- श्वेताम्बर और दिगम्बर को नालंदा में स्थापित किया।

पूज्य जगदीश काश्यप के प्रयासों से ति-पिटक के नागरी लिपि में प्रकाशन को भारत सरकार ने स्वीकार किया। सम्पूर्ण ति-पिटक पालि, सिंहली, बर्मी, थाई एवं कम्बोडिया लिपियों में उपलब्ध थे। पालि टेक्स सोसायटी लन्दन ने सम्पूर्ण ति-पिटक को रोमन लिपि में प्रकाशित कर दिया था। किन्तु नागरी लिपि में ति-पिटक उपलब्ध नहीं था। यह वही समय था जब भारत सरकार ने बुध्द के महापरिनिर्वाण के 2500 वीं वर्षगांठ पर बुध्द जयंती मनाने का निश्चय किया था। पूरे ति-पिटक को नागरी लिपि में प्रकाशित करने की भंतेजी की योजना को भारत सरकार ने एक पंचवर्षीय योजना के रूप में स्वीकृति दे दी। आपने ति-पिटक के 41  भागों को अपने अत्यन्त कठिन परिश्रम से सन् 1956 से 1961 की अवधि में प्रकाशित करा दिया।

भदन्त आनन्द कौसल्यायन, राहुल जी को गुरू भाई कहते थे। जबकि अनागारिक धम्मपालधम्मानंद कौसम्बी आपसे ज्येष्ठ थे। जीवन के अंतिम दिनों में भिक्खु जगदीश काश्यप का आश्रय राजगिरी स्थित जापान निर्मित शांति स्तूप हो गया था। यही रहते हुए 28 जन. 1976 को आप परिनिब्बुत्त हुए(संदर्भ- भदन्त आनन्द कोसल्यायन; जीवन और कार्य : मुन्शीलाल गौतम) हैं । 

डॉ. भदन्त आनन्द कौसल्यायन

डॉ. भदन्त आनन्द कौसल्यायन(1905-1988 )

भदन्तजी के बचपन का नाम  हरिनामदास था। आपका जन्म 25/5  जन. 1905 को चंडीगढ़ के पास सुहाना नामक गांव के एक खत्री परिवार में हुआ था। आपके पिता रामसरनदास अम्बाला में हाईस्कूल के हेडमास्टर थे।
हरिनामदास के माता-पिता का देहान्त बचपन में ही हो गया था। उनकी शिक्षा बड़ी कठिनाई में हुई थी।

हरिनामदास के माता-पिता का देहान्त बचपन में ही हो गया था। उनकी शिक्षा बड़ी कठिनाई में हुई थी। इसी बीच हरिनामदास की मुलाकात एक साधू से हुई, जिसका नाम रामोदार दास ( राहुल सांसकृत्यायन ) था। इस साधू ने बालक हरिनामदास को परिव्राजक( श्रामणेर) के कपड़े देते हुए बुध्द का मार्ग अपनाने को कहा। अब हरिनामदास का नाम बदलकर विश्वनाथ हो गया। साधू ने विश्वनाथ को चारिका करते हुए बौध्द तीर्थों की यात्रा करने की सलाह दी। गुरू की आज्ञा का पालन करते हुए विश्वनाथ ने भारत में बौध्द तीर्थों की यात्रा की।

भदन्त जी ने 23 वर्ष की उम्र में सिरिलंका विद्यालंकार विहार के प्रमुख धम्मानंद महास्थविर से प्रवज्या ली। अब विश्वनाथ से उनका नाम आनन्द कौशल्यायन हो गया। अभी उपसम्पदा लिए 5 वर्ष भी नहीं हुए थे कि वे महाबोधी सभा के संस्थापक अनागारिक धम्मपाल के साथ धम्म कार्य से लंदन गए।
भंतेजी स्वदेश आकर फिर धम्म-कार्य में लग गए। सारनाथ में आकर उन्होंने महाबोधी सभा से निकलने वाली पत्रिका ‘धर्मदूत’ का सम्पादन किया। भदन्त जी की प्रवज्या सिरिलंका में हई थी वे अकसर वहां जाते रहते थे। बाबा साहेब आम्बेडकर से उनकी मुलाकात सन् 1950 में सिरिलंका में ही हुई थी। अभिधम्मसंगहो’ जिसे महास्थविर अनिरुध्द ने 11वीं शताब्दी में लिखा था, का अनुवाद आपने किया।

भदन्त जी सन् 1969 में ‘आम्बेडकर समारक समिति’ के निमंत्रण पर  नागपुर आए तो फिर वे यहीं के होकर रह गए। यद्यपि, किन्हीं अज्ञात कारणों से सन् 1982 में उन्हें दीक्षाभूमि छोड़नी पड़ी थी। बाद में भदन्तजी ने बुध्दभूमी महाविहार का निर्माण कर सन् 1985 में उसे अपनी कर्त्तव्य- स्थली बनाया।

अप्रेल 88 में भदन्तजी ने इलाहाबाद हिन्दी साहित्य सम्मेलन की अध्यक्षता की थी। 22 जून 1988 को इस मनीषी ने इस जहां से विदा ली।

भदन्त जी ने लगभग 60 पुस्तकें लिखी हैं- अंगुत्तर निकाय 4 भागों में, जातक कथा 6 भागों में, महावंस, दर्शन(वेद से मार्क्स तक), क्राति के अग्रदूत; भगवान बुध्द, बौध्द धर्म की महान देन अनात्मवाद, बौध्द धर्म; एक बुध्दिवादी अध्ययन, श्रीलंका, धर्म के नाम पर, मनुस्मृति क्यों जलायी गई ?, अग्नि-परीक्षा किसकी?, हिन्दू समाज किधर?, राम कहानी; राम की जबानी, भगवदगीता की बुध्दिवादी समीक्षा, तुलसी के तीन पात, रामचरितमानस में ब्राह्मणशाही और नारी निन्दा,भगवदगीता और धम्मपद, बाबासाहेब; यदि बाबा न होते, ‘दी बुध्दा एण्ड धम्मा’ का हिन्दी अनुवाद ‘भगवान बुध्द और उनका धर्म’ आदि ( भदन्त आनन्द कौसल्यायन; जीवन और कार्य  :लेखक मुन्शीलाल गौतम)।

अंगुत्तर निकाय का अनुवाद करते समय इसके तिक-निपात में आए ‘कालाम सुत्त’ जिसे उन्होंने ‘ मानव समाज के स्वतंत्रा-चिंतन तथा स्वतंत्र-आचरण का घोषणा-पत्र’ कहा है, की चर्चा करते हुए ग्रंथ की प्रस्तावना में भदन्त आनन्द कौसल्यायन ने लिखा है- इन पंक्यिों का लेखक तो इस सूक्त का विशेष ऋणी है, क्योंकि आज से पूरे 30 वर्ष पूर्व, भगवान का जो उपदेश विशेष रूप उसे उसके त्रिशरण गमन का निमित्त कारण हुआ था, यही वही कालाम सुत्त ही था।

महा पंडित राहुल सांकृत्यायन

महापण्डित राहुल सांकृत्यायन ( 1893-1969)
महा पंडित राहुल सांकृत्यायन का जन्म ब्राह्मण जैसी हिन्दू समाज की उच्च जाति में हुआ था।  किन्तु , उनका सारा जीवन समाज के उपेक्षितों और दबे-कुचलों के लिए धड़का था। वे मार्क्स वादी चिंतन धारा के निष्णांत पंडित, चिन्तक, विचारक और अध्येयता रहे।  विश्व की 26  भाषाओँ के वे ज्ञाता थे।  उन्होंने अपना अधिकांश जीवन घुमक्कड़ी में बिताया।  राहुल संकृत्यायन जैसा घुमक्कड़ साधू और मानव इतिहास का अध्येयता आपको शायद ही मिले।

राहुलजी का जन्म 9 अप्रेल 1893 को हुआ था। उनके बचपन का नाम केदारनाथ था। उनके पिता का नाम गोवर्धन पांडे आजमगढ़ जिला, कनैला गांव के साधारण किसान थे। उनके माता का नाम कुलवंती देवी था।
‘दुनिया देखने के लिए’ केदार 13 वर्ष की अवस्था में घर से भाग गए।  तब उन्होंने छठवी कक्षा ही उत्तीर्ण की थी। वे प्रारम्भ से ही विद्रोही स्वभाव के थे। वे कई बार घर से भागे थे। यात्रा की ललक तथा ज्ञान की भूख उन्हें दुनियां घूमने को उत्साहित करती थी। इस घूमक्कड़ी में उनका सहवास कितने ही बाबाओं और धार्मिक-मठों से हुआ। वे इन मठों में रहकर सिध्दियां प्राप्त करते रहें, किन्तु न तो उन्हें कोई सिध्दि प्राप्त हुई और न ही किसी देवी-देवता ने उन्हें दर्शन दिए।
इस बीच उनकी मुलाकात महान तर्कवादी पंडित रामवतार शर्मा से हुई। उनके प्रोत्साहन से राहुल ने वाराणसी के दयानन्द स्कूल में 7 वीं कक्षा में दाखिला ले लिया। इसी समय छपरा(बिहार) के परसा नामक स्थान के एक मठाधीश महंत लक्ष्मणदास शिष्य की तलाश में बनारस आये थे। सित. 1912 में राहुल महंतजी के शिष्य होकर परसा चले गए। उनका नाम केदारनाथ से बदलकर ‘रामउदार दास’ कर दिया गया।
किन्तु रामउदार दास यहां भी अधिक समय टिक नहीं सकें। ‘ज्ञान की भूख’ और ‘यात्रा की ललक’ ने उन्हें परसा छोड़ने पर विवश कर दिया। इस बार उन्होंने दक्षिण भारत का रुख किया। साधु रामउदार दक्षिण भारत के तीर्थ-स्थलों की यात्रा करते हुए अयोध्या पहुंच गए। यहां उनका सम्पर्क आर्य-समाज के प्रचारकों से हुआ। किन्तु आर्य समाज से भी शीघ्र ही उनका मोह-भंग हो गया।
इसी बीच राहुल सन् 1917 के मध्य लखनऊ के बौध्द भिक्षु बोधानंद के सम्पर्क में आए। उन्हें बुध्द के उपदेशों ने प्रभावित किया। वैदिक दर्शन जो उन्हें नहीं दे सका, शायद वह सब उन्हें बुध्द के दर्शन में मिला था। उन्होंने बुध्द को पढ़ना जारी रखा। 1920 में 27 वर्ष की आयु में पहली बार वे लुम्बिनी गए, जहां बुध्द का जन्म हुआ था। बोधगया गए, जहां बुध्द ने बोधि प्राप्त की थी। राहुल सांस्कृत्यायन ने उन सभी पवित्र-स्थलों की यात्रा की जहां विहार करते बुध्द ने धम्म देसना की थी।
अब राहुलजी ने राजनीति में कदम रखा। भारतीय राष्टीय कांग्रेस के असयोग आन्दोलन में सक्रिय भागीदार की। वे कई बार जेल गए। सन् 1922 के दशक में,  बुध्दगया के बोधिमहाविहार को उसके वैध स्वामियों अर्थात बौध्दों को हस्तांतरित करने की कांग्रेसी नेताओं से आग्रह किया किन्तु इसमें वे सफल नहीं हुए।
राहुल सांस्कृत्यायन सन् 1923 में नेपाल यात्रा पर गए। वहां वे चीन और मंगोलिया से आए बौध्द भिक्खुओं के सम्पर्क में आए। वर्ष 1926 में उन्होंने ‘एक खतरनाक यात्रा’ लद्दाख की किया। लौटते हुए पंजाब में उनकी भेट हरनामदास उर्फ ब्रह्मचारी विश्वनाथ से हुई।
भारत की महाबोधि सोसायटी के पूज्य सिरिनिवास नायक थेरा और डी. वलिसिंहा की सिफारिस पर राहुल सांस्कृत्यायन 16 मई 1927 को सीलोन में विद्यालंकार परिवेण में संस्कृत अध्यापक नियुक्त हुए। इस समय तक राहुल हिंदी, संस्कृत, उर्दू, अरबी, फारसी, तमिल, कन्नड़, अंग्रेजी और फ्रांसीसी भाषाओं का अच्छा ज्ञान अर्जित कर चुके थे। अब उन्होंने पालि पर ध्यान दिया कुछसमय में समूचे तिपिटक ग्रंथों में महारत हासिल कर ली। इसके लिए उन्हें ति-पिटकाचार्य की उच्चतम उपाधि से विभूषित किया गया। इसी बीच उन्होंने सिंहनी भाषा भी सीखी।
राहुल सांस्कृत्यायन के निमंत्रण पर उनके मित्र ब्रह्मचारी विश्वनाथ भी सिरिलंका पहुंच गए। यही पर ब्रह्मचारी विश्वनाथ ने 10 फर. 1928 को धम्म में उपसम्पदा ग्रहण की। अब वे भिक्खु आनन्द कोसल्यायन हो गए।
वर्ष 1929 में राहुल ने उन बौध्द ग्रंथों की खोज के लिए तिब्बत की यात्रा की जो बौध्द धर्म को नेस्तनाबूद करने हिन्दू शासको के साथ-साथ मुस्लिम आतताईयों के आक्रमण के दौर में बौघ्द भिक्खु धम्म-ग्रंथों के साथ जान बचाकर भागे थे।। क्योंकि भारत में यह अप्राप्त थे।
तिब्बत में राहुल सांस्कृत्यायन ने कई प्राचीनतम बौध्द मठों की खोज-खबर ली। उन्होंने कई दुर्लभ  बौध्द ग्रंथों को खच्चरों पर लाद कर भारत लाया। विनय और सूत्र के 108 खंडों वाले कंजूर और विभिन्न अभिधर्म ग्रंथों  के 125 खंडों वाले तंजूर के अतिरिक्त वह 1619 तिब्बति पांडुलिपियां और चित्र भी लाए। यह अनमोल साहित्यिक खजाना उन्होंने पटना म्यूजियम को भेंट कर दिया।
तिब्बत से लौटने पर साधु रामउदार दास ने अपने मित्र भिखु आनन्द कौसल्यायन के गुरू पूज्य एल. धम्मानन्द महानायक थेरा से 20 जुलाई 1930 को धम्म की विधिवत् दीक्षा ली। अब राहुल सांकृत्यायन ने बौध्द धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए ग्रंथ लिखना प्रारम्भ किया। उनका प्रसिध्द ग्रंथ ‘बुद्धचर्या’ वर्ष 1930 में प्रकाशित हुआ। वर्ष 1932 में वे भदन्त आनन्द कौसल्यायन के साथ महाबोधि सोसायटी की ओर लंदन गए।
इसी बीच जगदीश नारायण नामक एक युवक से राहुल सांकृत्यायन से भेट हुई जिन्होंने अगले ही वर्ष सीलोन जाकर विद्यालंकार परिवेण के प्रमुख पूज्य धम्मानंद महानायक थेरा के हाथों धम्म की दीक्षा ली। उनका नाम अब भिक्षु जगदीश काश्यप हो गया था।
कुछ ही दिनों के बाद इस ‘तिकड़ी’ ने बौध्द धर्म के पुनर्जागरण के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनका पहला बड़ा योगदान था- पालि ग्रंथों का हिन्दी में उपलब्ध कराना। इन पुस्तकों के प्रकाशन का भार अनागारिक धम्मपाल द्वारा भारत में स्थापित महाबोधि सोसायटी ने उठाया। इस प्रकार वर्ष 1933 के बाद से धम्मपद, मज्झिम निकाय, विनय पिटक, दीघ निकाय, संयुक्त निकाय, उदान, सुत्तनिपात, जातक और मिलिन्द पह आदि ग्रंथ हिन्दी में उपलब्ध हुए।
इसी बीच राहुल सांकृत्यायन 3 बार तिब्बत हो आए। उन्होंने कई सारे मूल्यवान बौध्द ग्रंथ जो भारत में अनुपलब्ध थे, अपने साथ लाए। इन ग्रंथों की खोज में उन्होंने भारी मेहनत की। यहां ला कर उनमें से कुछ को उन्होंने स्वयं संपादित और प्रकाशित किया। उन्होंने जापान, कोरिया, सोवियत रूस आदि देशों की यात्रा की। इसी बीच सोवियत अकादमी ने उन्हें लेनिनग्राड विश्वविद्यालय में संस्कृत पढ़ाने के लिए आमंत्रित किया। वे नव. 1937 से जन 1938 तक वहां अध्यापन करते रहे। यहां उनकी भेंट एक युवा रुसी महिला लोला(एलेना नार्वेरतोव्ना) से हुई जो भारत-तिब्बति विभाग की सचिव थी। वह महिला राहुल सांकृत्यायन से संस्कृत सिखने लगी तो इस दरम्यान उसने राहुल से विवाह करने की इच्छा प्रगट की। फलस्वरूप राहुलजी को बौध्द भिक्खु के वस्त्र त्यागने पड़े।
रूस से लौटने के बाद राहुल सांकृत्यायन एक फिर राजनीति में कूद पड़े। उन्होंने किसानों के हित में कई आन्दोलन किये। वर्ष 1940-42 के 29 महिने उन्होंने हजारीबाग और देवली की जेलों में काटे। उनके प्रसिध्द ग्रंथ ‘दर्शन-दिर्ग्शन, ‘मानव समाज’ और वोल्गा से गंगा’ प्रकाशित हुए।
जुलाई 1945 में रुसी सरकार ने उन्हें सोवियत संघ आने का निमंत्रण दिया और लेनिनग्राड विश्वविद्यालय में उन्हें संस्कृत का प्रोफेसर नियुक्त कर दिया। इस अवधि (1945 से 1947) में उन्होंने वहां हिन्दी, संस्कृत, तिब्बति और बौध्द तर्कशास्त्र का अध्ययन किया। उनकी पत्नी लोला और पुत्र ईशोर भी लेनिनग्राड में थें। वे अग. 1947 में अकेले ही भारत लौट आए।
वर्ष 1947-48 में राहुल सांकृत्यायन को उन्हें अखिल भारतीय हिन्दी साहित्य सम्मेलन का अध्यक्ष चुना गया। भारत सरकार ने उन्हें संविधान अनुवाद समिति का सदस्य नामजद किया। एक नेपाली महिला कुमारी कमला पेरियार जो उनके टाइप का काम सम्भाले थी, से वर्ष 1950 में उन्होंने विवाह कर लिया।
इस बीच दो खंडों में लगभग 2,000 पृष्ठों में ‘मध्य एशिया का इतिहास’ ग्रंथ उनका प्रकाशित हुआ। इस कृति के लिए उन्हें वर्ष 1958 में साहित्य अकादमी का पुरस्कार मिला।
राहुल सांकृत्यायन असाधारण बुध्दिजीवी और विद्वान थे। उन्हें अनेक भारतीय और विदेशी भाषाओं का ज्ञान था। उन्होंने कई ग्रंथ लिखे। बौध्द धर्म से संबंधित उनकी कृतियां हैं- बुध्दचर्या(1930), धम्मपद(1933), मज्झिम निकाय(1933), विनय पिटक(1934), दीघ निकाय(1935), तिब्बत में बौध्द धर्म(1935), बौध्द दर्शन(1942), महामानव बुध्द(1956), बौध्द संस्कृति। सावत्थि पर उनका एक निबन्ध 1964 में प्रकाशित हुआ। बौध्द इतिहास और धर्म से संबंधित उनकी अन्य महत्वपूर्ण पुस्तकें हैं- वोल्गा से गंगा, दर्शन-दिग्दर्शन, अतित से वर्तमान। इसके अलावा लद्दाख, किन्नौर, श्रीलंका, तिब्बत, चीन और जापान की उनकी यात्राओं के वृतान्त हैं।
राहुल सांस्कृत्यायन ने बौध्द धर्म से संबंधित संस्कृत की जिन कृतियों का संपादन और अनुवाद किया, वे हैं-अभिधर्म कोश(1930), विज्ञिप्तिमात्रता सिध्दि(1934), प्रमाणवार्तिक(1935), अध्यार्घ शतक(1935), प्रमाणवार्तिक भाष्य(1936),  प्रमाणवार्तिक स्ववृति(1936), प्रमाणवार्तित स्ववृति टीका(1937), विग्रहव्यवर्तिनी, वाद न्याय, विनय सूत्रा(1943), हेतु बिन्दू(1944), सम्बंध-परीक्षा(1944), निदान सूत्रा परीक्षा(1951), महापरिनिर्वाण सूत्रा(1951)।
राहुल सांकृत्यायन को उनकी विद्वता के लिए काशी पण्डित सभा ने  उन्हें सन् 1939 में ‘महापण्डित’ की उपाधि से उन्हें नवाजा था। श्रीलंका के विद्यालंकार विश्वविद्यालय ने उन्हें डी. लिट्. की मानद उपाधि से विभूषित किया था। राहुलजी सन् 1959 से 1961 तक श्रीलंका के विद्यालंकार विश्वविद्यालय में दर्शन विभाग के विभागाध्यक्ष रहे। लम्बी बिमारी के बाद इस महापुरुष ने 14 अप्रेल 1963 को 70 वर्ष। की उम्र में अंतिम सांस ली। भारत सरकार ने उन्हें ‘पद्म विभूषण’ से सम्मानित कर उनकी असाधारण विद्वता को स्मरण किया(संदर्भ-1 ‘लेखक परिचय’; बौध्द संस्कृति: राहुल सांकृत्यायन।  2. अनुवादक परिचयः विनय-पिटक)।