Monday, July 6, 2020

दो प्रकार के बुद्धिस्ट

बुद्धिस्ट दो प्रकार के होते हैं-
एक वे जो बौद्ध धर्म को हिन्दू धर्म का स्थानापन्न समझते हैं. उनके लिए बुद्ध वैसे ही 'पूज्य' है, जैसे पहले राम और कृष्ण थे। राम या कृष्ण अथवा हनुमान मंदिर के स्थान में वे अब बुद्धविहार जाते हैं। इनके लिए स्वर्ग-नरक और पाप-पुण्य वैसे ही है, जैसे पहले थे।

दूसरे बुद्धिस्ट वे हैं, जो धर्मांतरण को 'सामाजिक परिवर्तन' के रूप में देखते हैं। वे बुद्ध को असमानता के विरुद्ध  समता का, ऊंच-नीच की घृणा के विरुद्ध मैत्री, करुणा और बंधुत्व-भाव का प्रतीक देखते हैं। इनके लिए, बाबासाहब डॉ अम्बेडकर द्वारा दिखाया गया धम्म का मार्ग सामाजिक परिवर्तन का एक आंदोलन है।

पहले प्रकार के बुद्धिस्ट शांत और आत्म-केन्द्रित  होते हैं। ये विपस्सना केन्द्रों में सम्बद्ध होते हैं। आन्दोलन या परिवर्तन  जैसे शब्द उन्हें 'अस्थिर चित्त के कार्य ' लगते हैं. उनका लक्ष्य अच्छी नौकरी और परिवार होता है।

जबकि दूसरे प्रकार के बुद्धिस्ट परिवर्तन चाहते हैं. अपने विचारों में परिवर्तन,  समाज की रहनी-गहनी में परिवर्तन, उनके जीवन जीने में परिवर्तन। लोक-व्यवहार में परिवर्तन, देश में परिवर्तन। 

पालि भाषा और धम्मलिपि

'कच्चायन व्याकरण' प्राचीनतम है। इसके रचियता कच्चायन है। इनके विषय में अधिक जानकारी प्राप्त नहीं होती है। सनद रहे, बुद्ध(600-500 ई. पू.) के 80 महासावक शिष्यों में एक महाकच्चान भी थे। 'नेतिप्पकरण' और 'पेटकोपदेस' के रचियता भी 'कच्चायन' थे।

कुछ भाषाविद कच्चायन व्याकरण के प्रणयनकार को महान अट्ठकथाकार बुद्धघोस(350 -450 ईस्वी) और धम्मपाल(600 ईस्वी ) के बाद का बताते हैं। कुछ 500 -600 ईस्वी का बताते हैं। कच्चायन व्याकरण के बाद सिंहलद्वीप में ही वहां के शासक पराक्रमबाहु प्रथम (1153-1186)  के समय 'मोग्गल्लान व्याकरण' लिखी गई थी.

सम्राट अशोक(राज्यकाल 272 -232 ई. पू. ) के समय 'धम्मलिपि' में लेख लिखे जाते थे, जो उनके शिलालेखों से प्रमाणित है। निस्संदेह, बुद्धकाल में भी लिपि रही होगी। यद्यपि दुरूह और खर्चीली तकनिकी के चलते चलन में न हो।

बौद्ध सम्राट कनिष्क(80-150 ईस्वी ) के समय चतुर्थ बौध्द संगति कनिष्कपुर (वर्तमान में काश्मीर का कनिस्पुर) में हुई थी। इसमें सुत्तपिटक, विनयपिटक और अभिधम्मपिटक की अट्ठकथाओं को पीतल के पट्टों पर उत्कीर्ण करवा कर पत्थरों के बक्सों में रख एक स्तूप में रखवा दिया गया था (एशिया के महान बौध्द सम्राटः डाॅ. भिक्षु सांवगी मेधंकर )। यह अभी तक अप्राप्त है। यह किस लिपि में लिखा था, खोज का विषय होगा।

पालि साहित्य के अभिलेख साहित्य की काल-सीमा 300 ई. पू से 1500  ईस्वी है। इस में प्रमुख रूप से अशोक के शिलालेख, साँची और भारहुत के अभिलेख, सारनाथ के कनिष्क  कालीन अभिलेख, मोंगन(बर्मा) के 2 स्वर्ण पत्र लेख, बोबोगी पेगोडा(बर्मा) के खंडित शिलालेख, प्रोम के स्वर्ण पत्र, पेगन के 1442 ईस्वी के अभिलेख  तथा कल्याणी अभिलेख का समावेश किया जाता है(पालि साहित्य का इतिहास: कोमलचन्द्र जैन)।

Sadhucariya

Sadhucariya
1. Buddha completely rejected 'Brhma' and its theory.
2. Dr. Ambedkar also rejected it.
3. But, in Ti-Pitaka, Suttas and Verses are mentioning Brhma in various ways.
4. It shows clearly infiltration in Buddha' Teaching.
5. As the Buddhism spread in other countries, it mixed with their, then prevailing culture. Today, what we see there, that is mixed culture.
6. After Ambedkar Conversion, that culture with its associate literature came in India.
7. We Buddhist, take Ti-Saran with Panch/Attha Seela daily.
8. In Attha(Uposath) Seela, we take 'abrahmacariya'(a-brahma-cariya) Veramani, Sikkha Padan Samadiyami".
9. Does word "a-brahma-cariya" right ? Does it reflect Buddhist Culture ? Should  it be part of 'Buddha' Teaching' ? Does 'Brahma' word itself meaning full ? Shouldn't each word of 'Buddha-Vandana' be meaning full, having Buddha Teaching's gravity ?

10. In fact, this is a Brahmin supremacy which control our mind and body. There are thousand of such words which dealt our life. We can not think against them. We can not revolt against them.

11. In 'Buddha's Teaching' specially while Ti-Pitaka was rewritten in Sanskrit, they succeeded to put their 'Brhma term and culture' here and there. Unfortunately, This 'sanskrisation' have been going on since Buddha's time. there are evidences for this.

12. By this supremacy, they not only 'brahmanised' our life but our history also. They named Asoka script as Brahmilipi. How can we say that this is 'Dhammlipi' as written by Asoka himself  ?

13. Buddha, himself said, if something is not meaning full/relevant with time, it must be changed.

14. Prof. Vimalkirti Nagpur, the Pali/Buddhist authority advocates it. We discussed it in wide perspective and agreed for such innovative step.

15. Keeping in mind all concern, and having responsibility to go ahead to restate the Buddha-Sasana, We, in our recent published work 'Dhamma-Parittan'(Samyaka Prakashan Delhi) have suggested some Buddhist word in place of them. We don't say to replace them but we have to think on this.

16. In the discussed Seela, we suggested 'Sadhu' word for that. This is meaning full. 'Sadhu-cariya' is meaning full. 'asadhu'-cariya veramani, sikkha padan samadiyami" is meaning full.

Please don't get irritated against 'change'. Change is life. Change is nature. Student of Ambedkar thought's of School' must take note of this. 

Friday, July 3, 2020

औदंतपुरी (बिहार) और विक्रमशिला(जिला भागलपुर) विश्‍वविद्यालय

यह बुद्ध प्रतिमा पाल वंश के शासन काल में बनी है ।
 शशांक की मृत्यु के बाद 650 से 750 ई. के बीच बंगाल का इतिहास अराजकता तथा अव्यवस्तता से परिपूर्ण था । यह वही शशांक था जिसने बोधिवृक्ष को नष्ट करने का प्रयास किया था । 750ई. में बंगाल में जनता द्वारा गोपाल को चुना गया । जिसने पाल वंश की स्थापना की ।
 पाल साम्राज्य मध्यकालीन "उत्तर भारत" का सबसे शक्तिशाली और महत्वपूर्ण साम्राज्य माना जाता है, जो कि 750 - 1174 ई. तक चला। पाल राजवंश ने भारत के पूर्वी भाग में एक विशाल साम्राज्य बनाया। इस राज्य में वास्तु कला को बहुत बढावा मिला। पाल वंश के सभी राजा बौद्ध थे । पाल राजाओ के समय में बौद्ध धर्म को बहुत संरक्षण मिला । पाल राजाओं ने बौद्ध धर्म के उत्थान के लिए बहुत से कार्य किये जो कि इतिहास में अंकित है। पाल राजाओ ने बौद्ध धर्म को आगे बढ़ने के लिए अनेकों बौद्ध विहारों का निर्माण कराया और शिक्षा के लिए विश्वविद्यालयो का निर्माण कराया ।
 बंगाल में जनता द्वारा गोपाल को सिंहासन पर आसीन किया गया था। गोपाल ने बंगाल को एक स्वतन्त्र राज्य घोषित किया। वह योग्य और कुशल शासक था, जिसने 750 ई. से 770 ई. तक शासन किया। इस दौरान उसने औदंतपुरी (बिहार) में एक बौद्ध मठ तथा विश्वविद्यालय का निर्माण करवाया। पाल शासक बौद्ध धर्म को मानते थे। आठवीं सदी के मध्य में पूर्वी भारत में पाल वंश का उदय हुआ। गोपाल को पाल वंश का संस्थापक माना जाता है
 गोपाल के बाद उसका पुत्र धर्मपाल 770 ई. में सिंहासन पर बैठा। धर्मपाल ने 40 वर्षों तक शासन किया। धर्मपाल बौद्ध धर्मावलम्बी था। उसने अनेकों मठ व बौद्ध विहार बनवाये। धर्मपाल एक उत्साही बौद्ध समर्थक था उसके लेखों में उसे परम सौगात कहा गया है। उसने सोमपुरी प्रसिद्ध बिहारों की स्थापना की। भागलपुर जिले में स्थित विक्रमशिला विश्वविद्यालय का निर्माण करवाया था। उसके देखभाल के लिए सौ गाँव दान में दिये थे।
 धर्मपाल के बाद उसका पुत्र देवपाल गद्दी पर बैठा। इसने अपने पिता के अनुसार विस्तारवादी नीति का अनुसरण किया। इसी के शासनकाल में अरब यात्री सुलेमान आया था। उसने मुंगेर को अपनी राजधानी बनाई। उसके शासनकाल में दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ भी मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध रहे। उसने जावा के शासक शैलेंद्र के आग्रह पर नालन्दा में एक विहार की देखरेख के लिए 5 गाँव अनुदान में दिए।
 देवपाल ने 850 ई. तक शासन किया था। देवपाल के बाद पाल वंश की अवनति प्रारम्भ हो गयी। मिहिरभोज और महेन्द्रपाल के शासनकाल में प्रतिहारों ने पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के अधिकांश भागों पर अधिकार कर लिया। देवपाल की मृत्यु के साथ ही पाल साम्राज्य का गौरव समाप्त हो गया । उसके उत्तराधिकारियों के काल में राज्य का विघटन धीरे-2 होता रहा। देवपाल का उत्तराधिकारी विग्रहपाल था। तीन या चार साल के छोटे शासन काल के बाद विग्रहपाल ने गद्दी त्याग दी।
 पालों की गिरती हुई साख को कुछ हद तक महिपाल प्रथम ने संभाला। महिपाल के शासन काल की सबसे महत्त्वपूर्ण घटना बंगाल पर राजेन्द्र चोल का आक्रमण है। राजेन्द्र चोल के उत्तरी अभियान का विवरण उसके तिरुमलाई शिलालेख में मिलता है। चोल आक्रमण द्वारा बंगाल में उसकी संप्रभुता स्थापित नहीं हो सकी ।
 बंगाल का पाल वंश भारत में अंतिम बौद्ध शासक वंश के रूप में जाना जाता है। बारहवीं शताब्दी में पाल वंश के पतन के साथ बौद्ध धर्म का भी पतन आरंभ हो गया ।
 पाल वंश के शासक
गोपाल (पाल) (750-770)
धर्मपाल (770-810)
देवपाल (810-850)
शूर पाल महेन्द्रपाल (850 - 854)
विग्रह पाल (854-855)
नारायण पाल (855-908)
राज्यो पाल (908-940)
गोपाल 2 (940-960)
विग्रह पाल २ (960-988)
महिपाल (988-1038)
नय पाल (1038-1055)
विग्रह पाल 3 (1055-1070)
महिपाल 2 (1070-1075)
शूर पाल 2 (1075-1077)
रामपाल (1077-1130)
कुमारपाल (1130-1140)
गोपाल 3 (1140-1144)
मदनपाल (1144-1162)
गोविन्द पाल (1162 - 1174)
पाल राजवंश के शासकों ने बंगाल पर 400 से अधिक वर्षों तक राज किया । बौद्ध धर्म के लिए अनेकों बौद्ध विहारों का निर्माण कराया ।
 आज के समय में छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल जो पालवंश से हैं । वो बौद्ध विचारधारा को मानते हैं । उनके पिता आए दिन ब्राह्मणवाद के खिलाफ़ बोलने की वजह से सुर्खियों में रहते हैं ।

'ब्रह्म', बुद्ध और अम्बेडकर

'ब्रह्म', बुद्ध और अम्बेडकर
4. उपनिषद तथा उनकी शिक्षा
9. किन्तु यह कोई उपनिषदों का मुख्य विषय नहीं था। उनकी चर्चा का मुख्य विषय है, ब्रह्म और आत्मा।
10. ब्रह्म हो वह सर्व-व्यापक तत्व है, जो विश्व को बंधे हुए है और आदमी की मुक्ति भी इसी बात में है कि उसके आत्मा को इस बात का बोध हो जाये कि वह भी 'ब्रह्म' है।
11. उपनिषदों की मुख्य स्थापना यही थी कि 'ब्रह्म' ही सत्य है तथा 'आत्मा' और 'ब्रह्म' एक ही है। उपाधि-ग्रस्त होने के कारण ही 'आत्मा' को इस बात का बोध नहीं होता कि वह 'ब्रह्म' है।
12. प्रश्न पैदा हुआ : क्या 'ब्रह्म' एक वास्तविकता है ?  उपनिषदों की सारी स्थापना इसी एक प्रश्न के उत्तर पर निर्भर करती है।
13. बुद्ध को ब्रह्म' की वास्तविकता का कोई प्रमाण नहीं मिला। इसलिए उन्होंने उपनिषदों की स्थापना की अस्वीकार कर दिया (प्रथम कांड: पांचवा भाग :बुद्धा एंड हिज धम्मा )। सादर।