Thursday, August 22, 2019

अधिकारी झालोजी: अशोक भगत


11.9 .18
चाल : सैराट झालं जी
तळपत सूर्य रुपातलखलखता तारा विश्वात
धुरंधर ज्ञान शस्त्रात,  गुलामीवर करण्यास मात
हो असा भांडलाय, भारतामंदी
अन हातामंदी हक्क दिले जी
अधिकारी झालोजी ३

                    
हो संधीच देऊन सारी, हरएक क्षेत्रात भारी
दाविण्या अक्कल हुशारी, तरतूद घटनेत न्यारी
असा मांडलाय, कायदा अटी
अन शिक्षणाची लाट आली जी
अधिकारी झालोजी ३

हो मनुस्मृती जाळलीया, मातीत गाळलीया
विषमता मोडलिया भिमानं ....भिमानं
निर्मिले मानवात, भाऊबंधकीच नात
कोरलया काळजात भिमानं
रुजले बीज समतेचे हृदयी रुजले
पुजले न्याय सत्याचे तत्व पुजले
सरले भूक मारून जगणे सरले
भरले नवचैतन्य अंगी भरले
असा कडाडला , सभागृहामंदी
अन मोकळीच वाट केली जी
अधिकारी झालोजी ३ (१)

लोहाराने लोहारकी, कुंभाराने कुंभारकी,
चांभाराने चांभारकी , सोडले .......सोडले
महारात कमिशनर, कुणब्यात कलेक्टर,
मुस्लीम बॅरिस्टर घडले
घडले भीम किमयाने सारे घडले
लढले भीम समतेच्या साठी लढले
शमले अन्यायाचे वादळ शमले
नमले तव चरणी अशोका नमले
देश बांधीयला, लोकशाही मंदी
अन ज्याचा त्याचा वाटा दिलाजी
अधिकारी झालोजी ३
कवी: अशोक भगत (वणी- यवतमाळ ) 

पुब्बे पापकम्मं कतं(चूळदुक्खक्खन्धसुत्तं)


179.  ‘‘एकमिदाहं, महानाम, समयं राजगहे विहरामि गिज्झकूटे पब्बते। तेन खो पन समयेन सम्बहुला निगण्ठा इसिगिलिपस्से काळसिलायं उब्भट्ठका होन्ति आसनपटिक्खित्ता, ओपक्‍कमिका दुक्खा तिब्बा खरा कटुका वेदना वेदयन्ति।
अथ ख्वाहं, महानाम, सायन्हसमयं पटिसल्‍लाना वुट्ठितो येन इसिगिलिपस्से काळसिला येन ते निगण्ठा तेनुपसङ्कमिं; उपसङ्कमित्वा ते निगण्ठे एतदवोचं – ‘किन्‍नु तुम्हे, आवुसो, निगण्ठा उब्भट्ठका आसनपटिक्खित्ता, ओपक्‍कमिका दुक्खा तिब्बा खरा कटुका वेदना वेदयथाति
एवं वुत्ते, महानाम, ते निगण्ठा मं एतदवोचुं– ‘निगण्ठो, आवुसो, नाथटपुत्तो सब्बञ्‍ञू सब्बदस्सावी अपरिसेसं ञाणदस्सनं पटिजानाति – ‘‘चरतो च मे तिट्ठतो च सुत्तस्स च जागरस्स च सततं समितं ञाणदस्सनं पच्‍चुपट्ठित’’न्ति। 
सो एवमाह – ‘‘अत्थि खो भो निगण्ठा, पुब्बे पापकम्मं कतं, तं इमाय कटुकाय दुक्‍करकारिकाय निज्‍जरेथ. मयं पनेत्थ एतरहि कायेन संवुता वाचाय संवुता मनसा संवुता तं आयतिं पापस्स कम्मस्स अकरणं; इति पुराणानं कम्मानं तपसा ब्यन्तिभावा, नवानं कम्मानं अकरणा, आयतिं अनवस्सवो; आयतिं अनवस्सवा कम्मक्खयो, कम्मक्खया दुक्खक्खयो, दुक्खक्खया वेदनाक्खयो, वेदनाक्खया सब्बं दुक्खं निज्‍जिण्णं भविस्सती’’ति। तञ्‍च पनम्हाकं रुच्‍चति चेव खमति च, तेन चम्ह अत्तमनाति।
१८०. ‘‘एवं वुत्ते, अहं, महानाम, ते निगण्ठे एतदवोचं – ‘किं पन तुम्हे, आवुसो निगण्ठा, जानाथ अहुवम्हेव मयं पुब्बे न नाहुवम्हाति
नो हिदं, आवुसो। 
किं पन तुम्हे, आवुसो निगण्ठा, जानाथ अकरम्हेव मयं पुब्बे पापकम्मं न नाकरम्हाति?
 ‘नो हिदं, आवुसो
किं पन तुम्हे, आवुसो निगण्ठा, जानाथ एवरूपं वा एवरूपं वा पापकम्मं अकरम्हाति
नो हिदं, आवुसो। 
किं पन तुम्हे, आवुसो निगण्ठा, जानाथ एत्तकं वा दुक्खं निज्‍जिण्णं, एत्तकं वा दुक्खं निज्‍जीरेतब्बं , एत्तकम्हि वा दुक्खे निज्‍जिण्णे सब्बं दुक्खं निज्‍जिण्णं भविस्सतीति
नो हिदं, आवुसो
किं पन तुम्हे, आवुसो निगण्ठा, जानाथ दिट्ठेव धम्मे अकुसलानं धम्मानं पहानं, कुसलानं धम्मानं उपसम्पदन्ति
नो हिदं, आवुसो
‘‘‘इति किर तुम्हे, आवुसो निगण्ठा, न जानाथ अहुवम्हेव मयं पुब्बे न नाहुवम्हाति, न जानाथ अकरम्हेव मयं पुब्बे पापकम्मं न नाकरम्हाति, न जानाथ एवरूपं वा एवरूपं वा पापकम्मं अकरम्हाति, न जानाथ एत्तकं वा दुक्खं निज्‍जिण्णं, एत्तकं वा दुक्खं निज्‍जिरेतब्बं, एत्तकम्हि वा दुक्खे निज्‍जिण्णे सब्बं दुक्खं निज्‍जिण्णं भविस्सतीति। न जानाथ दिट्ठेव धम्मे अकुसलानं धम्मानं पहानं, कुसलानं धम्मानं उपसम्पदं। एवं सन्ते, आवुसो निगण्ठा, ये लोके लुद्दा लोहितपाणिनो कुरूरकम्मन्ता मनुस्सेसु पच्‍चाजाता ते निगण्ठेसु पब्बजन्तीति
 खो, आवुसो गोतम, सुखेन सुखं अधिगन्तब्बं, दुक्खेन खो सुखं अधिगन्तब्बं; सुखेन चावुसो गोतम, सुखं अधिगन्तब्बं अभविस्स, राजा मागधो सेनियो बिम्बिसारो सुखं अधिगच्छेय्य, राजा मागधो सेनियो बिम्बिसारो सुखविहारितरो आयस्मता गोतमेनाति।
‘‘‘अद्धायस्मन्तेहि निगण्ठेहि सहसा अप्पटिसङ्खा वाचा भासिता न खो, आवुसो गोतम, सुखेन सुखं अधिगन्तब्बं, दुक्खेन खो सुखं अधिगन्तब्बं; सुखेन चावुसो गोतम, सुखं अधिगन्तब्बं अभविस्स, राजा मागधो सेनियो बिम्बिसारो सुखं अधिगच्छेय्य, राजा मागधो सेनियो बिम्बिसारो सुखविहारितरो आयस्मता गोतमेना’’ति। 
अपि च अहमेव तत्थ पटिपुच्छितब्बो को नु खो आयस्मन्तानं सुखविहारितरो राजा वा मागधो सेनियो बिम्बिसारो आयस्मा वा गोतमोति? अद्धावुसो गोतम, अम्हेहि सहसा अप्पटिसङ्खा वाचा भासिता, न खो, आवुसो गोतम, सुखेन सुखं अधिगन्तब्बं, दुक्खेन खो सुखं अधिगन्तब्बं; सुखेन चावुसो गोतम, सुखं अधिगन्तब्बं अभविस्स, राजा मागधो सेनियो बिम्बिसारो सुखं अधिगच्छेय्य, राजा मागधो सेनियो बिम्बिसारो सुखविहारितरो आयस्मता गोतमेनाति। अपि च तिट्ठतेतं, इदानिपि मयं आयस्मन्तं गोतमं पुच्छाम को नु खो आयस्मन्तानं सुखविहारितरो राजा वा मागधो सेनियो बिम्बिसारो आयस्मा वा गोतमोति?
‘‘‘तेन हावुसो निगण्ठा, तुम्हेव तत्थ पटिपुच्छिस्सामि, यथा वो खमेय्य तथा नं ब्याकरेय्याथ। तं किं मञ्‍ञथावुसो निगण्ठा, पहोति राजा मागधो सेनियो बिम्बिसारो, अनिञ्‍जमानो कायेन, अभासमानो वाचं, सत्त रत्तिन्दिवानि एकन्तसुखं पटिसंवेदी विहरितुन्ति? ‘नो हिदं, आवुसो
‘‘‘तं किं मञ्‍ञथावुसो निगण्ठा, पहोति राजा मागधो सेनियो बिम्बिसारो, अनिञ्‍जमानो कायेन, अभासमानो वाचं, छ रत्तिन्दिवानिपे॰पञ्‍च रत्तिन्दिवानिचत्तारि रत्तिन्दिवानितीणि रत्तिन्दिवानिद्वे रत्तिन्दिवानिएकं रत्तिन्दिवं एकन्तसुखं पटिसंवेदी विहरितुन्ति? ‘नो हिदं, आवुसो
‘‘‘अहं खो, आवुसो निगण्ठा, पहोमि अनिञ्‍जमानो कायेन, अभासमानो वाचं, एकं रत्तिन्दिवं एकन्तसुखं पटिसंवेदी विहरितुं। अहं खो, आवुसो निगण्ठा, पहोमि अनिञ्‍जमानो कायेन, अभासमानो वाचं, द्वे रत्तिन्दिवानितीणि रत्तिन्दिवानिचत्तारि रत्तिन्दिवानिपञ्‍च रत्तिन्दिवानिछ रत्तिन्दिवानिसत्त रत्तिन्दिवानि एकन्तसुखं पटिसंवेदी विहरितुं। तं किं मञ्‍ञथावुसो निगण्ठा, एवं सन्ते को सुखविहारितरो राजा वा मागधो सेनियो बिम्बिसारो अहं वाति? ‘एवं सन्ते आयस्माव गोतमो सुखविहारितरो रञ्‍ञा मागधेन सेनियेन बिम्बिसारेना’’’ति।
इदमवोच भगवा। अत्तमनो महानामो सक्‍को भगवतो भासितं अभिनन्दीति।
चूळदुक्खक्खन्धसुत्तं निट्ठितं चतुत्थं।

थेरीगाथा: उदय प्रकाश अरोड़ा (JNU)

थेरीगाथा
बुद्ध के समय एक काव्य ग्रंथ थेरीगाथालिखा गया था। थेरी का अर्थ है भिक्षुणी। थेरीगाथा अर्थात भिक्षुणियों की गाथाएं। इन भिक्षुणियों को थेरियां भी कहा गया। यह काव्य ग्रंथ बौद्ध त्रिपटक साहित्य का हिस्सा माना जाता है। कुल 494 कविताओं से युक्त इस रचना के निर्माण में 110 भिक्षुणियों का योगदान रहा।
बुद्ध के समय ये कविताएं मगधी भाषा में प्रचलित थी। फिर उनका रूपांतरण पाली भाषा में किया गया। विश्व की यह पहली रचना है, जो महिलाओं की कविताओं के संकलन के रूप में है। थेरीगाथा से पहले भारतीय इतिहास में महिलाओं को अपनी व्यथा का वर्णन इतनी निर्भिकता और खुलेपन के साथ प्रकट करते नहीं देखा गया। इसे नारी स्वतंत्रता का मार्ग प्रशस्त करने वाले ग्रंथ के तौर पर देखा गया।
थेरीगाथा का सिलसिला कायम रहता तो शायद आज भारत में महिलाओं की हैसियत कहीं बेहतर होती। जिस आत्मविश्वास के साथ थेरियों ने पितृसत्तात्मक समाज में नारी पीड़ा का वर्णन किया वैसा प्राचीन विश्व साहित्य में अन्यत्र नहीं मिलता। अपनी आपबीती बयान करते हुए इन थेरियों में किसी प्रकार की लाचारी और पीड़ित होने का भाव नहीं था। यौन उत्पीडन पर बोलते हुए किसी भी थेरी में अपराध का बोध नहीं था। अपनी गोपनीय से गोपनीय बात को खुलकर कहने में उन्हें कोई हिचक न थी। अपने जीवन की उत्कृष्टता के लिए जितने बड़े क्रांतिकारी आंदोलन का सुत्रपात इन थेरियों द्वारा किया गया था वह मिसाल बना। इसके चलते सार्वजनिक जीवन में महिलाओं के लिए अवसर बढ़े।
थेरियां किसी एक वर्ग, जाति या इलाके से नहीं थीं। वे तत्कालीन सभी वर्गों, जातियों और इलाकों का प्रतिनिधित्व करती थीं। थेरी मैत्रिका का जन्म बिहार के बहुत धनवान ब्राह्मण के घर में हुआ था। थेरी अर्द्धकाशी वाराणसी के धनी सेठ की कन्या थी। थेरी विमला वैशाली की वैश्या की कन्या थी। सामा और अपरासामा कौशांबी के राजकुल से थीं। पद्मावती उज्जैन की गणिका थी। थेरी पुण्णिका दासी की पुत्री थी।
रानी यशोधरा और गौतमी सहित शाक्य वंश की लगभग सभी स्त्रियां भिक्षुणी हो गई थी।
भिक्षुणी बनने के बाद सभी थेरियां समान होती थीं। कोई ऊंच-नीच नहीं।
ऐसा माहौल बुद्ध की पहल और प्ररेणा से बना। थेरीगाथा के जरिए बुद्ध ने एक बड़ा क्रांतिकारी कदम उठाया था। उस समय महिलाओं को समानता और सम्मानजनक स्थान दिलाने का एक ही रास्ता था और वह था उनका थेरी संघ में प्रवेश। इन महिलाओं के थेरी संघ में प्रवेश के अलग-अलग कारण थे, पर सभी किसी न किसी कारण दुखी थीं। तथागत के विचार पिड़ित स्त्रियों के जीवन में कितनी उम्मीदें जगाते हैं, इसका पता इन थेरियों की कविताओं से लगता है। अनेक अत्याचार सहने के बाद भी इनके जीवन में कहीं भी निराशा नहीं थी।
थेरी संघ में धनी और राजघराने की महिलाएं भी थीं। उनकी अपनी अलग तरह की समस्या थी। भोग-विलास को इन्होंने सच्चा जीवन समझा था। उनकी अज्ञानता का लाभ उठाकर पुरोहित वर्ग ने उन पर वर्चस्व स्थापित कर लिया था। बुद्ध के वचन सुनने के बाद वे मिथ्या मान्यताओं और शोषण से बच गई।

थेरीगाथा की थेरियां जिन विषयों पर विमर्श करती हैं वे आज भी प्रासंगिक हैं। मातृत्व, संतानहीनता, वृद्धावस्था, उपेक्षा, तिरस्कार, आदि पर वे बड़े विस्तार से चर्चा करती थींभौतिकवाद को अस्वीकार करते हुए वे थेरी संघ के मैत्रीभाव और सहयोग से युक्त सरल, त्यागमय जीवन को अपनातीं थी। असमानता, शोषण और धर्मतंत्र के विरुद्ध संघर्ष छेड़ने वाली उनकी कविताओं में वो ताप है वह आज भी समाज में महिलाओं की सम्मानजनक स्थिति स्थापित करने के लिए एक आदर्श उदाहरण है।
लेखक : उदय प्रकाश अरोड़ा, पुर्व ग्रीक चेयर प्रोफेसर, जेएनयू
response@jagran.com

पुराने ज़ख्म का इलाज नया ज़ख्म है यहां!

पुराने ज़ख्म का इलाज नया ज़ख्म है यहां!

तुम उसके पास दांत का दर्द लेकर पहुंचे,

उसने तुम्हारा कान उखाड़ दिया,
अब तुम कान को लेकर चीख रहे हो!
इस चीख में तुम्हारे दांत का दर्द दब गया है,
पहले दर्द की जगह
एक दूसरे दर्द ने ले ली है।

दूसरे की तीव्रता इतनी है
कि पहले सभी दर्द बौने पड़ गए हैं
तुम्हारे पास दर्द से कराहने के लिए
अब एक नया और ताज़ा ज़ख्म है
अब तुम उसका इलाज तलाश रहे हो,
पुराने दर्द और ज़ख्म
बगैर इलाज के ही ठीक मान लिए गए हैं
या पीछे धकेल दिए गए हैं
या उनके उपचार ढूंढने की
अब फुरसत ही नहीं तुम्हारे पास।

अब तुम
ताज़े ज़ख्म से बहते खून को रोकने में व्यस्त हो,
इलाज भी बाद में ढूंढोगे,
जब तुम इस ताज़े ज़ख्म का
इलाज खोजने में कामयाब होंगे
या इलाज के बिल्कुल निकट होंगे
ठीक उसी वक्त
फिर तुम्हें
एक नया ज़ख्म दिया जाएगा।

वह नया ज़ख्म फिर
तुम्हारे इस ताज़े ज़ख्म की
तीव्रता को कम कर देगा
या ज़ख्म के उपचार को गुमा देगा,
तुम फिर नए ज़ख्म से रक्त पौंछते हुए
उसके उपचार की तलाश में मशगूल हो जाओगे,
पुराने जख्म किसी अनसुलझे केस की तरह
बग़ैर उपचार,
इतिहास की गहरी खाई में जमा होते रहेंगे,
जिनकी सुध न तुम कभी ले सकेगो
न कोई और।

उपचार के लिए न तुम्हारे पहले ज़ख्म थे
न आज के जख्म हैं
और न कल के ज़ख्म होंगे!
तुम्हारे हर ज़ख्म का इलाज
एक नया ज़ख्म बना दिया गया है
जो तुम्हें खाते जाना है,
नए जख्मों पर रोते जाना है,
पुराने जख्मों को भुलाते जाना है,
कि इस व्यवस्था में
हर पुराने ज़ख्म का इलाज
एक नया ज़ख्म है।।
- अमित धर्मसिंह

शहीद उधम सिंह

शहीद उधमसिंह 
उधमसिंह महान क्रन्तिकारी थे जिनका जन्म शेर सिंह के नाम से 26 दिसम्बर 1899 को सुनम, पटियाला, में हुआ था। उनके पिता का नाम टहलसिंह था और वे पास के एक गाँव उपल्ल रेलवे क्रासिंग के चौकीदार थे। सात वर्ष की आयु में उन्होंने अपने माता पिता को खो दिया जिसके कारण उन्होंने अपना बाद का जीवन अपने बड़े भाई मुक्तासिंह के साथ 24 अक्टूबर 1907 से केंद्रीय खालसा अनाथालय Central Khalsa Orphanage में जीवन व्यतीत किया।
दोनों भाईयों को सिख समुदाय के संस्कार मिले अनाथालय में जिसके कारण उनके नए नाम रखे गए। शेरसिंह का नाम रखा गया उधमसिंह और मुक्त सिंह का नाम रखा गया साधूसिंह। साल 1917 में उधमसिंह के बड़े भाई का देहांत हो गया और वे अकेले पड़ गए।

उधम सिंह ने अनाथालय 1918 को अपनी मेट्रिक की पढाई के बाद छोड़ दिया। वो 13 अप्रैल 1919 को, उस जलिवाला बाग़ हत्याकांड के दिल दहका देने वाले बैसाखी के दिन में वहीँ मजूद थे। उसी समय General Reginald Edward Harry Dyer ने बाग़ के एक दरवाज़ा को छोड़ कर सभी दरवाजों को बंद करवा दिया और निहत्थे, साधारण व्यक्तियों पर अंधाधुंध गोलियां बरसा दी। इस घटना में हजारों लोगों की मौत हो गयी। कई लोगों के शव तो कुए के अन्दर से मिले।

इस घटना के घुस्से और दुःख की आग के कारण उधमसिंह ने बदला लेने का सोचा। जल्दी ही उन्होंने भारत छोड़ा और वे अमरीका गए। उन्होंने 1920 के शुरुवात में Babbar Akali Movement के बारे में जाना और वे वापस भारत लौट आये। वो छुपा कर एक पिस्तौल ले कर आये थे जिसके कारण पकडे जाने पर अमृतसर पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया था। इसके कारण उन्हें 4 साल की जेल हुई बिना लाइसेंस पिस्तौल रखने के कारण। 

जेल से छुटने के बाद इसके बाद वे अपने स्थाई निवास सुनाम Sunam में रहने के लिए आये पर वहां के व्रिटिश पुलिस वालों ने उन्हें परेशां किया जिसके कारण वे अमृतसर चले गए। अमृतसर में उधमसिंह ने एक दुकान खोला जिसमें एक पेंटर का बोर्ड लगाया और राम मुहम्मदसिंह आजाद के नाम से रहने लगे Ram Mohammad Singh Azad. उधमसिंह ने यह नाम कुछ इस तरीके से चुना था की इसमें सभी धर्मों के नाम मौजूद थे।

उधम सिंह भगत सिंह के कार्यों और उनके क्रन्तिकारी समूह से बहुत ही प्रभावित हुए थे। 1935 जब वे कश्मीर गए थे, उन्हें भगत सिंह के तस्वीर के साथ पकड़ा गया था। उन्हें बिना किसी अपराध के भगतसिंह का सहयोगी मान लिया गया और भगतसिंह को उनका गुरू । उधमसिंह को देश भक्ति गीत गाना बहुत ही अच्छा लगता था और वे रामप्रसाद बिस्मिल के गीतों के बहुत शौक़ीन थे जो क्रांतिकारियों के एक महान कवि थे।

कश्मीर में कुछ महीने रहने के बाद, उधमसिंह ने भारत छोड़ा। 30 के दशक में वे इंग्लैंड गए। उधमसिंह जलियावाला बाग हत्या कांड का बदला लेने का मौका ढूंढ रहे थे। यह मौका बहुत दिन बाद 13 मार्च 1940 को आया.

उस दिन काक्सटन हॉल, लन्दन Caxton Hall, London में ईस्ट इंडिया एसोसिएशन East India Association और रॉयल सेंट्रल एशियाई सोसाइटी Royal Central Asian Society का मीटिंग था। लगभग शाम 4.30 बजे उधम सिंह ने पिस्तौल से 5-6 गोलियां सर माइकल ओ द्व्येर Michael O’Dwyer पर फायर किया और वहीं उसकी मौत हो गयी।
इस गोलीबारी के समय भारत के राज्य सचिव को भी Secretary of State for India चोट लग गयी जो इस सभा के प्रेसिडेंट President थे। सबसे बड़ी बात तो यह थी की उधमसिंह को यह करने का कोई भी डर नहीं था। वे वहां से भागे भी नहीं बस उनके मुख से यह बात निकली की मैंने अपने देश का कर्तव्य पूरा कर दिया.

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अप्रैल, 1940, को उधमसिंह को जर्नल डायर Michael O’Dwyer को हत्यारा माना गया। 4 जून 1940 को पूछताच के लिए सेंट्रल क्रिमिनल कोर्ट, पुराणी बरेली Central Criminal Court, Old Bailey में रखा गया था हालांकि उन्हें जस्टिस एटकिंसन Justice Atkinson के फांसी की सजा सुना दी थी। 15 जुलाई 1940 में एक अपील दायर की गयी थी उन्हें फांसी से बचाने के लिए परन्तु उसको ख़ारिज कर दिया गया। 31 जुलाई 1940 को उधमसिंह को लन्दन के Pentonville जेल में फांसी लगा दिया गया.
1975 में भारत सरकार, पंजाब सरकार के साथ मिलकर उधमसिंह के अस्थियों को लाने में सफल हुई। उनको आदरांजलि देने के लिए लाखों लोग जमा हुए थे।