Thursday, April 19, 2018

'जयभीम' सम्बोधन में प्रणेता बाबू एन. एल. हरदास

Babu hardas.jpgबाबू एन. एल. हरदास( 1904 -1939)

हम उसी को याद करते हैं, जो इतिहास का निर्माण करते हैं। ‘जयभीम’ शब्द जो आज परस्पर सम्बोधन का पयार्यवाची बन गया है, के प्रणेता बाबू हरदास थे। यह वही शख्सीयत थे, जिन्होंने इस सम्बोधन का पहली बार भरी सभा में प्रयोग कर इतिहास का निर्माण किया था। जैसे हिन्दुओं में ‘नमस्कार’, मुस्लिमों में ‘आदाब-अर्ज’ और ईसाईयों में ‘गुड-मार्निंग’ का सम्बोधन प्रचलित हैं, ठीक उसी प्रकार दलित और बुद्धिस्टों में ‘जयभीम’ का जयघोष प्रचलित है।

बाबू एन. एल. हरदास, मध्य भारत और बरार (विदर्भ ) में दलित समाज के लोकप्रिय नेता थे। वे आल इण्डिया डिप्रेस्ड कास्ट्स फेडरेशन के कार्य कारिणी के सदस्य थे। वे प्रांतीय बीडी मजदूर संघ के सेक्रेटरी भी थे।  वे स्वतंत्र मजदूर पक्ष (Independent Lab our Party) के जनरल सेक्रेटरी और बाद में अध्यक्ष नियुक्त किये गए थे। वे बाबासाहब के विश्वास पात्र थे।

अफसोस है, बाबू हरदास लम्बी उम्र नहीं जी सकें। वे मात्रा 35 वर्स की अल्पायु में ही चल बसे थे। किन्तु इतने कम समय में वे इतना काम कर गए कि लोग उनका नाम लेना गर्व का सबब समझते हैं। सच है, इतिहास गढ़ने के लिए लम्बी उम्र की दरकार नहीं होती?

बाबू हरदास का जन्म जन. 6, 1904 को कामठी (नागपुर) महाराष्ट्र के महार परिवार में हुआ था। उनके पिता लक्ष्मणराव नगरारे रेल्वे में क्लर्क के पद पर थे। हरदास ने मेट्रिक की पढ़ाई सन् 1920 मेें पटवर्धन हाई स्कूल नागपुर से उत्तीर्ण की थी। हरदास की पत्नी का नाम सहुबाई था। इनका विवाह 16 वर्ष की उम्र में हुआ था।

हरदास ने 17 साल की उम्र में दलित समाज में सामाजिक चेतना जाग्रत करने के लिए सन् 1921 में ‘महारठा’ नामक साप्ताहिक का प्रकाशन नागपुर में शुरू किया। काम बीड़ी कामगारों का शोषण रोकने यह बाबू हरदास ही थे जिसने कोऑपरेटीव आधार पर बीड़ी बनवाने की व्यवस्था आरम्भ की। आपने दलित महिलाओं को इस हेतु  ट्रेनिंग देने के लिए नागपूर में एक महिला आश्रम स्थापित किया था।

बाबू हरदास ने महार समाज को संगठित करने के निमित्त सन् 1922 में एक संगठन तैयार किया था। वे इसके महासचिव थे। हिन्दू अत्याचारों से समाज के लोगों की रक्षा करने इन्होंने ‘महार सेवक संघ‘ नामक एक यूवाओं को स्वयं-सेवी संगठन बनाया था। बाबू हरदास चाहते थे कि डिप्रेस्ड कास्ट में जितनी जातियां आती हैं, वे सब एक बेनर के नीचे आएं। दरअसल, वे इन जातियों में उप-जाति की बाधा खत्म करना चाहते थे। सन्त चोखामेला की पुन्य-तिथि के समारोह में वे इन सभी उप-जातियों के लोगों को आमत्रित कर सह-भोज का आयोजन करते थे।
सन् 1923 में बाबू हरदास ने मध्य-प्रान्त और बरार के वायसराय से आग्रह किया था कि विधान-परिषद, डिस्ट्रिक लोकल बोर्ड और नगरपालिकाओं में डिप्प्रेस्ड क्लॉस के लोगों को नामित कर उन्हें प्रतिनिधत्व दिया जाए ताकि विघायिका और कार्यपालिका में उनकी सहभागिता सुनिश्चित हो सकें। सन् 1924 की अवधि में बाबू हरदास ने कामटी और नागपुर में महार समाज के लोगों के लिए कई रात्रि-कालीन विद्यालय खोलें। कामटी में आपने सन्त चोखामेला पुस्तकालय खोला था। वे हर प्रकार के अन्ध-विश्वास, सड़ी-गली परम्पराओं के विरूद्ध थे। इस निमित्त इन्होंने अक्टू. 1924 में ‘मण्डल महात्मे‘ नामक एक पुस्तक लिखकर समाज के लोगों में वितरित की। इसी प्रकार ‘वीर बालक‘ नामक एक नाटक का मंचन भी किया था।

सन् 1927 में बाबू हरदास ने मूर्ति-पूजा के विरूद्ध रामटेक(नागपुर) में एक सभा, किशन फागुजी बन्सोड़ की अध्यक्षता में आयोजित की थी, जो उस समय के प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता थे। इस सभा में हरदास बाबू ने समाज के लोगों को आव्हान किया कि वे मदिर की सीढ़ियों पर लेटना छोड़ दे और साथ ही अम्बादा तालाब के गंदे पानी में न नहाएं। यद्यपि, आपने नाशिक के कालाराम मंदिर-प्रवेश के लिए चल रहे सत्याग्रह में अपनी सहभागिता सुनिश्चित करने अपने आदमियों का एक दल 2 मार्च 1930 को भेजा था।

डिप्रेस्ड क्लासेस की कन्फ्रेन्स जो नागपुर में 8 अग. 1930 को हुई थी, के आयोजन में मुख्य भूमिका बाबू हरदास की थी। सनद रहे, इस कन्फ्रेन्स की अध्यक्षता बाबासाहेब अम्बेडकर ने स्वयं की थी। इस कन्फ्रेन्स में डिप्रेस्ड क्लासेस के लिए ‘पृथक चुनाव’ की मांग का प्रस्ताव पारित हुआ था। कन्फ्रेन्स में ऑल इण्डिया डिप्रेस्ड-क्लासेस फेडेरेशन का गठन हुआ था जिसका अध्यक्ष मद्रास के राव साहेब मूनिस्वामी पिल्लई को बनाया गया था। बाबू हरदास इसके सयुंक्त सचिव निर्वाचित हुए थे।

सन 1930 में ही ‘म. प्र. बीड़ी मजदूर संघ’ की स्थापना हुई थी जिसके सचिव बाबू हरदास और अध्यक्ष रामचन्द्र फुले थे। सन 1932 में ऑल इण्डिया डिप्रेस्ड क्लासेस फेडेरेशन का दूसरा अधिवेशन कामटी 7-8 मई का हुआ था। इस समय फेडरेशन की राष्ट्रीय कार्यकारिणी का चुनाव हुआ था जिसमे वाइस प्रेसिडेन्ट एम. बी. मलिक बंगाल, एलए एन. हरदास को सचिव, स्वामी अच्छूतानन्द लखनउ को संयुक्त सचिव चुना गया था।
 बाबू हरदास सन् 1936 में सीपी. एण्ड बरार के ‘इन्डीपेन्डेन्ट लेबर पार्टी’ के सचिव निर्वाचित हुए थे। आपने सन् 1937 में नागपुर-कामटी सुरक्षित क्षेत्र असेम्बली से चुनाव लड़ा था और निर्वाचित हुए थे। सन् 1938 में आप ‘इन्डीपेन्डेन्ट लेबर पार्टी’ सीपी. एण्ड बरार के अध्यक्ष नामित हुए थे।

जन. 1935 को कामटी में ‘समता संगठन’ की एक बड़ी सभा में बाबू हरदास ने ‘जयभीम’ का नारा दिया था। इसमें ‘भीम’ शब्द बाबासाहेब आम्बेडकर के मूल नाम ‘भीमराव’ को दर्शाता था। इस जयघोष का आशय था- बाबासाहेब भीमरॉव अम्बेडकर की जय हो, विजय हो। सभा द्वारा हर्ष-ध्वनि से अनुमोदन किया गया था कि जो लोग देश में समता, स्वतंत्राता और बन्धुता की स्थापना में विश्वास रखते हैं, वे इनके प्रणेता बाबासाहेब अम्बेडकर का जयघोष इस अभिवादन से करें। यह ऐतिहासिक सत्य है कि ‘जय-भीम’ सम्बोधन जो बुद्धिस्ट-आम्बेडकरियों के बीच मेल-मुलाकात के अवसर पर जयघोष किया जाता है, के प्रणेता बाबू हरदास ही थे जिन्होंने सन् 1937 में इसका सार्वजनिक प्रयोग एक भरी सभा में किया था।

12 जन. 1939 को आपने 35 साल की अल्प अवधि में दलित समाज को अलविदा कर एक ऐसा रास्ता दिखाया जिस पर चलने को समाज का बच्चा-बच्चा गर्व की अनुभूति करता है।

उनके निधन से समाज की अपूर्णीय क्षति हुई। बाबू हरदास की शव यात्रा में लाखों लोग शरीक हुए थे।  उन्हें कन्हान नदी के तट पर भारतीय सेना की भूमि पर दफनाया गया था।  तब सेना की और से आब्जेक्शन लिया गया था।  किन्तु बाद में  मिलट्री हेड आफिस जबलपुर से अनुमति ले कर  वहां एक बड़ा स्मारक बनाया गया।  अब इस स्थान पर संक्रांति के दिन विशाल मेला लगता है, जिस में दलित जनता अपने प्रिय नेता को श्रध्दांजलि अर्पित करती है। 

मूलनिवासी संकल्पना


मूलनिवासी संकल्पना

1. सन 1993 में बामसेफ (BAMCEF)  ने 'मूलनिवासी' की संकल्पना स्वीकार की थी । कहा जाता है कि यह संकल्पना बाबा साहेब के उस कोटेशन पर आधारित है जिसमे उन्होंने कहा था कि  'जो कौम अपना भविष्य निर्माण करना चाहती है, वह अपने इतिहास को जाने, अपने इतिहास को पहचाने'।

2. 'मूलनिवासी' वह शब्द है, जो पहचान कराता है कि दुश्मन कौन है और दोस्त कौन है। बिना दुश्मन  की पहचान के लड़ाई तेज नहीं हो सकती। चूँकि, ब्राहमण अपने आप को हिन्दू कहता है और हमारा आदमी भी अपने आप को हिन्दू कहता है, इसलिए दोनों में अंतर जानना जरूरी है।

3. आर्य विदेशी हैं, यह बात प्रमाणित हो चुकी है। वे ही आर्य, अब अपने को 'हिन्दू' कहने लगे हैं।

4. 'बहुजन' शब्द में कुछ कमी है। इसकी संकल्पना जाति  पर आधारित है। जबकि, मूलनिवासी शब्द राष्ट्रवाद पर आधारित है। यह हिन्दुओं के राष्ट्रवाद की सही और सटीक काट है।

5. मूलनिवासियों का धर्म हिन्दू नहीं है। क्योंकि, गुलाम का धर्म और गुलाम बनाने वालों का धर्म एक नहीं हो सकता।

Wednesday, April 18, 2018

बहुजन समाज पार्टी

Related imageआज, दलित राजनीति का नाम ही 'बहुजन समाज पार्टी' है। बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक मान्य. कांशीराम थे।

1978 में डी  के खापर्डे के साथ मिल कर कांशीराम ने 'बामसेफ' का गठन किया। भारतीय रिपब्लिकन पार्टी नेताओं के गुटबाजी के कारण महाराष्ट्र के बहुत से अनु सूचित जाति-जन जाति के कर्मचारी और अधिकारीयों ने कांशीराम का तन मन और धन से साथ दिया ।

14 अप्रेल 1984 ; डा अम्बेडकर जयंती के दिन मान्य कांशीराम ने 'बहुजन समाज पार्टी' की स्थापना की। उन्होंने अपना कार्य क्षेत्र उ प्र को बनाया। रिपब्लिकन पार्टी में रहते हुए बुद्धप्रिय मौर्य ने उ प्र  काफी काम  था।  किन्तु उनके कांग्रेस में चले जाने के कारण नेतृत्वहीनता के चलते 1969  के बाद यहाँ पार्टी काफी कमजोर हो गई थी।

1989 में हुए नौवें लोक सभा चुनाव में बहुजन समाज पार्टी को 3 सीटें मिली।  ये सीटें थी- उत्तर प्रदेश के बिजनौर से मायावती, आज़मगढ़ से रामकृष्ण और फिल्लौर (पंजाब) से हरभजन लाखा। देश में हुए कुल मतदान में 2. 47 % मत पार्टी को मिले थे। उत्तर प्रदेश विधान सभा में 13 विधायक पहुंचे थे।

Image result for kanshi ram photoजून 1991  के 10  वे लोकसभा चुनाव में बहुजन समाज पार्टी को 2 सीटें मिलीं, किन्तु पार्टी के कई उम्मीदवार दूसरे अथवा तीसरे स्थान पर थे। विजयी दो सीटों में स्वयं कांशीरामजी  उ  प्र के  इटावा (सामान्य) और भीमसिंह पटेल मध्य प्रदेश के रीवा सीट चुन कर आए थे।

उ  प्र  में 1993 के विधान सभा चुनाव में पार्टी को 67  सीटों पर सफलता मिलीं। यहाँ पार्टी का मत प्रतिशत 19. 64 % था। वही,  वर्ष 1996 के लोकसभा चुनाव में 11 सीटों पर सफलता प्राप्त हुई।  इस चुनाव में पार्टी को देश भर के मत प्रतिशत में 4. 2 %  मत मिले थे।  स्पष्ट है, उ प्र के साथ देश के अन्य भागों में बहुजन समाज पार्टी का अच्छा जनाधार बढ़ा था।

इसके 2 वर्ष बाद फर  1998  में 12 वीं लोकसभा के चुनाव में बहुजन समाज पार्टी को यद्यपि  5 सीटें मिलीं जिस में 4 सीटें उ प्र और 1 हरियाणा से थी किन्तु इस चुनाव में पार्टी का मत प्रतिशत 4. 2 से बढ़कर  4. 67 %  हो गया था।

अक्टू  1999 के लोकसभा चुनाव में पार्टी ने 14 सीटों पर सफलता हासिल की थी।  इस में विशेष बात यह थी कि  इस 14 स्थानों में 9 सीटें सामान्य और 5 सीटें आरक्षित थी। पार्टी ने 4. 16% मत प्राप्त कर देश के राजनैतिक  दलों में चौथा स्थान प्राप्त किया था । इस बार खास बात यह थी कि 14 विजयी उम्मीदवारों में  3 मुस्लिम उम्मीदवार थे।

वर्ष 2002 के उ प्र विधान सभा चुनाव में बहुजन समाज पार्टी के 98 उम्मीदवार विजयी हुए जिस में इसका मत प्रतिशत 23. 06%  रहा । मई 2004 में हुए लोकसभा चुनाव में पार्टी को 19 सीटें प्राप्त हुई जिस मत प्रतिशत 5. 33% था।

सन 2007 के उत्तर प्रदेश विधान सभा में बहुजन समाज पार्टी ने कुल 403 सीटों में चुनाव लड़ा और 206 सीटें जीत कर स्पष्ट बहुमत प्राप्त कर लिया।  इस चुनाव में पार्टी को 30. 43%  मत हासिल हुए। इतिहास में पहली बार कुमारी मायावती स्वयं के बल पर स्पष्ट बहुमत से इस देश के सबसे बड़े राज्य उ  प्र  की मुख्यमंत्री बनी।

बहुजन समाज पार्टी के उत्तर प्रदेश में सत्ता में आने से एक बड़ा सामाजिक परिवर्तन हुआ।  गावं-देहात के जो लोग बाबासाहब डा. अम्बेडकर के अनुयायी होकर भी हिन्दुओं की तरह आचरण करते थे, खुले रूप में बुद्धिस्टों जैसे आचरण करने लगे, सार्वजनिक कार्यक्रम करने लगे। यही नहीं, इस तरह का प्रभाव अन्य राज्यों पर भी पड़ा। 

बुद्ध

बुद्ध
तुझे मैं ऐसा कभी भी नहीं देखता
जेतवन में
आंखें लगाए बैठा, ध्यानस्थ पद्मासन में
अथवा अजंता वेरूल  के अवशेषों में
पत्थर के ओंठ चिपके, अंतिम निद्रा लेते हुए

मैं तुझे देखता हूँ, चलता फिरता
दिन-दुखितों के दुखों पर मरहम लगाने वाला
जानलेवा अँधेरे में, हाथों में मशाल लिए हुए
झोपड़ी झोपड़ी में जाने वाला
संसर्ग-जन्य रोग के समान
नरडी का प्याला पीने वाला
दुःख के नए अर्थ बताने वाला
-दया पवार (स्रोत: धम्मचक्र प्रवर्तन के बाद के परिवर्तन )।

Monday, April 16, 2018

रिपब्लिकन पार्टी ऑफ़ इंडिया(Republican Party of India)

पृष्ठभूमि -
बाबासाहब अम्बेडकर ने बौद्ध धर्म ग्रहण करने का निर्णय लिया।  तत्संबंधित निवेदन 27 अग 1955 के  'जनता' अंक में प्रकाशित हुआ थ । धर्मान्तरण के बाद राजनीतिक पार्टी के रूप में पूर्व में गठित  'शेड्यूल्ड कास्ट फेडरेशन' को भंग करना आवश्यक था क्योंकि, इसमें जाति की सीमाएं थीं । कांग्रेस और देश के अखबार प्रचार कर रहे थे कि अगर डा अम्बेडकर बौद्ध धर्म ग्रहण करते हैं तो वे 'शेड्यूल्ड कास्ट' में कैसे रह सकते हैं और कैसे वह संगठन चला सकते हैं ?
बाबासाहब आंबेडकर द्वारा 'अखिल भारतीय रिपब्लिकन पार्टी ऑफ़ इंडिया' के गठन का निर्णय -
इधर, 30 सित 1955 को डा अम्बेडकर के निवास स्थान 26 अलीपुर रोड दिल्ली में ऑल इंडिया शेड्यूल्ड कास्ट फेडरेशन की केन्द्रीय संचालन समिति की बैठक हुई जिस में 'अखिल भारतीय रिपब्लिकन पार्टी' के गठन का निर्णय लिया गया
13 अक्टू 1956 को  धम्म चक्क पवत्तन कार्य के निमित नागपुर पधारे डा अम्बेडकर ने पत्रकार भेट वार्ता में बतलाया कि उन्होंने देश में समता, स्वतंत्रता और बंधुत्व के सिद्धांतों पर आधारित राजनीतिक पार्टी के गठन का निर्णय लिया है जिस में जाति और धर्म से परे समाज के सभी वर्गों का प्रतिनिधित्व होगा। उनका प्रयास होगा कि समान विचारधारा के लोग इस संगठन में आएं।
24 सित और 5 अक्टू 1956 को उन्होंने डा लोहिया को पत्र लिख कर इस हेतु बात करने आमंत्रित किया। अपने महापरिनिर्वाण के एक दिन पूर्व  डा अम्बेडकर ने प्र. के. अत्रे और एस. एम. जोशी को भी पत्र लिखे थे(धम्म चक्र प्रवर्तन के बाद परिवर्तन ; डा प्रदीप आगलावे पृ 238-239)।
बाबासाहब अम्बेडकर का परिनिर्वाण -
6 दिस 1956 को बाबासाहब डा अम्बेडकर के आकस्मिक निधन से दलित और बौद्ध समाज नेतृत्व से शून्य हो गया । सामूहिक नेतृत्व की बात उठी। 31  दिस 1956 को बैरिस्टर राजा भाऊ खोब्रागडे की अध्यक्षता में शेड्यूल्ड कास्ट फेडरेशन के संचालन समिति की हुई।  इस बैठक में शेड्यूल्ड कास्ट फेडरेशन के अध्यक्ष पद पर बैरिस्टर राजाभाऊ खोब्रागडे को और महासचिव के पद पर एडव्होकेट हरिदास आंवले को एकमत से चुना गया।  साथ ही ७ सदस्यों का एक अध्यक्षीय मंडल बनाया गया(वही, पृ  256 )।
शीघ्र ही वर्ष 1957 में होने वाले सार्वजनिक चुनावों के मद्देनजर रिपब्लिकन पार्टी की स्थापना न कर शेड्यूल्ड कास्ट फेडरेशन के बैनर तले ही चुनाव लड़ने का निर्णय हुआ(वही)। सनद रहे, चुनाव में लोकसभा के लिए 9, राज्य सभा में 2 और राज्य विधान सभाओं के लिए 20 उम्मीदवार चुन कर आए थे। इस में महाराष्ट्र से ही विधान सभा में 13 विधायक चुन कर आए थे। कुल 9 सांसदों में अकेले मुंबई से 7 सांसद चुने गए थे।  फेडरेशन के स्थापना वर्ष  1942 से अब तक के चुनावों में शेड्यूल्ड कास्ट फेडरेशन की यह सबसे बड़ी जीत थी।
अखिल भारतीय रिपब्लिकन पार्टी ऑफ़ इंडिया की स्थापना -
धर्मांतरण को एक वर्ष होने वाला था। इसके मद्देनजर  3 अक्टू  1957 को नागपुर में शेड्यूल्ड कास्ट फेडरेशन का अंतिम अधिवेशन कर इस संगठन को भंग किया गया और बाबासाहब डा अम्बेडकर की इच्छा अनुरूप 'रिपब्लिकन पार्टी ऑफ़ इंडिया' की स्थापना की गई (वही, पृ  257 )। पार्टी का अध्यक्ष बाबासाहब के निकट सहयोगी रहे मद्रास के वयोवृद्ध नेता रावबहादुर एन शिवराज को चुना गया। पार्टी का महासचिव बैरिस्टर राजा भाऊ खोब्रागडे को बनाया गया। अखिल भारतीय स्तर पर 'रिपब्लिकन पार्टी' की स्थापना से दलित आंदोलन को एक नई  दिशा प्राप्त हुई । भारतीय राजनैतिक परिपेक्ष्य में उसे एक कद और पहचान मिली ।
दलित बौद्धों की अनुसूचित जाति के बतौर मिल रही सुविधाएं केंद्र द्वारा समाप्त-
इधर, धर्मान्तरण के बाद दलित बौद्धों की अनुसूचित जाति के बतौर मिल रही सुविधाएं कांग्रेस की केंद्र और राज्य सरकारों ने समाप्त कर दिया ।
3 अक्टू 1957 की बैठक में यह भी प्रस्ताव पारित किया गया कि धर्मान्तरित बौद्धों को केंद्र और राज्य  सरकारों में अनुसूचित जाति  का लाभ बहाल किया जाए( वही, पृ  259 )।
पार्टी-संविधान की निर्मिति-
रिपब्लिकन पार्टी ऑफ़ इंडिया का संविधान तैयार किया गया और इसे 10 मार्च 1959 को लागू किया गया। संविधान निर्माण में एडव्होकेट बी सी कामले, एडव्होकेट बाबू हरिदास आवले, बैरिस्टर राजा भाऊ खोब्रागडे, एन  शिवराज, ए  जी पवार, दादासाहेब रूपवते आदि ने प्रमुख रूप से भाग लिया था। कुछ समय बाद  पार्टी के केंद्रीय सञ्चालन समिति के द्वारा 1959 के संविधान में 16 दिस 1967 को  संशोधन किया गया जो आज तक अस्तित्व में है। संविधान में 24  धाराएं हैं(वही)।
पार्टी द्वारा लोकसभा में अनु. जाति से बने बौद्धों को उन्हें पूर्व में मिल रही सुविधाएं दिए जाने की मांग -
लोकसभा में रिपब्लिकन पार्टी के 9 सांसद और राज्य सभा में एक; बैरिस्टर राजाभाऊ खोब्रागडे थे। 14 फर  1958 को सांसद दत्ता कट्टी ने लोकसभा में प्रस्ताव किया कि भारतीय संविधान में जो सुविधाएं अनुसूचित जातियों को प्राप्त हैं, अनुसूचित जाति से बने बौद्धों को दिए जाए और इसके लिए आवश्यक होने पर तत्संबंध में  संविधान में संशोधन कर कानून पारित किए जाएं। अपने प्रस्ताव में सांसद महोदय ने कहा की कि उनकी यह मांग केवल धर्मान्तरित बौद्धों के लिए नहीं है वरन उन सभी अछूत जातियों के लिए है जिनसे छुआछूत बरता  जाता है। वे धर्मान्तरित बौद्ध हैं इसलिए नहीं बल्कि, इसलिए कि उन से छुआछूत बरता जाता है( वही, पृ  260 )।छुआछूत का पालन करना अपराध है, फिर भी बहुत बड़ी मात्रा में इसका पालन किया जाता है।
समय-समय पर रिपब्लिकन पार्टी के अन्य सांसदों ने भी दलित जातियों और धर्मान्तरित बौद्धों की समस्याओं संसद के सामने  पुरजोर शब्दों में उठाते रहें(वही, पृ  260 )।
संसद में दादासाहेब गायकवाड़ द्वारा धर्मान्तरण पर प्रतिबन्ध के विरोध में  मुनस्मृति के पन्ने फाड़ना-
 4 मार्च 1960 को सांसद प्रकाशवीर शास्त्री ने अनुसूचित जाति, जन-जाति और पिछड़े वर्ग के धर्मान्तरण को रोकने के बारे में विधेयक पटल पर रखा जिसका रिपब्लिकन सांसद दादासाहेब गायकवाड़ ने जोरदार विरोध किया। सांसद ने मनुस्मृति के पन्ने फाड़ते हुए कहा कि सरकार हिन्दुओं के अत्याचार से सताए हुए दलित जातियों के धर्मान्तरण पर प्रतिबन्ध लगाने के स्थान पर हमें उन धार्मिक ग्रंथों पर प्रतिबन्ध क्यों नहीं लगाना चाहिए जो इस तरह की घृणा करने के लिए हिन्दुओं को प्रेरित करती है(वही, पृ  263-264 )।
समता सैनिक दल का पुनर्गठन -
दलित जातियों और धर्मान्तरित बौद्धों पर सवर्ण हिन्दुओं के बढ़ते अत्याचारों की घटनाओं के मद्देनजर रिपब्लिकन पार्टी ने सैनिक समता दल को पुनर्जीवित करने का निश्चय किया। त्तत्सम्बन्ध में 2 अक्टू  1957 को दीक्षाभूमि नागपुर में दादासाहेब गायकवाड़ की अध्यक्षता में अखिल भारतीय समता सैनिक दल का चौथा अधिवेशन आयोजित किया गया(वही, पृ  264 )।
पार्टी द्वारा महिला, विद्यार्थी और मजदूर संगठनों की स्थापना -
महिलाओं का संगठन बनाने के लिए पार्टी ने 2 अक्टू 1957 को अखिल भारतीय महिला परिषद् का आयोजन किया। इसी प्रकार, 'अखिल भारतीय रिपब्लिकन विद्यार्थी फेडरेशन' नाम से विद्यार्थियों का संगठन और मजदूर संगठन भी पार्टी के मार्ग-दर्शन में स्थापित किए गए (वही)।
पार्टी द्वारा भूमिहीनों के लिए आंदोलन -
रिपब्लिकन पार्टी के इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण आंदोलन भूमिहीनों का आंदोलन है। डॉ अम्बेडकर की मंशा अनुसार 1954 में दादासाहेब गायकवाड़ और बी एस मोरे के नेतृत्व में बेकार पड़ी जमीन भूमिहीनों को देने के सम्बन्ध में मराठवाड़ा से सत्याग्रह प्रारम्भ हुआ था। दिस 1958 में नासिक, जलगांव, धुले और अहमदनगर जिलों में कई भूमिहीनों के सत्याग्रह किया। 12 अग 1959 को लोकसभा में खानदेश के भूमिहीनों के सत्याग्रह के सम्बन्ध में सांसद दादासाहेब गायकवाड़ आदि पार्टी नेताओं ने स्थगन की सूचना दी। वर्ष 1959 की अवधि में सम्पूर्ण महाराष्ट्र में भूमिहीनों ने प्रचंड सत्याग्रह किया। उस समय 35,000  लोगों को सजा हुई थी(वही, पृ  265 )।
भूमिहीनों को भूमि देने जैसी कई मांगों के लिए 1 अक्टू 1964 को पार्टी की ओर से संसद पर करीब  1,00000  लोगों ने प्रदर्शन किया और तत्कालीन प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री को एक मांग पत्र दिया।
ऐतिहासिक सत्याग्रह -
इसके बाद 6 दिस 1964 को दादासाहेब गायकवाड़ के नेतृत्व में सम्पूर्ण देश भर में सत्याग्रह प्रारम्भ किया गया जिसे सभी राज्यों में भरपूर समर्थन मिला। यह सत्याग्रह करीब दो माह चला जिस में 40,000 सत्यागरियों को जेल में ठूंसा गया था। देश के सारे जेलखाने सत्याग्रहियों से ठसाठस भर गए थे, उन्हें रखने जगह नहीं बची थी। यह सत्याग्रह रिपब्लिकन पार्टी के इतिहास में अविस्मरणीय ऐतिहासिक घटना है।
प्रधानमंत्री द्वारा मांगों पर विचार के लिए आमंत्रित -
इस सत्याग्रह की व्यापकता और इसे मिले प्रचंड समर्थन को देख कर देश के प्रधान मंत्री ने रिपब्लिकन पार्टी के नेताओं को उनकी मांगों पर विचार के लिए आमंत्रित किया। पार्टी की और से दादासाहेब गायकवाड़, बैरिस्टर राजाभाऊ खोब्रागडे , बुद्धप्रिय मौर्य, आर, मुगम और एडव्होकेट नीले ने प्रधानमंत्री को अपना मांग-पत्र सौंपा।प्रधानमंत्री के आश्वाशन के बाद सत्याग्रह स्थगित कर दिया गया(वही, पृ 266)।
7 मार्च 1960 को पार्टी के शिष्ट मंडल ने महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री यशवंतराव चौहान को मांग-पत्र सौंप कर मांग की कि तमाम भूमिहीनों को सरकारी भूमि शीघ्र वितरित जाए।  दूसरे, नागपुर के दीक्षा-भूमि की जगह तुरंत पार्टी को हस्तांतरित किया जाए ताकि उस पर भव्य स्मारक बनाया जा सके ।  तीसरे,  बौद्ध बने अनु जाति के लोगों को  पूर्व में मिल रही सुविधाएँ बहाल की जाए, क्योंकि हिन्दू तब भी उनसे छुआछूत का बर्ताव करते हैं। और चौथे, खानदेश के आदिवासियों को जमींदारों के अत्याचारों से मुक्त किया जाए (वही, पृ 266-67)।
धर्मान्तरित बौद्धों को अनु जाति की सुविधाएं बहाल -
मई 1, 1960 को महाराष्ट्र शासन ने धर्मान्तरित बौद्धों को अनु जाति के बतौर मिलने वाली सभी शैक्षणिक सुविधाएं देने की घोषणा की(वही, पृ  267 )।
बाबासाहब स्मारक के लिए दीक्षा भूमि की 14  एकड़ जमीन हस्तांतरित -
इसी प्रकार दीक्षा भूमि की 14 एकड़ जमीन बाबासाहब स्मारक बनाने के लिए पार्टी को हस्तांतरित कर दी। यही वह दीक्षा भूमि की जगह है, जहाँ आज विश्व का सबसे बड़ा और भव्य बौद्ध स्तूप खड़ा है। यह दीक्षाभूमि देश और विदेश के बौद्धों और अम्बेडकर अनुयायियों के लिए प्रेरणा भूमि बन चुकी है(वही, पृ  267 )।
'नवदीक्षित बौद्धों' को अनु जाति के बतौर मिलने वाली शैक्षणिक सुविधाएं बहाल-
रिपब्लिकन पार्टी द्वारा लोकसभा में लगातार मांग किए जाने के मद्देनजर 30 अक्टू 1971 को इंदिरा गाँधी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने बौद्ध बने अनु जाति के विद्यार्थियों को शैक्षणिक सुविधाएं बहाल करने की घोषणा की और उस सम्बन्ध में राज्य सरकारों को आवश्यक निर्देश जारी किए । तत्संबंधित निर्देश में  धर्मान्तरित बौद्धों को नवदीक्षित बौद्ध( 'शेड्यूल्ड कास्ट्स कन्वर्ट्स टू  बुद्धिज़्म) कहा गया (वही, पृ  267 )।
ऐतिहासिक विजय-
उक्त जायज मांगों को केंद्र और प्रांतीय सरकारों द्वारा मान्य किया जाना रिपब्लिकन पार्टी की ऐतिहासिक विजय थी। सचमुच में, जिस उद्देश्य को प्राप्त करने पार्टी का गठन हुआ था, निस्संदेह उस में एक बड़ी सफलता प्राप्त हुई थी।
धर्मान्तरित बौद्धों को अनुसूचित जाति  के तौर मान्यता-
अग 1977 में रिपब्लिकन पार्टी(गवई  गुट ) के अध्यक्ष रा. सू.  गवई ने नवदीक्षित बौद्धों को अनु जाति के बतौर आर्थिक और सरकारी सेवाओं में प्रदत्त सुविधाएं बहाल किए जाने की मांग की। इस तरह की लगातार मांग और बढ़ते जन दबाव से अंतत: जनता दल के शासन काल (1990 ) में प्रधान मंत्री वी पी सिंह ने संविधान संशोधन कर धर्मान्तरित बौद्धों को अनुसूचित जाति  के बतौर मान्यता दे दी(वही, पृ  268 )।  निस्संदेह, सन 1957 से लंबित धर्मान्तरित बौद्धों की लड़ाई में अंतत: वर्ष 1990 में आंशिक सफलता प्राप्त हुई थी किन्तु सरकारी सेवाएं और राजनितिक क्षेत्र अभी भी दूर थे ।
नेताओं की टकराहट और पार्टी का विघटन -
14  मई 1959 को एडव्होकेट बी. सी. काम्बले ने पार्टी में विघटन पैदा कर अपना अलग; कामले गुट बना कर सबको हैरान कर दिया । इस गुट को एडव्होकेट बाबू हरदास आवले, दादासाहेब रूपवते, ए.  जी. पवार और एस. एन. काम्बले का समर्थन प्राप्त था। अक्टू  1964 में दादासाहेब गायकवाड़ के सहयोगी आर. डी. भंडारे ने फिर अपना अलग गुट तैयार किया (वही, पृ  269 )। कुछ  समय बाद, आर. डी. भंडारे,  दादासाहब रूपवते और एन.  एम. काम्बले कांग्रेस में चले गए (वही, पृ  277 ) पार्टी में फुट का असर यह हुआ कि जहाँ 1957 के आम चुनाव में मुंबई से पार्टी के 7 सांसद चुने गए थे वहीँ, 1962 के आम चुनाव में महाराष्ट्र से एक भी सांसद नहीं चुना जा सका ।  केवल 3 विधायक ही महाराष्ट्र विधान सभा के लिए चुन कर आ सके थे (वही, पृ  275 )।

अक्टू 1, 1964 को पार्टी अध्यक्ष एन शिवराज का निधन हो गया जिससे दादासाहेब गायकवाड़ को अध्यक्ष बनाया गया। तत्कालिक तौर पर पार्टी अध्यक्ष बने  दादासाहेब गायकवाड़ सर्व मान्य नेता नहीं थे।
महाराष्ट्र में दादासाहब गायकवाड़ ने 1967 में कांग्रेस से गठबंधन किया जिससे रा. सू. गवई को विधान परिषद में उपसभापति का पद मिला। किन्तु  इस गठबंधन से पार्टी संगठन को भारी नुकसान हुआ। आपसी खींचातानी से दादासाहेब रूपवते पार्टी छोड़कर कांग्रेस में चले गए(वही, पृ  270 -71 )।

वर्ष 1967 के लोकसभा चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी का सिर्फ 1 सांसद  अकबरपुर (उ  प्र ) से रामजी राम चुनकर आए थे । जबकि विधान सभाओं के लिए 21 उम्मीदवार; आ. प्र. से 2, बिहार से 1, हरियाणा से 2, महाराष्ट्र से 4, मैसूर से 1, पंजाब से 3 और उ. प्र. से 8  चुनकर आए थे।

दादासाहेब गायकवाड़ का स्वास्थ्य ठीक न रहने से 1969 में उ प्र के बुद्धप्रिय मौर्य को पार्टी कार्याध्यक्ष बनाने का सुझाव एडव्होकेट ना. ह. कुम्भारे ने दिया किन्तु इसे माना नहीं गया। स्मरण रहे,  बुद्धप्रिय मौर्य ने उ. प्र. में काफी काम किया था। उन्होंने मुस्लिम समाज में रिपब्लिकन पार्टी का काफी जनाधार बढ़ाया था।  और यही कारण है कि उ. प्र. से लोकसभा और विधान मंडल में रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवार चुन कर आए थे। किन्तु अपेक्षित सम्मान न मिलने से वे पार्टी छोड़कर कांग्रेस में चले गए(वही, पृ  271 )।

बैरिस्टर राजाभाऊ खोब्रागडे  बाबासाहब अम्बेडकर के समय से ही शेड्यूल्ड कास्ट्स फेडरेशन के महासचिव थे।  इस पद पर उनकी नियुक्ति 31 दिस. 1956 को हुई थी। स्पष्ट है,  पार्टी में उनकी भूमिका  महत्वपूर्ण थी। किन्तु  दादासाहेब गायकवाड़ के ख़राब स्वास्थ्य के चलते पार्टी अध्यक्ष उन्हें न बनाया जा कर उलटे  1970 में उन्हें इस पद से हटा  दिया गया और उनके स्थान पर एडव्होकेट एन एच कुम्भारे को महासचिव बनाया गया। पार्टी निर्णय से नाराज बैरिस्टर राजाभाऊ खोब्रागडे ने अपना अलग गुट  तैयार किया  (वही, पृ  271-72 )।

अक्टू 1970 में गायकवाड़ गुट और खोब्रागडे गुट के एकीकरण का प्रयास माननीय एडव्होकेट बाबू हरदास  आवले ने  किया किन्तु वे सफल नहीं हुए । हाँ, वे इस बीच कामले गुट छोड़कर खोब्रागडे गुट में शामिल हो गए(वही)।

1971  में दादासाहेब गायकवाड़ का निधन हो गया। उनके निधन के बाद रा. सू. गवई इस गुट के अध्यक्ष बने। एडव्होकेट बी सी काम्बले जिसने पहली बार पार्टी में फुट डाली थी,  20 अक्टू 1971 को सभी गुटों के एकीकरण के लिए पुणे में एक बैठक आयोजित की परन्तु उस बैठक में कोई भी शामिल नहीं न हुआ(वही )।

स्मरण रहे, 1971 के लोकसभा चुनाव में पंढरपुर(आरक्षित) से दादासाहेब गायकवाड़ गुट के अकेले  एन.  एस. काम्बले चुनकर आए थे।  चूँकि बुद्धप्रिय मौर्य कांग्रेस में शामिल हो गए थे इस कारण गायकवाड़, खोब्रागडे अथवा काम्बले गुट कोई भी अपना उम्मीदवार उ. प्र. में खड़ा नहीं कर पाए। वर्ष 1972 में राज्यों के विधान सभा चुनाव हुए जिस में महा. विधान सभा से 1 और आ. प्र. विधान सभा से 1; इस प्रकार केवल दो ही उम्मीदवार चुन कर आ सके थे (वही, पृ  276 )।

इधर, नेतृत्व का अभाव और पार्टी में फुट के चलते दलित जातियों और धर्मान्तरित बौद्धों पर अन्याय और अत्याचार की घटनाओं में बेतहाशा बढ़ोतरी हुई।  9 जुला 1972 को 'दलित पेंथर' नाम से एक नया लड़ाकू संगठन खड़ा हुआ(वही, 271 -72 )।

26  जन 1974  को चैत्य भूमि मुम्बई में एक बार पुन: रिपब्लिकन पार्टी के सभी गुटों के एकीकरण के जोरदार  प्रयास हुए किन्तु वह भी हवा हो गया।

1977 के आम चुनाव में खोब्रागडे गुट ने जनता पार्टी से गठबंधन किया था जिससे उस के 2 उम्मीदवार लोकसभा के लिए चुनकर आए थे । फर 1978 में विधान सभाओं के चुनावों में महा. विधान सभा के लिए 7  और कर्नाटक विधान सभा के लिए 1, इस प्रकार कुल 8 उम्मीदवार चुनकर आए थे(वही, पृ  276 )।

1980, 84, 89, 91 और 96 के लगातार 5 लोकसभा चुनावों में सतत 17 वर्षों तक रिपब्लिकन पार्टी के किसी भी गुट का कोई उम्मीदवार लोकसभा में नहीं पहुँच पाया(वही पृ  276 )।

पुन: 1995 में एकीकरण के प्रयासों में तेजी आई और 26  जन 1996 को उस समय के चारों गुटों; आठवले, गवई, कवाड़े और अम्बेडकर में सचमुच एकीकरण हो गया। चारों गुटों ने संयुक्त रिपब्लिकन पार्टी  के बैनर तले  चुनाव लड़ा।  परिणामस्वरूप  1998 के लोकसभा चुनाव में पार्टी के 4 सांसद; रामदास आठवले, रा सू गवई, जोगेंद्र कवाड़े और प्रकाश अम्बेडकर चुन कर आ गए । किन्तु यह एकता अधिक नहीं टिक पाई (वही, पृ  273 -74 ) और सतत पार्टी कमजोर होते चली गई। अपने-अपने स्वार्थ में नेता टूटते गए और बिखरते गए।  कई रिपब्लिकन नेता कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस में चले गए और कुछ तक बी. जे. पी.,  शिवसेना में हैं !

भारतीय रिपब्लिकन पार्टी ने अम्बेडकर के अनुयायियों और विशेषत: धर्मान्तरित बौद्धों को एक राजनीतिक  मंच प्रदान किया किन्तु बाबासाहेब अम्बेडकर  के बाद, सर्व मान्य नेतृत्व के अभाव ने पार्टी के संठनात्मक ठांचे को खोखला कर दिया। कांग्रेस सहित देश के तमाम राजनैतिक दल यद्यपि आर.पी. आई. को महारों की पार्टी समझते रहे,  किन्तु उससे कहीं अधिक नुकसान पार्टी का अपने ही शीर्ष नेताओं द्वारा हुआ । ऐसा नहीं है कि  स्वार्थ की राजनीति अन्य पार्टियों में नहीं है, किन्तु यह दृढ़ नेतृत्व ही है कि सबको बांधे रखता है जिसका भयावह अभाव आज, भारतीय दलित राजनीति में है। स्मरण रहे, दलित समाज सामाजिक और राजनैतिक रूप से अपेक्षतया अधिक जाग्रत है किन्तु नेता ही बिकने लगे तो क्या किया जा सकता है ?