Wednesday, September 18, 2019

धम्मपद

धम्मपद
बौद्धों का धम्मपद एक सर्व कालिक, सर्वाग्राही ग्रन्थ है। जिस तरह तमाम असहजता के बावजूद कबीर की साखियों को जब तब उद्धरित किया जाता है, ठीक उसी प्रकार धम्मपद की गाथाएं भी उद्धरित की जाती है। इसमें पंथ-सम्प्रदाय और धर्म विशेष का कोई लेना-देना नहीं है।

बौद्धों में तो धम्मपद को, एक पवित्र धर्म-ग्रन्थ का दर्जा प्राप्त है। यह वन्दनीय है, पूजनीय है। कई बुद्ध विहारों में तो श्रद्धा और सम्मान के साथ  'धम्मपदोत्सव'  मनाया जाता है। यह 10 दिन का भी हो सकता है और सम्पूर्ण  वर्षावास का भी। बुद्ध विहारों में इसका संगायन किया जाता है और भंते या धम्म प्रचारक फिर उस पर देशना  करते हैं।

ऐतिहासिक और महत्ता की दृष्टी से देखें तो ति-पिटक ग्रंथों से यह उतना महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ नहीं है। ति-पिटक अर्थात तीन पिटक- 1.  सुत्त पिटक  2.  विनय पिटक और 3.  अभिधम्म पिटक। फिर, सुत्तपिटक में 5 ग्रन्थ हैं- 1. दीघनिकाय  2. मज्झिम निकाय 3. संयुत्त निकाय  4. अंगुत्तर निकाय और 5. खुद्दक निकाय। दीघनिकाय, मज्झिम निकाय, संयुत्त निकाय और अंगुत्तर निकाय तो बड़े विशाल ग्रन्थ हैं और इनके कई भाग-अनुभाग हैं किन्तु पांचवे खुद्दक निकाय एक न होकर इसमें छोटे-बड़े कुल 15 ग्रन्थ हैं-  1. खुद्दक पाठ  2. धम्मपद 3.  उदान 4. इतिवुत्तक 5. सुत्तनिपात 6. विमानवत्थु 7. पेतवत्थु 8. थेरगाथा 9. थेरीगाथा 10. जातक 11. निद्देश 12. पतिसम्मिदा मग्ग 13.  अपदान 14.  बुद्धवंश, 15.चरियापिटक।

 धम्मपद में 423 गाथाएं  26 वर्गों में विभक्त हैं- 1. यमक वग्ग 2. अप्पमाद वग्ग 3. चित्त वग्ग  4. पुप्फ़ वग्ग 5. बाल वग्ग 6. पंडित वग्ग 7. अरहंत वग्ग 8. सहस्स वग्ग 9. पाप वग्ग 10. दंड वग्ग 11. जरा वग्ग 12. अत्त वग्ग 13. लोक वग्ग 14. बुद्ध वग्ग 15. सुख वग्ग 16. पिय वग्ग 17. कोध वग्ग 18. मल वग्ग 19. धम्मट्ठ वग्ग 20. मग्ग वग्ग 21. पकिण्णक वग्ग 22. निरय वग्ग 23. नाग वग्ग 24. तण्हा वग्ग 25. भिक्खु वग्ग 26. ब्राह्मण वग्ग।

धम्मपद, सुभाषित मानी गई कुछ गाथाओं का संग्रह  है, जो ति-पिटक ग्रंथों से ली गई है। ये गाथाएं इतनी सुभाषित और सर्वग्राही हैं कि  राहुल सांकृत्यायन के शब्दों में,  संसार की सारी सभ्य भाषाओँ में इसके अनुवाद हो चुके हैं(पालि साहित्य का इतिहास)। इस पर टीकाएँ, अनु-टीकाएँ, टीकाओं पर टीकाएँ लब्ध-प्रतिष्ठित देश और विदेश की कई हस्तियों ने की हैं। बाबासाहब अम्बेडकर  ने अपनी अमर कृति 'बुद्धा एंड हिज धम्मा' में कई स्थानों पर धम्मपद से उद्धरण लिए हैं।

आरम्भ में 4 निकाय थे- दीघ, मज्झिम, संयुत्त और अंगुत्तर निकाय(ति-पिटक, उत्पत्ति और विकास : डॉ सुरेन्द अज्ञात )। प्राचीन अभिलेखों में 'चतु निकायिक'(चार निकायों ) का ही प्रयोग हुआ है। बुद्धघोष भी सुत्त पिटक के चार निकायों को ही स्वीकारते हैं- 'सुत्तन्तरपिटके चतस्सो संगतियो' (निदान कथा :सुमंगलविलासनी)। निस्संदेह,  पांचवा निकाय, जिसे खुद्दक निकाय कहते हैं, बाद का है और बुद्ध वचन के रूप में इसके अंतर्गत आने वाले 15 ग्रंथों की प्रमाणिकता संदेह के परे नहीं है। डॉ भरतसिंह उपाध्याय ने धम्मपद सहित इन 15 ग्रंथों को दूसरे दर्जे का माना है(ति-पिटक में धम्मपद का स्थान, पृ. 38)।

बुद्ध ने न सिर्फ लोक भाषा के अन्यथा संस्कृत में उनके कथन को उद्धरित करने का निषेध किया वरन छंदोबद्ध पद्य-मय रूप से उनके उपदेशों को कहने सचेत किया (संयुत्त निकाय भाग- 1: पृ 308 )। इसी तरह बुद्ध ने अन्य उपदेश में छंदोबद्ध कविताओं व पद्यों को धम्म के लिए बड़ा भावी-भय और उसे नष्ट करने वाला बताया है(अंगुत्तर निकाय भाग- 2: पृ 326)। लेकिन धम्मपद सहित सारा खुद्दक निकाय काव्य-मय है, जिसमें भावुकता, पौराणिकता और हवाई कल्पना का भण्डार है। हम देखते हैं कि हमारे दैनिक जीवन में, आचार-संहिता के नाम पर हों या बुद्ध वंदना के नाम पर अथवा  पूजा-पाठ की परितं गाथाएं;  सारी की सारी छंदों-बद्ध पद्य-मय रचनाएँ  हैं। ब्रह्मा, देवता, यक्ष, राक्षस सारे ब्राह्मणिक कल्पित पात्र स्वर्ग-नरक का भय दिखाते हुए हमारे घर और बुद्ध-विहारों में विराजमान हैं। भंते, मजे से इनका संगायन करते हैं और उपासक-उपसिकाएं परित्राण-पाठ के बाद सत्यनारायण की कथा की तरह हाथ में सूत्र बांध बाहर निकलते हैं !
धम्मपद के सर्वमान्य होने का कारण इसमें 'ब्राहमण महिमा' का बखान है. कोई भी ग्रन्थ जो ब्राह्मण के गुण गाए, 'सर्वमान्य' न होने से कैसे रह सकता ? धम्मपद का  पूरा का पूरा एक परिच्छेद 'ब्राह्मण वग्गो',  'ब्राह्मण श्रेष्ठता' के लिए समर्पित है। इसमें 'ब्राह्मण हत्या' को धिक्कारा गया है-  'धि ब्राह्मणस्स हन्तारं'। प्रतीत होता है, बुद्ध के ब्राह्मण सावक,  'समण-ब्राह्मण' के रूप में  अपनी शाख बचाने सफल हो गए।  
- अ. ला. ऊके  @ amritlalukey.blogspot.com

Tuesday, September 17, 2019

पाप मित्तता(कुसंगति)

Image may contain: 1 person, outdoor and natureपाप मित्तता(कुसंगति)
नाहं भिक्खवे! अञ्ञं एक धम्मम्पि समनुपस्सामि, यो एवं अनत्थाय संवत्तति, यदिदं भिक्खवे पाप-मित्तता. पाप-मित्तता भिक्खवे, महतो अनत्थाय संवत्तति(एकक निपात:अंगुत्तर निकाय)।
नहीं मैं,  भिक्खुओ! दूसरी चीज देखता हूँ, जो इतना अनर्थकारी हो, जैसे कि, भिक्खुओ, कुसंगति।  कुसंगति भिक्खुओ, बहुत ही अनर्थकारी है।
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नाहं- न अहं। धम्मम्पि- धम्म-अपि। यदिदं- यथा-इदं। 

Monday, September 16, 2019

धार्मिक गुलामी-

धार्मिक गुलामी-
हिन्दू; बुद्ध विहारों में नहीं जाते, वाल्मीकि मंदिरों नहीं जाते, रविदास मंदिरों में नहीं जाते, आदिवासियों के पूजा-स्थल 'पेनगढों' में नहीं जाते जबकि महार, चमार, वाल्मीकि, आदिवासी हिन्दू मंदिरों में जा कर न सिर्फ माथा टेकते हैं, घंटी बजाते हैं बल्कि उनके तीज-त्यौहार भी उतने ही हर्ष-उल्लास से मनाते हैं !

पालि' सीखना आवश्यक है.

'पालि' सीखना आवश्यक है.
भाषा, संस्कृति का हिस्सा है. बोल-भाषा और आचार-विचारों से ही संस्कृति का निर्माण होता है. हमारा देश बहु-भाषी देश है. निस्संदेह यहाँ संस्कृतियाँ अनेक हैं. हर समाज की अपनी भाषा और संस्कृति है.
पालि का सम्बन्ध जितना ति-पिटक से हैं, उससे कहीं अधिक सम्बन्ध बुद्ध की वाणी से है. पालि, बुद्ध की भाषा है. पालि बुद्ध के वचन है. आप पालि सीख कर बुद्ध वचनों को सीखते हैं.
जिस प्रकार, समाज और संस्कृति पर्यायवाची हैं, ठीक उसी प्रकार भाषा और संस्कृति पर्याय वाची है. आप संस्कृति से भाषा को अलग नहीं कर सकते. भाषा है तो संस्कृति है और संस्कृति है तो समाज है. और इसलिए बुद्ध को नष्ट करने के लिए सर्व-प्रथम उसकी भाषा अर्थात उसके ग्रंथों को जलाया गया. महीनों नालंदा, तक्षशिला, विक्रमशिला, जगद्दल आदि बौद्ध विश्वविद्यालयों के विशाल ग्रंथालय जलते रहे.
पालि हमारी संस्कृति है, हमारी अस्मिता है. यह हमारी संस्कार-भाषा है. सारे बौद्ध संस्कार हमारे पालि में होते हैं और इसलिए, बाबासाहब अम्बेडकर द्वारा पुनर्स्थापित बुद्ध और उनके धम्म को बचाए रखना है, क्योंकि, तो पालि सीखना आवश्यक है.

पालि को जन-जन तक पहुँचाने की कार्य योजना-
पालि पढ़ाने की दिशा में बच्चों को पालि सीखाना सरल है. सामाजिक उत्थान की दिशा में कार्यरत हमारे लोगों द्वारा स्थान-स्थान पर कोचिंग क्लासेस लगा कर बच्चों को पढ़ाया जाता है. इसमें भाषा के तौर पर, पालि अतिरिक्त रूप से पढाई जा सकती है. प्रो. प्रफुल्ल गढ़पाल जैसे अधिकारी द्वारा वर्ग- 1 से  वर्ग - 5 तक की पुस्तकें तैयार हैं.  संस्कृत से अत्यंत सरल होने से प्रारंभिक स्तर पर  पालि पढ़ाने किसी दक्षता की आवश्यकता नहीं है. स्मरण रहे,  प्रो. गढ़पाल तत्सम्बंध में प्रशिक्षण के लिए बीच-बीच में 10 से 15 दिन के प्रशिक्षण शिविर आयोजित करते रहते हैं.

Sunday, September 15, 2019

पालि सीखें- मम नाम अमतो.

मम नाम अमतो.
मम पितुस्स नाम मंदरु उके.
मम मातुया नाम मेनावन्ति.
अहं भोपाल नगरे निवसामि.
रित्त ठानं पूरणीयं-
मम नाम -------------.
मम पितुस्स नाम ---------------.
मम मातुया नाम ----------------.
अहं ------------- नगरे निवसामि.
पाठक आवुस आर. पी. सिंग-
मम नाम -रवीन्द्र पाल सिंह।
मम पितुस्स नाम -स्मृतिसेस स्री पृथ्वी सिंह सागर।
मम मातुया नाम -स्मृतिसेस स्रीमति प्रेमवती।
अहं -हरिद्वार-नगरे/गामे निवसामि।
सही उत्तर
रवीन्द्रपाल सिंह मम नाम।
पृथ्वीसिंह सागर मम पितुस्स नाम।
प्रेमवती मम मातुया नाम।
अहं हरिद्वार नगरे निवसामि।
टिप 1. पालि में नाम 'सिद्धत्थो,गोतमो, विवेको, जयो, यसो और महिलाओं के नाम विशाखा, यसोधरा, गोतमी, मल्लिका जैसे होते हैं. उदाहरण के लिए अगर मुझे अपना पूरा नाम बतलाना है तो मैं 'अहं अमतो' अथवा 'मम नाम अमतो' न कह कर 'अमृतलाल उके मम नाम' कहूँगा. परिचय के समय पिताजी जीवित है या नहीं, बताना आवश्यक नहीं है. अगर बतलाना आवश्यक हो तो 'स्मृतिशेष' के स्थान पर 'परिनिब्बुत' शब्द लिखें. दूसरे, 'श्रीमान/श्रीमान' पालि संस्कृति के शब्द नहीं है. बौद्ध संस्कृति में इसके लिए 'आवुस'/'उपासक' अथवा 'आवुसा'/'उपासिका' पालि शब्द आते हैं

मम नाम अमतो/विशाखा ।
मम पितुस्स नाम मंदरु उके।
मम मातुया नाम मेनावन्ति।
अहं भोपाल नगरे निवसामि।

प्रश्न-
1. अपने से छोटों से-
त्वं नाम किं? 
त्वं पितुस्स नाम किं?
त्वं मातुया नाम किं?
त्वं कुत्थ वससि ?

2. सम अथवा बड़ों से-
भवन्तस्स नाम किं ?
भवन्तस्स पितुस्स नाम किं ?
भवन्तस्स मातुया नाम किं?
भवं कुत्थ वसति ?

3. महिलाओं से-
भोतिया नाम किं? 
भोतिया पितुस्स नाम किं?
भोतिया मातुया नाम किं?
भोति कुत्थ वसति? 
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त्वं- तुम्हारा।  भवन्तस्स- महोदय का। भोतिया- महोदया का।   
 टिप- पालि में नाम 'सिद्धत्थो,गोतमो, विवेको, जयो, यसो और महिलाओं के नाम विशाखा, यसोधरा, गोतमी, मल्लिका जैसे होते हैं. उदाहरण के लिए अगर मुझे अपना पूरा नाम बतलाना है तो मैं 'अहं अमतो' अथवा 'मम नाम अमतो' न कह कर 'अमृतलाल उके मम नाम' कहूँगा. परिचय के समय पिताजी जीवित है या नहीं, बताना आवश्यक नहीं है. अगर बतलाना आवश्यक हो तो 'स्मृतिशेष' के स्थान पर 'परिनिब्बुत' शब्द लिखें. दूसरे, 'श्रीमान/श्रीमान' पालि संस्कृति के शब्द नहीं है. बौद्ध संस्कृति में इसके लिए 'आवुस'/'उपासक' अथवा 'आवुसा'/'उपासिका' पालि शब्द आते हैं