Saturday, April 13, 2019

अशोक चक्र

भारतातील सर्वात मोठे अशोक चक्र हरियाणा राज्यातील टोपरा कलान गावात २२ ऑक्टोबर२०१८ रोजी उभारण्यात आले.
अशोक चक्र ३० फूट उंच आहे. अशोक चक्राचे वजन ६ टन असून त्याला उचलण्यासाठी दोन क्रेन चा वापर करावा लागला.

Friday, April 12, 2019

मोदी अफीम

सेना के रिटायर्ड टॉप आफिसर, सिनेमा के रंग कर्मी, कलाकार, विभिन्न क्षेत्रों में राष्ट्रपति के हाथों पुरस्कृत बुद्धिजीवी, लेखक, चिन्तक साहित्यकार लगातार अपनी नाराजी जता रहें हैं, पुरस्कार लौटा रहे हैं, चिट्ठियां लिख रहे हैं. मगर, बीजेपी के लोग आरएसएस के राष्ट्रवाद में इतने मतान्ध हैं कि उन्हें ये सब बातें तुच्छ लगती है, अर्थहीन और विरोधियों का प्रलाप लगती है.

बहरहाल, यह देखना दिलचस्प होगा कि ऊंट किस करवट पर बैठता है ? अर्थात क्या इवीएम मशीने 'मोदी-मोदी' बोलते रहेगी ? क्या चुनाव आयोग 'मोदी-मोदी' पर नियंत्रण कर सकेगा ? क्या राष्ट्रपति 'मोदी अफीम' की खुमारी से उठ सकेंगे ?

अम्बेडकर, क्या मुस्लिम-एकता के विरोधी थे ?

अम्बेडकर, क्या मुस्लिम-एकता के विरोधी थे ?
अम्बेडकर; 'दलित-मुस्लिम एकता के विरोधी थे'. -यह कोई धार्मिक दंगा भड़काने के नीयत से ही बोल सकता है. अफ़सोस कि यह उ प्र के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ बोल रहे थे. योगी आदित्यनाथ, जैसे कि इनकी छवि है, जातिगत वैमनस्यता फैलाने की. सांप्रदायिक दंगा करवाने की और इन मुद्दों पर सामाजिक-धार्मिक ध्रुवीकरण करने की .और सबसे बड़ी बात, यह बांटने की राजनीति ये भगवा वस्त्र पहन कर करते है. हिन्दू मठाधीश होकर करते हैं, सूबे का बतौर मुख्यमंत्री करते हैं ! अगर हिन्दू मठ के अधीन राजसत्ता हो तो क्या हो सकता है, योगी अवैद्यनाथ इसके उदहारण है !
आरएसएस विचारधारा जो योगी अवैद्यनाथ की सोच और उनके कृत्य को दर्शाती हैं, देशभक्ति की बात करती है. राष्ट्रभक्ति का दंभ भरती है. इन्हें भारत से नहीं, हिंदुस्तान से प्रेम है. देश का संविधान इन्हें अपने मंजील की ओर बढ़ने में बाधा दिखता है ? सदियों से सिंची और पल्लवित गंगा-जमनी की तहजीब इन्हें नागवार लगती है. और सबसे बड़ी बात,70-75 वर्षों में ये लोग युवाओं की लम्बी फ़ौज अपने पीछे खड़ा कर देते हैं ! और ये फ़ौज में खड़े युवा 'मोदी-मोदी' के नारे लगाते हैं ?
हमें हिटलर को, उसके राष्ट्रभक्ति के जज्बे को और उसके पीछे उन्मादी भीड़ को नहीं भुलना करनी चाहिए. हमने बाबाओं के पीछे मरने-मारने पर उतारू खड़ी भीड़ को देखा है. बाबा तो अपने कुकर्मों से सलाखों के पीछे चले गए मगर, भीड़ तो वही है ?
प्रसिद्द अम्बेडकराईट और दलित चिन्तक  कँवल भरती के शब्दों में; ये ज़ाहिल लोग हैं, जो न इतिहास को पढ़ते हैं और न समझते हैं। आरएसएस इनको जो रटवाता है, ये रट्टू तोते की तरह वही सब जगह दोहराते हैं। 
डॉ. आंबेडकर ने मुस्लिम लीग की आलोचना की थी, जो एक राजनीतिक दल की आलोचना थी, मुसलमानों की नहीं। यह सत्ता हस्तांतरण के समय की बात है, जब सत्ता का बंटवारा कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच हो रहा था, और दलित वर्गों को हिन्दू फोल्ड में मानकर हाशिए पर डाल दिया गया था। डॉ. आंबेडकर ने इस बंटवारे का विरोध किया था, और दलित वर्गों को सत्ता का तीसरा केंद्र बनाने की लड़ाई लड़ी थी। इस लड़ाई में सर्वहारा की बात करने वाले कम्युनिस्ट और समाजवादी भी आंबेडकर के विरोध में थे और सत्ता के हिन्दू केंद्र बने हुए थे। गोलमेज़ सम्मेलन में डॉ. आंबेडकर और मुस्लिम नेताओं ने मिलकर अल्पसंख्यक वर्गों की लड़ाई लड़ी थी। मुहम्मद शौक़त अली और डॉ. आंबेडकर की सम्मान यात्रा एक ही गाड़ी में बम्बई में निकली थी। परेल में दोनों की संयुक्त सभा हुई थी। और ज़ाहिल लोग कह रहे हैं कि आंबेडकर मुस्लिम विरोधी थे.
और अगर अम्बेडकर, मुस्लिम एकता के विरोधी थे तो आरएसएस के लोग क्यों उन्हें प्रात: वन्दनीय मानते हैं ? क्यों उनकी फोटों सामने रख कर जुलुस निकालते हैं ? क्यों संसद भवन; जो विभिन्न जाति, धर्म और सम्प्रदायों का प्रतिनिधित्व करता है, की छाती पर स्थित उनकी प्रतिमा पर माल्यार्पण करते हैं ?

मायावती की मूर्ति

कुछ टुच्चे किस्म के लोग बहन मायावती पर छींटाकशी करते हैं और आरोप लगाते हैं कि उन्होंने अम्बेडकर के सामने अपनी मूर्ति स्थापित करवा दी..मुझे इनकी हैसियत और अक्ल पर तरस आता है.
जनाब ! बाबासाहब अम्बेडकर के ठीक बगल में अपनी मूर्ति स्थापित करना इतना आसान नहीं है ? इसके लिए सवर्णों की छाती पर चढ़ कर लखनऊ और नोएडा में बड़े-बड़े दलित स्मारक बनाने होते हैं ? दलित और बहुजन नायकों की बड़ी-बड़ी मूर्तियाँ स्थापित करनी होती है. बुद्धमय भारत का राज-चिन्ह अशोक चक्र और हाथी, कांसीराम स्मारक निर्माण कर उसमें इनकी लम्बी कतारें खड़ी करनी होती है.
और इसके लिए किसी चमार के घर पैदा होना होता है. और सबसे बड़ी बात, किसी चमारण का दूध पीकर 'मायावती' बनना होता है !
काश ! कि यह इतना सरल होता ?

Thursday, April 11, 2019

पाकिस्तान; भारत का विभाजन: कंवल भारती

ये ज़ाहिल लोग हैं, जो न इतिहास को पढ़ते हैं और न समझते हैं। आरएसएस इनको जो रटवाता है, ये रट्टू तोते की तरह वही सब जगह दोहराते हैं। 
डॉ. आंबेडकर ने मुस्लिम लीग की आलोचना की थी, जो एक राजनीतिक दल की आलोचना थी, मुसलमानों की नहीं। यह सत्ता हस्तांतरण के समय की बात है, जब सत्ता का बंटवारा कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच हो रहा था, और दलित वर्गों को हिन्दू फोल्ड में मानकर हाशिए पर डाल दिया गया था। डॉ. आंबेडकर ने इस बंटवारे का विरोध किया था, और दलित वर्गों को सत्ता का तीसरा केंद्र बनाने की लड़ाई लड़ी थी। इस लड़ाई में सर्वहारा की बात करने वाले कम्युनिस्ट और समाजवादी भी आंबेडकर के विरोध में थे और सत्ता के हिन्दू केंद्र बने हुए थे।
गोलमेज़ सम्मेलन में डॉ. आंबेडकर और मुस्लिम नेताओं ने मिलकर अल्पसंख्यक वर्गों की लड़ाई लड़ी थी। मुहम्मद शौक़त अली और डॉ. आंबेडकर की सम्मान यात्रा एक ही गाड़ी में बम्बई में निकली थी। परेल में दोनों की संयुक्त सभा हुई थी।
और ज़ाहिल लोग कह रहे हैं कि आंबेडकर मुस्लिम विरोधी थे।