Monday, September 9, 2019

वैदिक समाज में स्त्री

वैदिक समाज में स्त्री
वैदिक ऋचा ओं के लगभग 300 ऋषि हैं पर इनमें गिनी-चुनी ही महिलायें हैं- जुहू, शची, घोषा, लोमशा, लोपामुद्रा और विश्वा पारा। इन सुधि महिलाओं के होते हुए भी वैदिक-ग्रंथों में स्त्री यौन सुख, पुत्रोत्पादन और दासकर्म के निमित्त समझी जाती थी। ऋग्वेद मंडल 10 के सूक्त 95 के मन्त्र 15 में उर्वशी नामक एक स्त्री के ही मुख से स्त्री को भेड़िया जैसी बताया गया है(मुद्रा राक्षस : धर्म-ग्रंथों का पुनर्पाठ , पृ 47 )।

वैदिक समाज में स्त्रियाँ घरों में कूटने-पीसने का ही काम करती थी।  मंडल 9 सूक्त 112 मन्त्र 3 में स्त्री को 'सोम कूटने-पीसने वाली' कहा गया है। मंडल 1 सूक्त 28 में स्त्री को मूसल चलाती, सील बट्टे से पीसती, ओखली में कूटती, मथानी पेय मथती बताया गया है(वही, पृ 48)।

मंडल 1, सूक्त 122 मन्त्र 2 में स्त्री को पति द्वारा पुकारे जाने पर शीघ्र उपस्थित होने वाली दासी सदृश्य कहा गया है। मंडल 1 सूक्त 32 मन्त्र 9 में बड़ी बर्बरता से इंद्र के द्वारा पुत्र की रक्षा करती माँ का वध बछड़े के साथ गाय जैसे गया है(वही, पृ 48 )।

अर्थवेद अध्याय 3 सूक्त 25 मन्त्र 5-6 में बानगी देखें- कुशा से पीटता हुआ, हे स्त्री ! मैं तुम्हें माता-पिता के घर से लाता हूँ, ताकि तू मेरी आज्ञा माने।  अध्याय 6 सूक्त 102 के मन्त्र 1-2 में कहा गया है- हे देवता ! शिक्षित घोड़े का मालिक खूंटे से रस्सी खोल कर घोड़ी को अपनी तरफ खींचता है, उसी प्रकार स्त्री मेरी और खिंची रहे। इससे पहले सूक्त का अंत इस प्रकार होता है- तुम बैल की तरह अपनी पत्नी के पास जाओ। इसी अध्याय के सूक्त 77 में स्त्री को घोड़े की तरह रस्सी से घर में बांध कर रखने को कहा गया है(वही, पृ 49)।

ऋग्वेद में; मंडल 1 सूक्त 69,  अनु. 117 सूक्त 116,  मंडल 5 सूक्त 30 मन्त्र 9,  मंडल 6 सूक्त 26, मंडल 10, सूक्त 65 आदि में  इंद्र से रमणीय स्त्रियों, कन्याओं  को दिलाने की प्रार्थनाएं हैं । संस्कृत में विवाह के लिए शब्द 'परिणय' या परिणयन है। परिणयन का अर्थ है, लूट कर या उठा कर ये जाना। निस्संदेह, वैदिक समुदाय के धर्म-ग्रंथों में स्त्री की स्थिति बेहद अपमान-जनक रही है। उन्हें यज्ञ ही नहीं शिक्षा का भी अधिकार नहीं था(मुद्रा राक्षस : धर्म-ग्रंथों का पुनर्पाठ , पृ 50)। 

Sunday, September 8, 2019

प्रेम और दया

प्रेम और दया
एक दिन बुद्ध वेलुवन जा रहे थे। मार्ग में उन्होंने एक ब्राह्मण को देखा जो नहा-धोकर मन्त्र पढ़ते हुए अच्छत(चावलों के दाने) धरती और आकाश की ओर बिखेर रहा था। बुद्ध के पूछने पर उसने बताया-
"मैं देवों और पितरों को अच्छत चढ़ा रहा हूँ ताकि वे मेरा कल्याण कर सकें।"
" तो ब्राह्मण ! तुम उस हेतु अपने चारों ओर प्रेम और दया क्यों नहीं बिखेरते ?

Thursday, September 5, 2019

माधुरिय सुत्त (म.नि. 2.4.4 )

ऐसा मैंने सुना-  एक  समय आयु. महाकात्यायन मथुरा में वृदावन में विहार कर रहे थे।
एवं मे सुत्तं-  एकं समयं आयस्मा महाकच्चानो मधुरायं विहरति गुंदावने।
मथुरा के राजा अवंतिपुत्र ने सुना-  समण कच्यायन मथुरा के बृन्दावन में विहार कर रहे हैं।
अस्सोसि खो राजा माधुरो अवन्तिपुत्तो- समण खलु, भो कच्चानो  मधुरायं विहरति गुण्दावने।
तब मथुरा का राजा अवंतिपुत्र एक बड़े राजा के अनुकूल आयु. महाकच्चायन के दर्शनार्थ निकला।
अथ खो राजा माधुरो अवंतिपुत्तो मधुराय निय्यासि महच्च राजानुभावेन आयस्मंतं महाकच्चानं दस्सानाय।
जितना यान का रास्ता था, उतना यान से जाकर,
यावतिका यानस्स भूमि यानेन गंत्वा
फिर यान से उतर पैदल ही जहाँ आयु. महाकच्चायन थे, गया।
याना पच्चोरोहित्वा पत्तिकोव येन आयस्मा महाकच्चानो तेनुपसंकमि
वहां जाकर आयु. कच्चायन के साथ कुशल क्षेम पूछ कर एक और बैठ गया।
उपसंकमित्वा आयस्मता महाकच्चानेन संध्दि सम्मोदनीयं कथं वितिसारेत्वा एकमंतं निसीदि
एक ओर बैठे राजा माधुरो अवंतिपुत्र ने आयु. महाकच्चायन से यह कहा-
एकमंतं निसिन्नो खो राजा अवंतिपुत्तो आयस्मंतं महाकच्चानं एतद वोच-
"भो कच्चायन ! ब्राहण कहते हैं, ब्राहमण ही श्रेष्ठ हैं, और वर्ण हीन हैं ? ब्राह्मण ही शुद्ध हैं, अ-ब्राह्मण नहीं;  आप क्या सोचते हैं  ?"
"ब्राह्मणा, भो कच्चान एवं आहंसु- ब्राह्मणो एव सेट्ठो, हीनो अञ्ञो वण्णो, ब्राह्मणा येव सुज्झन्ति नो अ-ब्राह्मणा; भवं किं मञ्ञति ?"
"तो क्या मानते हो महाराज, क्षत्रिय यदि प्राणी हिंसक हो, मिथ्याचारी हो, मृषावादी हो, चुगली करने वाला, कटुवचन बोलने वाला , बकवाद करने वाला हो, लोभी, द्वेषी, मिथ्या-दृष्टि वाला हो तो उसकी दुर्गति होगी या नहीं ?
तं किं मञ्ञसि, महाराज, इधस्स खत्तियो पाणातिपाती, अदिन्नादायी, कामेसु मिच्छाचारी, मुसावादी पिसुणवाचो, फरुसवाचो, सम्फप्पलापी, अभिज्झालु, व्यापन्नचित्तो, मिच्छा दिट्ठि सम्पन्नो; तं दुग्गतिं भवेय्य वा ?
"तो क्या मानते हो महाराज, ब्राह्मण यदि प्राणी हिंसक हो, मिथ्याचारी हो, मृषावादी हो, चुगली करने वाला, कटुवचन बोलने वाला , बकवाद करने वाला हो, लोभी, द्वेषी, मिथ्या-दृष्टि वाला हो तो उसकी दुर्गति होगी या नहीं ?
तं किं मञ्ञसि, महाराज, इधस्स ब्राह्मणो अपि पाणातिपाती, अदिन्नादायी, कामेसु मिच्छाचारी, मुसावादी पिसुणवाचो, फरुसवाचो, सम्फप्पलापी, अभिज्झालु, व्यापन्नचित्तो, मिच्छा दिट्ठि सम्पन्नो; तं दुग्गतिं भवेय्य वा ?
"तो क्या मानते हो महाराज, वैश्य, शूद्र भी यदि प्राणी हिंसक हो, मिथ्याचारी हो, मृषावादी हो, चुगली करने वाला, कटुवचन बोलने वाला, बकवाद करने वाला हो, लोभी, द्वेषी, मिथ्या-दृष्टि वाला हो तो उसकी दुर्गति होगी या नहीं ?
तं किं मञ्ञसि, महाराज, इधस्स वेस्सो, सुद्दो अपि पाणातिपाती, अदिन्नादायी, कामेसु मिच्छाचारी, मुसावादी पिसुणवाचो, फरुसवाचो, सम्फप्पलापी, अभिज्झालु, व्यापन्नचित्तो, मिच्छा दिट्ठि सम्पन्नो; तं दुग्गतिं भवेय्य वा ?
"हे कच्चायन,  ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र भी यदि प्राणी हिंसक हो, मिथ्याचारी हो, मृषावादी हो, चुगली करने वाला, कटुवचन बोलने वाला , बकवाद करने वाला हो, लोभी, द्वेषी, मिथ्या-दृष्टि वाला हो तो उसकी दुर्गति होगी। ऐसा मुझे लगता है, अरहतों से भी ऐसा सुना है।"
"भो कच्चानो, ब्राह्मणो, खत्तियो, वेस्सो सुद्दो अपि पाणातिपाती  अदिन्नादायी कामेसु मिच्छाचारी मुसावादी पिसुणवाचो फरुसवाचो सम्फप्पलापी अभिज्झालु व्यापन्न चित्तो मिच्छा दिट्ठि सम्पन्नो; तं दुग्गतिं भविस्सति। एवं मे एत्थ होति, एवं च मे एतं अरहतं सुतं।"
"साधु, साधु, महाराज ! साधुवाद है इसके लिए महाराज। ऐसा हो रहा है और तुमने ठीक ही अर्हतों से सुना है।"
"साधु, साधु, महाराज!  साधु खो ते एतं  महाराज। एवं होति, साधु च पन ते एतं अरहतं सुतं।"
"तो क्या मानते हो महाराज! ऐसा होने पर चारों वर्ण सम होते हैं या नहीं ? यहाँ तुम्हें कैसा लगता है ?"
"तं किं मञ्ञसि महाराज! यदि एवं सन्ते, इमे चत्तारो वण्णा सम समा होन्ति नो वा ? कथं वा ते एत्थ होति?"
"अवश्य,  हे कच्चायन ! ऐसा होने पर चारों वर्ण सम होते हैं। यहाँ मैं कोई भेद नहीं देखता। "
"अद्धा खो भो कच्चान, एवं सन्ते, इमे चत्तारो वण्णा सम समा होन्ति। नेसं एत्थ किन्चि नाना कारणं समनुपस्सामि।"
"इस प्रकार महाराज, तुम्हें समझना चाहिए कि लोक में यह हल्ला भर ही है कि ब्राह्मण श्रेष्ठ वर्ण है, अन्य हीन  वर्ण है ।"
"इमिना पि खो महाराज, परियायेन वेदितब्बं यथा घोसो येव सो लोकस्मिं- ब्राह्मणो सेट्ठो, हीनो अञ्ञो वण्णो(माधुरिय सुत्त: म.नि. 2.4.4 )।"
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निय्याति- बाहर जाना।  पत्तिकोव - पैदल ही। 

'ललितविस्तर' एक ब्राह्मण ग्रन्थ

'ललितविस्तर' एक ब्राह्मण ग्रन्थ 
बुद्धचरित के लिए आदि ग्रन्थ ललितविस्तर माना जाता है। यह पहली सदी का ग्रन्थ है. जैसे कि 'ब्राह्मणी ग्रंथों' के साथ होता है, इसके रचियता का भी पता नहीं है। लेखक का पता न होने से उसे 'ईश्वर कृत' मानने में सोहलीयत होती है! फिर आपको, उसमें लिखी बातों पर जनता में यकीन कराने 'किसी थर्ड डिग्री' की आवश्यकता नहीं होती। 

ललितविस्तर, एक काव्य-ग्रन्थ है। यह संस्कृत में लिखा गया है। यद्यपि यह सभी अहर्ताएं पूरी करता है, परन्तु, चूँकि इसमें बुद्धचरित है, इसलिए यह 'महाकाव्य' नहीं हो सकता। बुद्ध, ब्राह्मणवाद के विरुद्ध जो थे ? तमाम मान-सम्मान प्रतिष्ठानों के ठेकेदार ब्राह्मण, भला वे अपने विरोधी के द्वारा लिखे ग्रन्थ को 'महाकाव्य' का सम्मान क्यों देने लगे ? फिर चाहे, नशे की पिनक में उलुल-जलुल कथा-कहानियां लिखने वाले उनके अपने स्व-जातीय ब्राह्मण ही क्यों न हों ? अपने वर्गीय-हितों के विरुद्ध वे ऐसा 'पाप' कैसे कर सकते हैं ?

ललितविस्तर के रचनाकार का भले ही पता न हो, किन्तु इतना तो तय है, वह ब्राह्मण ही है। क्योंकि बुद्ध के जन्म बारे में, जिसे विष्णु का अवतार कहा गया हो, एक ब्राह्मण ही लिख सकता है कि जिस काल में ब्राह्मण बढे-चढ़े होते हैं तो ब्राह्मण कुल में, क्षत्रिय बढे-चढ़े होते हैं तो क्षत्रीय कुल के अलावा अन्यत्र किसी हीन/चाण्डाल कुल में जन्म नहीं ले सकते(कुलशुद्धि परवर्त:ललित विस्तर) ? 

Tuesday, September 3, 2019

नंदक सुत्त

एक समय भगवान बुद्ध सावत्थी में अनाथपिण्डीक से जेतवनाराम में विहार कर रहे थे। उस समय उपस्थानशाला में बैठे हुए आयु. नंदक भिक्खुओं को धार्मिक प्रवचन से शिक्षित कर रहे थे।
एकं समयं भगवा सावत्थियं विहरति जेतवने अनाथपिंडीकस्स आरामे। तेन खो पन समयेन आयस्मा नन्दको उपट्ठान सालायं भिक्खूनं धम्मिया कथाय संदस्सेति।
उस समय भगवान संध्या हो जाने पर एकांत सेवन से उठ जहाँ उपस्थानशाला थी, पहुंचे। वहां पहुँच कर नंदक के प्रवचन के समाप्त होने तक बाहर बरामदे में ही खड़े रहे।
अथ खो भगवा सायण्ह समये पटिसल्लाना वुट्ठितो येन उपट्ठानसाला तेनुपसंकमि।  उपसंकमित्वा बहि द्वारं कोट्ठके अट्ठासि कथा परियोसानं आगमयमानो।
जब भगवान ने जाना कि धार्मिक प्रवचन समाप्त हो गया तो वे जोर से खांसे और उन्होंने कुण्डी (सांकल) ख़ट खटायी। भिक्खुओं ने भगवान के लिए प्रवेश द्वार खोला।
अथ खो भगवा कथा परियोसानं विदित्वा उक्कासेत्वा अग्गळं आकोटेसि। विवरिन्सु खो ते भिक्खू भगवतो द्वारं।
तब भगवान उपस्थान शाला में प्रविष्ट हुए और बिछे आसन पर बैठे। बैठ चुकने पर भगवान ने आयु.  नंदक को यह कहा- "नंदक! तुमने भिक्खुओं को बड़ा लम्बा उपदेश दे दिया। धार्मिक प्रवचन की समाप्ति की प्रतीक्षा में द्वार के बाहर खड़े-खड़े मेरी पीठ दुखने लग गई।"
अथ खो भगवा उपट्ठान सालं पविसित्वा पञ्ञतासने निसीदि। निसज्ज खो भगवा आयस्मंतं नंदकं एतद वोच- "दीघो खो त्यायं, नंदक, धम्म परियायो भिक्खूनं पटिभासि। अपि मे पिट्ठि  आगिलायति बहि द्वार कोट्ठके  ठितस्स कथा परियोसानं  आगमयमानस्स।
ऐसा कहे जाने पर आयु. नंदक को लज्जा अनुभव हुई और वह दुक्ख प्रगट करते हुए बोले- "भंते! हम नहीं जानते थे कि भगवान बाहर बरामदे में खड़े हैं।  भंते यदि हम यह जानते कि आप बरामंदे में खड़े हैं, तो प्रवचन इतना लम्बा न होता।"
एवं वुत्ते आयस्मा नन्दको सारज्जमान रूपो भगवन्तं एतद वोच- "न खो पन मयं, भंते! जानाम, भगवा बहिद्वारं कोट्ठके ठितो। सचे हि मयं, भंते, जानेय्याम, भगवा बहिद्वार कोट्ठके ठितो, एत्तकं अपि नो न पटि-भासेय्य।"
भगवान ने जब यह देखा की आयु. नंदक लज्जा का अनुभव कर रहे हैं तो उन्होंने आयु. नंदक को कहा - "नंदक! बहुत अच्छा, बहुत अच्छा। साधु नंदक साधु। तुम्हारे जैसे कुलपुत्रों के लिए यही योग्य है कि तुम धार्मिक वार्ता करते रहो।"
अथ खो भगवा आयस्मंत नंदक सारज्जमान रूपं विदित्वा आयस्मंतं नंदकं एतद वोच- "साधु, साधु नंदक!  एतं खो नंदक, तुम्हाकं पतिरूप कुलपुत्तानं, यं तुम्हे धम्मिया कथाय संदस्सेय्याथ" (अ. नि.: नवक निपात) ।
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 संदस्सति- प्रशिक्षित करना।उक्कासेति- खांसना। अग्गळं - कुण्डी (सांकल) आकोटन- ख़ट खटाना।  आगिलायति- दर्द/ पीड़ा होना।