Tuesday, November 13, 2018

मिलिंद पण्ह

मिलिंद पण्ह
मिलिंद पण्ह, साहित्य और दर्शन की दृष्टि से यह बड़ा महत्वपूर्ण ग्रन्थ है। इस में नागसेन के साथ हुए मिलिंद के अनेक संलापों का उल्लेख है। इस ग्रन्थ में 1. पूर्व योग, 2. लक्षण प्रश्न, 3. विमतिच्छेदन-प्रश्न, 4. मेंडक-प्रश्न, 5. अनुमान प्रश्न तथा 6. उपमा-कथा प्रश्न आदि छह परिच्छेद हैं(पालि साहित्य का इतिहास: राहुल सांकृत्यायन, पृ 183)।

यद्यपि, पालि  मिलिंद पण्ह में छह परिच्छेद हैं, किन्तु उनमे से पहले के तीन ही पुराने मालूम होते हैं। चीनी भाषा में भी इन्हीं तीन परिच्छेदों का अनुवाद मिलता है(दर्शन दिग्दर्शन : राहुल सांकृत्यायन पृ  550 )।

मिनांडर-
पंजाब से लेकर यमुना तक यवनों(ग्रीकों) ने ईसा पूर्व द्वितीय शताब्दी में राज्य किया था।  दिमित्रि(189-197 ई पू ) मौर्य साम्राज्य के नष्ट होने पर भारत विजय के प्रयास में निकला था। पतंजलि के महाभाष्य में 'यवनों के साकेत को घेरने' का स्पष्ट उल्लेख है। दिमित्रि का एक सेनापति मिनांदर था।  बख्त्रिया पर मेसोपोटामिया के यवनराज अत्रिया के सेनापति उरितिद के आक्रमण की बात सुनकर दिमित्रि को वहां से लौटना पड़ा। पर वह अपने दामाद और सेनापति मिनांडर को पंजाब में छोड़ गया। मिनांडर ने पंजाब में रहकर राज्य करना शुरू किया। उसने 'सागल' (स्यालकोट) को अपनी राजधानी बनाया। यही मिनांडर, 'मिलिंद' के नाम से प्रसिद्द हुआ(पालि साहित्य का इतिहास: राहुल सांकृत्यायन पृ  183 )।

मिनांडर स्वयं विद्या-व्यसनी पुरुष था। उसकी मृत्यु के बाद उसकी हड्डियों के लिए लोगों में लड़ाई छिड़ गई थी। लोगों ने उसकी हड्डियों पर बड़े-बड़े स्तूप बनवाए।  भिक्खु नागसेन की विद्वता को सुनकर एक दिन उसके दर्शन हेतु वह चल पड़ा(वही)।

साहित्यिक चोरी
यह सम्पूर्ण ग्रन्थ ही किसी बुद्धिहीन लेखक द्वारा ति-पिटक ग्रंथों से की गई साहित्यिक चोरी की वारदात लगती है। ग्रन्थ के प्रारंभ में ही, पूरण कस्सप, मक्खलि गोसाल, अजित केस कम्बल, पकुध कच्चान, संजय वेलट्ठि पुत्त, निगंठनाथ पुत्त आदि छह दार्शनिकों को राजा मिलिंद के समकालीन बताया गया है। किन्तु बुद्धा एंड हिज धम्मा' में हम इन दार्शनिकों को बुद्ध के समकालीन देखते हैं(प्रथम कांड: भाग- 6 : बुद्धा एंड हिज धम्मा )। इसी प्रकार, दीघनिकाय के सामञ्ञफल सुत्त में हम इन दार्शनिकों को मगधराज अजातसत्तु के समकालीन देखते हैं।

किन्तु हमारे आधुनिक विद्वान 'मिलिंद पन्ह' के प्रमाण को बहुत गंभीरता पूर्वक नहीं लेते। बी एम बरुआ(  प्रि-बुद्धिस्ट इंडियन फ़िलासफ़ी ) का कहना है कि मिलिंद पन्ह में राजा मिलिंद(ई पू 125-95) की जिस भेंट का उल्लेख है वह स्पष्टतया किसी बाद के बौद्ध लेखक द्वारा बड़े भोंडे तरीके से की गई साहित्यिक चोरी है। जी पी मल्लशेखर(डिक्सनरी ऑफ़ पालि प्रापर नेम्स )  का कहना है कि यह सारा वर्णन या तो सामाञ्ञफल सुत्त से की गई साहित्यिक चोरी है या फिर जिन दार्शनिकों का उल्लेख हुआ है, वे उन्हीं विचारधाराओं को मानने वालों में से थे(देवीप्रसाद चटोपाध्याय : लोकायत पृ 406)। 

इसी जीवन में

निगंठ नाथ पुत्त के निधन का समाचार बुद्ध को चुंद ने ला कर दिया और बताया कि उनके अनुयायियों ने आपस में लड़ाई-झगडा शुरू कर दिया हैं। इस पर बुद्ध ने चुंद को संबोधित करते हुए कहा -
चुंद, अब संसार में कितने उपदेशक हैं जो इतनी अग्रगनी और प्रसिद्धि की स्थिति तक पहुंचे हैं,  जहाँ तक तथागत पहुंचे हैं। मुझे कोई ऐसा उपदेशक दिखाई नहीं देता।  हे चुंद,  आज संसार में कई धार्मिक संघ हैं।  लेकिन मुझे कोई ऐसा संघ दिखाई नहीं देता जिसने भिक्खु-संघ जितनी अग्रगनी प्रसिद्धि वाली स्थिति प्राप्त की हो। यदि कोई व्यक्ति किसी धर्म को हर प्रकार से सफल, पूर्ण, त्रुटिर-हित और सुस्थापित बताना चाहेगा तो वस्तुत: वह इसी धर्म का नाम लेगा।

बुद्ध ने अपने धर्म को हर प्रकार से पूर्ण समझे जाने के लिए निश्चित कारण बताएं।  उन्होंने कहा कि अपने  समकालीन उपदेशकों के विपरीत अपने अनुयायियों से यही कहना चाहता हूँ कि वे संसार के आदि और परलोक सम्बन्धी विचारों से दूर रहे और केवल अपनी आतंरिक स्थितियों में परिवर्तन लाने की विधियों पर ध्यान दें।

हे चुंद, मैं मानसिक मद को अंकुश में रखने का उपदेश देता हूँ। इस मन को भृष्ट करने वाली प्रवृतियां इसी जीवन में उत्पन्न होती हैं।  मैं यह नहीं बताता कि दूसरे जीवन में मन को पथ-भ्रष्ट करने वली वृतियों का दमन किस प्रकार किया जाए।  मेरा तो केवल यही प्रयास है कि इस जीवन में उन पर किस प्रकार अंकुश लगाया जाए(पृ  401)।

Monday, November 12, 2018

राम

राम,
तुम्हारे आस्था पुरुष
हो सकते हैं
मगर, हमारे कैसे ?
हम, उनकी
किस बात पर आस्था करें ?

क्या इस पर कि
एक ब्राह्मण के कहने पर
उन्होंने शम्बूक शुद्र का
सिर कलम किया ?
या इसलिए कि
एक धोबी के कहने पर
अपनी पत्नी सीता को
घर से निकाल दिया ?

'पूजिए विप्र
सील गुण हिना'
तुम्हारे लिए
सही हो सकता है
क्योंकि तुम
ब्राह्मण को घर बुलाते हो,
उससे पूजा करवाते हो

मगर,
हम क्यों पूजे ?
हमें तो उसे
छूने से परहेज है
हमारे हाथ का पानी
पीने से परहेज है ?

जहाँ विभेद
और घृणा हो
उस 'मानस' को
हम क्यों पढ़े
जो पशु से हमें
बदतर समझता हो
हम उसकी पूजा
क्यों करे ?

तमाम सदिच्छा के
बावजूद, तुम्हारे
'रामराज्य' की थीम
भ्रामक लगती है
चातुर्वर्ण और
ऊंच-नीच की खाई को
और चौड़ी करने की
साजिश लगती है ?
अ  ला उके  @amritlalukey@blogspot.com

Saturday, November 10, 2018

गणपति; विघ्नहर्ता या विघ्नकर्ता ?

गणपति; विघ्नकर्ता-
गणपति सदा से देवता नहीं थे,कम-से-कम आधुनिक अर्थ में तो नहीं। प्राचीन पौराणिक कथाकारों और नियम बनाने वालों की दृष्टि में भी गणपति का कोई श्रेष्ठ स्थान नहीं था। यह तो बहुत बाद में देवता बने (देवीप्रसाद चटोपाध्याय:लोकायत, पृ 101)।

विचित्र विसंगतियां-
लेकिन यह प्रक्रिया अकेले गणपति पर ही लागू नहीं होती,  अन्य प्राचीन देवताओं यथा शिव, कृष्ण आदि पर भी लागु होती है। किन्तु बाद में इन विचित्र विसंगतियों को छिपाने के लिए गल्प कथाएँ रची गई ।

गणपति
गणपति अर्थात गणों का मुखिया। गणपति का दूसरा समानार्थक शब्द है, गणेश अर्थात गणों का ईश या  देवता। छठी शताब्दी में गणपति को गणनायक कहा जाता था। जिसका अर्थ था किसी जन-समुदाय का मुखिया(पृ 101 )।

विपत्तियों का अवतार बनाम सफलता का देवता
गणपति की सबसे महत्त्व पूर्ण बात उनके नामों में नहीं है। महत्वपूर्ण बात यह है कि गणपति के प्रति भावनाओं में बड़ा विचित्र परिवर्तन आया । पहले तो गणपति को कष्ट और विपत्तियाँ लाने वाला माना जाता था और बाद में वह सद्भाव और सफलता का देवता बन गया । हम सदा यही समझते रहे हैं कि गणपति केवल मनोकामनाएं पूर्ण करने वाले देवता हैं।  लेकिन प्रत्यक्षत: यह भावना तो बाद में पहले वली भावना पर थोपी गई। पहले तो गणपति को विपत्तियों का अवतार माना जाता था। इस तरह के विचार पहली 5 वीं शताब्दी में विद्मान थे (पृ 102)।

'गृह सूत्र' और 'स्मृति' आदि में गणपति के प्रति घृणा-
गृह्य सूत्र काल' अर्थात 5 वीं शताब्दी में यह गणपति या विनायक केवल भय या तिरस्कार की भावना उत्पन नहीं करते थे। वरन गणपति को अव-मंगल का सूचक माना जाता था।  गणपति के सम्बन्ध में यह धारणा बहुत समय तक बनी रही। 'मानव सूत्र' से कई शताब्दियों के अन्तर पर याज्ञवल्क्य द्वारा लिखी संहिता में यही स्थिति वर्णित है। मनुस्मृति काल में गणपति के प्रति तिरस्कार ही था(103)। मनु ने गणपति को शूद्रों का देवता घोषित किया था(पृ 108 )।

गणपति के कुछ प्रसिद्द नाम हैं- विघ्नकृत, विघ्नेश, विघ्नराज, विघ्नेश्वर आदि। इन सब का विशुद्ध शाब्दिक अर्थ है, विघ्न डालने वाला। वि-नायक अर्थात विपत्तियों का नायक।  किन्तु बाद में इन नामों के शाब्दिक अर्थ की अनदेखी कर नए अर्थ किए गए यथा- नमो गणेशाय विघ्नेश्वराय' अर्थ 'मैं विघ्नों के देवता गणेश के सम्मुख नमन करता हूँ' किया गया (104)।

याज्ञवल्क्य के अनुसार, विनायक,  गुणों का देवता इसलिए बना की वह बाधाएं उत्पन्न कर सकें।  बौद्धायण ने 'धर्मसूत्र' में गणपति को सीधे 'विघ्न' कहा अर्थात बाधा। पौराणिक साहित्य में गणपति न केवल विघ्न उत्पन्न करने वाले थे वरन ऐसा करते हुए रक्त भी बहा देते थे(वही)।

गणपति का एक दांत, 'ब्रह्म वैवर्त पुराण' में आयी एक कथा के अनुसार परशुराम ने कुल्हाड़े से तोड़ दिया था।  और,  इसलिए गणपति को  'एकदन्त' कहा जाता है । जैसा कि सभी जानते हैं कि परशुराम ब्राह्मणों अथवा पुरोहित वर्ग की सर्वोच्च स्थिति के घोर समर्थक थे। स्पष्ट है, उस काल में गणपति का प्रमुख शत्रु पुरोहित वर्ग था (वही)।

गणपति के प्रति घृणा साहित्य के स्रोतों तक ही सीमित नहीं थी वरन गणपति की प्रतिमाओं में भी यह परिलक्षित होता था। कुछ प्रतिमाओं में तो उन्हें भोंडी नग्नता और भयानक दानव के रूप में दिखाया गया था(वही, पृ  105 )।

बौद्ध-ग्रंथों में गणपति के प्रति घृणा
मंजुश्री द्वारा गणपति को पद-दलित करने के दृश्य वाली मूर्तियां भी हैं। इससे पता चलता है कि एक समय बौद्ध भी गणपति से उतनी ही घृणा करते थे जितने कि हिन्दू(पृ  106 )।

विघ्नेश्वर से सिद्धिदाता-
परिवर्तिति काल में रक्त रंजित हस्ति दन्त वाले विघ्न उत्पन्न करने वाले गणपति मनोकामना सफल होने का वरदान देने वाले देवता बन गए।  विघ्न राज, सिद्धिदाता बन गए। स्वाभाविक रूप से इस परिवर्तित रूप को लोकप्रिय बनाने के लिए व्यापक प्रचारात्मक साहित्य लिखा गया और इस प्रचार को पुराणों में प्रमुखता दी गई । 'स्कन्द पुराण' में गणपति को स्वयं ईश्वर का अवतार बताया गया। गणपति की स्तुति के लिए 'गणेश पुराण' और 'गणपति उपनिषद' लिखे गए( वही)।

आगे चलकर, जिस गणपति को 'मानव गृह्य' सूत्र' और 'याज्ञवल्क्य स्मृति' में जहाँ विद्या अध्ययन में विघ्न कारक कहा गया था, उन्हें  प्रज्ञा और विद्वता के देवता घोषित किया गया। गणपति को अचानक ही जिन गुणों से संपन्न बना दिया गया उसे उचित बताने किए लिए  वेदव्यास द्वारा रचित और उच्चरित महाभारत को लिखने की अति कठिन कार्य करने के योग्य वाली 'देव कथा' गढ़ी गई । यही नहीं, गणपति को प्रज्ञावान दिखाने के लिए 'श्रीमद भगवत गीता' की तर्ज पर  'गणेश गीता' रची गई(पृ 107 )।

परस्पर विरोधी पौराणिक गाथाएँ-
जो विघ्नकर्ता, सिद्धिकर्ता बन गया, उसे उच्च वंश का बताना आवश्यक था।  'स्कंध पुराण' और  'ब्रह्म वैवर्त पुराण' के अनुसार, पार्वती ने खेल ही खेल में अपने शरीर के मल को विचित्र आकृति देकर इसमें प्राण फूंके थे। एक अन्य कथा के अनुसार, पार्वती अपने शारीर पर जिस उबटन को मलती थी, उस में अपना मल मिश्रित करके वह गंगा के उद्गम स्थल पर गई और एक हस्तिमुख वाली मालिनी नमक राक्षसी को यह मिश्रण पीने को बाध्य किया। गणपति, मालिनी के गर्भ से उत्पन्न ही बालक था, जिसे पर्वतो ले गई थी(पृ 108)।

ब्रह्म वैवर्त पुराण की इस कथा के अनुसार, जन्म के बाद  गणेश पर शनि की दृष्टि पड़ी और गणेश का सिर धड से अलग हो गया ।  इसलिए विष्णु ने शोक ग्रस्त माता पर दया करके एक हाथी का सिर उस बालक एक सिर पर लगा दिया। किन्तु स्कन्द पुराण के अनुसार, गणेश का सिर जन्म के पूर्व ही नहीं था।  सिंदूर नामक एक दैत्य, माता के गर्भ में प्रविष्ट हो गया और उन्होंने गर्भस्थ बालक का सिर खा लिया। गर्भस्थ बालक जब जन्मा तो उसने देखा कि उसका सिर नहीं हैं ! उसने गजासुर नामक हस्ति दानव का सिर काटा और अपने सिर पर लगा दिया(वही)।

दक्षिण भारत के सुप्रभेदागम' के अनुसार शिव- पार्वती ने हस्ति मुद्रा में सम्भोग किया जिससे हस्तिमुख वाला बालक पैदा हुआ।  एक और कथा जो कई पुराणों में आयी है, के अनुसार इंद्र के नेतृत्व वाले अभिजात देवतागण शिव के निवास स्थल सोमनाथ के पर्वतीय क्षेत्र में, 'नीच जाति' वाले शूद्रों और उनकी स्त्रियों के एक समागम से डर गए।  देवताओं ने शिव से प्रार्थना की, किन्तु उन्होंने इस सभा को नहीं रोका। तब सब देवता शिव पत्नी पार्वती के पास पहुंचे।  उन्होंने इस जन-समूह के विनाश के लिए अपने शरीर के मल से एक विपत्ति कारक देवता का सृजन किया(वही )।

विघ्नराज का रूपांतरण-
कुमारस्वामी के अनुसार, गुप्त राजाओं के शासन काल से पहले के मूर्तिशिल्प में  गणेश की मूर्ति नहीं थी। गणेश की प्रतिमाएं अचानक ही गुप्तकाल(500 ईस्वी) में बनी। काणे के अनुसार भी गणेश की प्रतिमाएं ईस्वीं 500-600 में होने लगी थी।  यह स्थापित किया जा चूका है कि गुप्त काल में ब्राह्मण साहित्य नए सिरे से लिखा गया था(पृ 109 )।

मध्य युग के ग्रंथों में गणेश के हस्तिमुख, कुम्भाकार उदर, मूषक वाहन आदि विचित्र विशेषताओं का जो वर्णन हैं वह वैदिक साहित्य में नहीं है । हाँ. बौद्धायण के धर्मसूत्र में विनायक को हस्तिमुख, वक्रतुंड, एकदंत और लम्बोदर कहा गया है, ये सभी विशेषताएँ बाद में जोड़ी गई(वही )।

एक नहीं, अनेक गणपति
कुछेक स्थानों पर कई गणपतियों की बात कही गई है । 'वाजसनेयी संहिता' में यह शब्द बहुवचन में हैं। 'मानव गृह्य सूत्र' में चार विनायकों का उल्लेख हैं और याज्ञवल्क्य ने इन्हें अनेक बताया है। महाभारत के अनुशासन  पर्व में भी गनेश्वरों और विनायकों के सम्बन्ध में बहुवचन का प्रयोग है। भंडारकर के अनुसार मूलत: जो चार विनायक थे, कालान्तर में एक हो गए(वही)।

संभवत: विभिन्न गणपतियों के विभिन्न आकार और विशेषताएँ थी। 'तैतरीय संहिता' के अनुसार इन गणपति यों की शक्ल पशुओं जैसी थी। तांत्रिक ग्रंथों में कुछ गणपतियों के चिन्ह बैल जैसे थे तो कुछ के चिन्ह सांप जैसे थे। इन में प्राचीन टोटमवादी विश्वास भी हो सकते हैं(वही)।

मातंग राजवंश-
डी डी कोसंबी के अनुसार कोसल के बाद के काल के सिक्कों को यदि काल क्रम से देखा जाए तो मातंग(हाथी) राजवंश की स्थापना के क्रमिक इतिहास का पता चलता है(वही)।

वेदों में गणपति
वेदों के कवियों को गणपति का तो पता है किन्तु उन्हें उनके हस्तिमुख की कोई जानकारी नहीं है। यह गणपति न तो विघ्नराज था और न ही बाद का सिद्धिदाता(पृ  114 -115 )। जहाँ तक वैदिक साहित्य का सवाल है, हमें गणों और गणपतियों की प्रतिष्ठा और वैभव के प्रमाण मिलते हैं(पृ  117 )।
-अ ला ऊके  amritlalukey.blogspot.com

व्यवस्था

व्यवस्था से
'व्यवस्था'
की बात करना
कितनी बेहूदा है ?
जबकि
व्यवस्था खुद
'अ-व्यवस्था' हो।
अ ला ऊके  @amritlalukey.blogspot.com