Tuesday, January 15, 2019

हिन्दू मीडिया

सारे चेनल कुम्भ मेले में लगे है ? ताज़ा तरीन खबरों को भी दिखाने की किसी को फुर्सत नहीं है ? मगर, 14 अक्टू. दीक्षा-भूमि का नजारा दिखाने इन राष्ट्रीय न्यूज चेनलों के कैमरे चुप्पी साध लेते हैं चेत्य भूमि मुंबई हो या जन्म-स्थान मऊ की कवरेज, इनका कम्प्लीट 'ब्लेक-आउट' होता है. मीडिया की यही सड़ांध मुस्लिम जलसों और क्रिश्चियन प्रोग्रामों के समय होती है ? हमें कुम्भ मेला कवरेज पर उतनी शिकायत नहीं है जितनी मीडिया के दलित, अल्पसंख्यक विरोधी होने की. दलित और अल्पसंख्यक राजनीति के ठेकेदारों को इस पर चिंतन करना चाहिए.

दलित एकता

उ प्र में बीएसपी-एसपी गठबंधन की जो दलित नेता, सामाजिक चिन्तक और बुद्धिजीवी आलोचना करते हैं, वे अपनी कुंठा ही प्रदर्शित करते हैं. यह इस कमी को भी रेखांकित करता है कि दलित-हितों की लम्बी-लम्बी बातें करने के बाद भी हम 'एक' क्यों नहीं हैं ? हिन्दू तमाम अंतर्विरोधों के बावजूद 'राम मंदिर' पर एक हो जाते हैं मगर, दलित ? इन्हें लखनऊ और नोएडा का 'दलित स्मारक' भी एक नहीं कर पाता ? धन्य हैं हम और हमारी राजनीति !

Tuesday, January 8, 2019

घरे किं किं अत्थि, किं किं नत्थि ?

आओ पालि सीखें, खेल-खेल में-

घरे किं किं अत्थि, किं किं नत्थि?
(घर में क्या-क्या है, क्या-क्या नहीं है)

 नामपट्टिका(नेम-प्लेट) अस्थि, गह्पति अस्थि।
 गेहद्वारं(घर का दरवाजा) अस्थि, घरणी(गृहिणी) अस्थि,।

सयन-घरं अस्थि, वातपानं(खिड़की) अस्थि।
कुंचिका(चाबी) अस्थि, मंजूसा(पेटी/सूटकेस ) अस्थि।

थाली अस्थि, कटच्छु(चम्मच) अस्थि।
साकं(साक) अस्थि, भत्तं(भात) अस्थि ।

रज्जु(रस्सी) अस्थि, दोण्णी(बाल्टी) अस्थि।
कुम्भो(घड़ा) अस्थि, कूप्पी(पानी की बोतल) अस्थि।

छत्तं(छत्ता) अस्थि, पत्तं(पत्र/लेटर) अस्थि।
पदीपो(दीपक) अस्थि, करदीपो(टार्च) अस्थि।

लेखनी(पेन) अस्थि, लेखनं(लेख) अस्थि।
अंकनी(पेंसिल) अस्थि, पवत्ति-पत्तं(समाचार-पत्र) अस्थि।

पोत्थकं अत्थि, पोत्थकानि(पुस्तकें) सन्ति
कग्गजं(कागज) अत्थि, कग्गजानि(अनेक कागज) सन्ति।

गन्थो(ग्रन्थ) अस्थि, गन्थानि(अनेक ग्रन्थ) सन्ति।
पिट्ठं(पेज/पृष्ठ) अस्थि, पिट्ठानि(अनेक पेज) सन्ति।

कंघिका(कंघी) अस्थि, दप्पणो(दर्पण) अस्थि।
करवत्थं(रूमाल) अस्थि, मुखपुच्छनं(छोटा-टावेल) अस्थि।

दन्त-पोणो(ब्रश) अस्थि, दन्त-फेनो(पेस्ट) अस्थि।
सिनान-फेणिलो(साबुन) अस्थि, वत्थ(वस्त्रा)-फेणिलो अस्थि।

सम्मुज्जनी(झाड़ू) अस्थि, कण्डोलिका(टोकरी) अत्थि।
अवक्कारपाति(कूड़ेदान) अस्थि, रजं(धूल) नत्थि ।

गणको(केलकुलेटर) अस्थि, संगणको(कम्पुटर) अस्थि।
आकासवाणी अस्थि, दूरदस्सनं अस्थि।

साटिका(साड़ी) अस्थि, साटिकं(धोती) अस्थि।
युत्तकं(शर्ट) अस्थि, उरुकं(पेंट) अस्थि।

वलयं(चूड़ी) अस्थि, कुण्डलं(कान की बाली) अस्थि।
माला अस्थि, विलेपनं(क्रीम) अस्थि।

सीसावरणं(टोपी) अस्थि, सीसवेठनं(पगड़ी) अस्थि।
पादुका(जूतें/जूती) अस्थि, पाद-रक्खा(चप्पल) अस्थि।

दुद्ध(दूध) अस्थि, ताकं(ताक) अस्थि।
नोनीतं(नचनीत/मक्खन) अस्थि, धतं(धृत/घी) अस्थि।

-अ ला उके  amritlalukey.blogspot.com
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कटकं- कंगन
केसबन्धनं- जुड़ा
तरुणियो केस-बन्धनेसु आवलि (गजरा) गून्थन्ति।
अज्जते सब्बे पुरिसा सुत्तकं च उरुकं ऐव धरन्ति।

Thursday, December 27, 2018

अनुज्ञा परस्सपद

आओ पालि सीखें
इन क्रियाओं का ध्यान से देखें-
देहि- दो(क्रिया- देति)।  वदेहि- कहो( क्रिया- वदति)।
पठाहि- पढ़ो(क्रिया- पठति)। खमतु- क्षमा करे(क्रिया- खमति) आदि अनुज्ञा परस्पद की क्रियाएं हैं।
अनुज्ञा परस्सपद
क्रिया ‘पठति’(धातु पठ) का प्रयोग
अनुज्ञा परस्सपद आदेश, प्रार्थना, सलाह, इच्छा आदि को व्यक्त करने प्रयोग होता है।
पुरिस एकवचन अनेकवचन
उत्तम पुरिस          अहं पठामि। मयं पठाम।
मैं पढ़ूं। हम पढ़ें।
मज्झिम पुरिस   त्वं पठ/पठाहि। तुम्हे पठथ।
तुम पढ़ो। तुम लोग पढ़ो।
पठम पुरिस            सो पठतु।  ते पठन्तु।
वह पढ़े। वे पढ़ें।
वाक्य रचना-
इध(यहां) आगच्छ/आगच्छाहि(आओ)।
सदा माता-पितुन्न वचनकरा भवथ(हों)।
अनुपाहनेन(जूते-चप्पलों के) बिना मा चलथ(चलो)।
मम(मेरा) आसयं(आश्य) सुणोतु(सुनो)।
दन्ते(दोतों को) मञ्जेय (मांजो)।
इदानि(ये) पोत्थकानि यथा ठानं ठापय(रखो)।
द्वारं उग्घाटेतु(खोलो)।
सतं वस्सं(वर्ष) जीवतु(जीवो)।
यानं मन्दं चालेतु।
आसन्दं इध आनेतु।
विजनं(फंखा) चालेतु।
अजयं(अजय को) इदं(यह) सूचेतु(सूचित करो)।
अज्ज चलचित्तं पस्साम(देखते हैं)।
अवगच्छन्तु(समझे)?
आम, अवगच्छाम(समझ गए)।
यमहं(एवं-अहं)(जैसे मैं) वदामि तं(उसे) वदेहि/वदेथ(कहो)।

अनुज्ञा परस्सपद के (निषेधात्मक) वाक्यों में ही ‘मा(मत)’ का प्रयोग होता है-
मा(मत) गच्छ(जाओ)।
मा अगमासि(आओ)।
मा अठासि(खड़े हो)।
मा भुञ्जि(खाओ)।
अनुपाहनेन बिना मा चलथ(चलो)।
-अ ला ऊके  @amritlalukey.blogspot.com

Tuesday, December 25, 2018

पुप्फ पूजा

पुप्फ पूजा 
वण्ण-गन्ध-गुणोपेतं,  एतं कुसुम-सन्ततिं।
वण्ण(वर्ण)-गधं और गुण-उपेतं(गुणों से युक्त) एतं(ऐसे) कुसुम-गुन्थित सन्तति(माला) से
पूजयामि   मुनिन्दस्स,  बुध्दपाद1 -सरोरूहे।।
पूजयामि(मेरे द्वारा पूजा की जाती है) मुनिन्दस्स(महामुनि), बुद्ध के पाद सरोरुहे(कमलों) की।

पूजेमि  बुध्दं  कुसुमेन-नेन, पुञ्ञेन  मेत्तेन लभामि मोक्खं।
मैं पूजा करता हूँ, बुध्दं(बुध्द की) कुसुमेन-अनेन(इन पुष्पों के द्वारा) पुञ्ञेन(पुण्य से), मेत्तेन(मैत्राी से) लभामि(लाभ प्राप्त होता है, मुझे) मोक्खं(निब्बान) का।

पुप्फं मिलायति यथा इदं मे, कायो तथा याति विनासभावं।।
पुप्फं(पुष्प) मिलायति(कुम्हलाता है) जैसे(यथा), इदं मे(यह मेरी) काया वैसे ही(तथा) विनाश-भाव को याति(जाती है)।  प्रस्तुति- अ ला ऊके   @amritlalukey.blogspot.com
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1. मूलपाठ- सिरिपाद। संस्कृत शब्द ‘श्री’ को पालि में ‘सिरि’ कहा गया है। ‘श्री’ का अर्थ ‘लक्ष्मी’ से अभिप्रेरित है। बौद्ध ग्रंथों का भाषानुवाद जब संस्कृत में हुआ, उस काल में इस तरह के कई शब्दों का प्रयोग, चाहे-अनचाहे संस्कृत विद्वानों द्वारा किया गया। किन्तु अब ऐसे अ-बौद्ध शब्दावली का स्थानापन्न चरणबध्द रूप से करने की आवश्यकता है।